भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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भूमिका ८७ करते हैं। जीव का व्यवहार मुख्यरूप से बाह्यसांसारिकपदार्थों के साथ रहता है। उनका ज्ञान प्राप्त करके उनके उपभोगादि में ही जीव की रुचि रहती है। (ब) स्वप्नावस्था-इस अवस्था में जीव की इन्द्रियाँ एवं शरीर दोनों विश्राम करते हैं, किन्तु उसका मन क्रियाशील रहता है। जाग्रत अवस्था में मन पर पड़े हुए संस्कारों को लेकर वह काल्पनिकजगत् की संरचना करता है। इसमें जीव विज्ञानमय, मनोमय, एवं प्राणमय कोशों से आबद्ध होता है तथा उसका सम्बन्ध सूक्ष्मशरीर के साथ रहता है। मन की वासना के अनुरूप कार्य करने के कारण इसे अन्तःप्रज्ञ भी कहते हैं। सूक्ष्मविषयों का उपभोग करने से इसको 'प्रविविक्तभुक्' भी कहा जाता है। आचार्य शङ्कर के अनुसार-जाग्रत् अवस्था में इन्द्रिय, मन और बुद्धि बाह्य एवं अन्तः आलोक से आलोकित रहती हैं, जबकि स्वप्नावस्था में इन्द्रियाँ विश्राम करती हैं। सूर्य के प्रकाश का अभाव हो जाता है। उस समयं एकमात्र विशुद्ध आत्मज्योतिः विद्यमान रहती है। जाग्रत अवस्था के साथ इस अवस्था का एक यह भी अन्तर है कि वहाँ बाह्यसांसारिकपदार्थ विद्यमान रहते हैं, जबकि इस अवस्था में वे सभी पदार्थ काल्पनिक होते हैं। (स) सुषुप्ति अवस्था-इस अवस्था में जीव का सम्पर्क न तो बाह्य सांसारिकपदार्थों से होता है और न ही वह स्वप्निल संसार में विचरण करता है, अपितु इसमें वह आनन्द का भोक्ता बनकर चेतोमुख रहता है। जाग्रत् एवं स्वप्नावस्था में वह सुख-दुःख दोनों का अनुभव करता है, जबकि इस अवस्था में आनन्द का ही प्राचुर्य रहता है। इस सम्बन्ध में उपनिषदकार का कथन है- “सुषुप्तिकाले सकले विलीने तमोभिभूतः सुखरूपमेति।” (कैवल्योपनिषद्-13) इस अवस्था में स्थूलशरीर (ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, मन एवं बुद्धि आदि कुछ भी कार्य नहीं करते हैं। साथ ही प्रमाणप्रमेय का व्यवहार भी समाप्त हो जाता है। इसमें बुद्धि अविद्या में इसप्रकार स्थित रहती है जैसे, वट वृक्ष के बीज में वृक्ष। आनन्दमयकोष में आबद्ध यह अवस्था वस्तुतः मोक्ष से पूर्व की अवस्था कही जा सकती है- ज्ञानेनानुपसंहारो बुद्धेः कारणतास्थितिः। वट बीजे वटस्यैव सुषुप्तिरभिधीयते।। (पञ्चीकरणवार्तिक, 42) (द) तुरीयावस्था-इस अवस्था में सब प्रकार के प्रपञ्चों की पूर्णतया शान्ति हो जाती है। यह नित्यशुद्धचैतन्य ब्रह्म की निर्लिप्त अवस्था है। इसमें