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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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८८ वेदान्तसार

वह शान्त, शिव एवं अद्वैतरूप में विद्यमान रहता है। इसमें उसे न स्वप्न आते हैं और न निद्रा, अपितु विपरीत ज्ञानों का क्षय होने के कारण जीवात्मा तुरीयपद को प्राप्त कर लेता है। इस अवस्था में जीव की सभी वासनाएँ विनष्ट हो जाती हैं। सभीप्रकार के कोशों से मुक्त वह ब्रह्म हो जाता है। (१९) सृष्टिप्रक्रिया-वेदान्तदर्शन सम्पूर्णसृष्टि का एकमात्र कारण सच्चिदानन्दस्वरूप, अवाङ्मनसगोचर अखिलाधार परंब्रह्म को स्वीकार करता है। उसके अनुसार ब्रह्म इस जगत् का उपादानकारण भी है और निमित्तकारण भी। अपने इस कथन को समझाने के लिए वह मकड़ी का उदाहरण प्रस्तुत करता है, जिसप्रकार एक मकड़ी (लूता) अपने शरीर के चेतन अंश के प्राधान्य के कारण जाले का उपादानकारण कहलाती है, ठीक उसीप्रकार वही मकड़ी अपने शरीर की प्रधानता के कारण जाले का निमित्तकारण भी बनती है। वैसे ही अपनी अत्यन्त शक्तिसम्पन्न, स्वाभाविक एवं अनिर्वचनीय आवरण व विक्षेपशक्तिसम्पन्न माया से युक्त ब्रह्म एक से अधिक होने का संकल्प करता है। 'एकोऽहं बहुस्याम' इत्यादि श्रुति इस तथ्य में प्रमाणरूप से प्रस्तुत की जा सकती है। ब्रह्म के इस संकल्प के साथ ही वेदान्त की सृष्टिप्रक्रिया का प्रारम्भ हो जाता है। वेदान्त के. अनुसार-व्यक्ति की श्वासोच्छ्वासप्रक्रिया के समान सम्पूर्णसृष्टिप्रक्रिया भी अत्यन्त स्वाभाविक है जो स्वतः उसीप्रकार होती है, जिसप्रकार किसी पुरुष के शरीर से केश, लोम आदि उत्पन्न होते हैं। इस दर्शन की मान्यता के अनुसार-सृष्टि का क्रमिकविकास होता है, जिसे सूक्ष्मतम (कारणावस्था), सूक्ष्म तथा स्थूल तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। सृष्टि के संकल्प से युक्त ब्रह्म, जब अपनी शक्ति शुद्धसत्त्वप्रधान माया (अज्ञान) से आच्छादित होता है तो 'ईश्वर' संज्ञा प्राप्त करता है। यह ईश्वर ही वस्तुतः सृष्टि का मुख्यकारण होने से 'कारणशरीर' कहलाता है। आनन्द की प्रचुरता के कारण वही 'आनन्दमय कोष' भी है। इसके विपरीत मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छन्न ब्रह्म की जीव संज्ञा होती है। यह जीव व्यष्टिरूप तथा ईश्वर समष्टिरूप कहा गया है। समष्टिव्यष्टि के अतिरिक्त इन दोनों में यहाँ मूलतः कोई विशेषभेद नहीं माना गया है। ईश्वरसंज्ञक कारणशरीर से सर्वप्रथम सूक्ष्म आकाश उत्पन्न होता है। जो अनन्त, सूक्ष्म, लघु तथा सर्वव्यापक माना गया है। इसी क्रम में आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल तथा जल से पृथ्वी की उत्पत्ति मानी