वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 104, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ें९० वेदान्तसार सात्त्विक अंशों से निश्चयात्मिकाबुद्धि तथा संकल्पविकल्पात्मक मन का उद्भव माना गया है। पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्चकर्मेन्द्रियाँ, पञ्चप्राण और मन ये सत्रह अवयव ही सूक्ष्मशरीर का निर्माण करते हैं। इस सूक्ष्मशरीर में विज्ञानमय, मनोमय तथा प्राणमय तीन कोष होते हैं। इनमें पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ और बुद्धिरूप विज्ञानमय कोष से आवृत्त हुआ चैतन्य ही समस्त व्यावहारिककार्यों को सम्पादित करता है। मन से युक्त पञ्चज्ञानेन्द्रियों से निर्मित मनोमयकोष जीव की इच्छाशक्ति का प्रतीक है। पञ्चप्राण एवं पञ्चकर्मेन्द्रियों से युक्त प्राणमयकोष में क्रियाशीलता की प्रधानता रहती है। इसप्रकार ये तीनों कोष स्थूलशरीर के माध्यम से विभिन्नकार्यों को सम्पन्न करते हैं। जैसाकि हम पूर्व में ही उल्लेख कर चुके हैं, सृष्टिप्रक्रिया में सृष्टि का चरमविकास स्थूलशरीर है। जिसका निर्माण पञ्चीकृत महाभूतों- आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी द्वारा होता है। इस स्थूलशरीर के चार प्रकार होते हैं- जरायुज (मनुष्य, पशु आदि) अण्डज (पक्षी, सर्पादि), स्वेदज (जूँ, मच्छर आदि) तथा उद्भिज्ज (लता, वृक्षादि)। वेदान्त के अनुसार-सृष्टि का अभिप्राय किसी नये पदार्थ का उत्पन्न होना नहीं है, अपितु यह तो मात्र अव्यक्त की स्थिति से व्यक्त दशा को प्राप्त करना है। ब्रह्म की आवरण और विक्षेप नामक दो शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण सृष्टिप्रक्रिया सम्पादित की जाती है। इनमें आवरणशक्ति ब्रह्म के यथार्थरूप को ठीक वैसे ही आच्छादित कर देती है जैसे, सामने पड़ी हुई रस्सी अन्धकारादि के कारण रस्सी प्रतीत नहीं होती। साथ ही दूसरी विक्षेप शक्ति उस आच्छादितवस्तु ब्रह्म में नवीनवस्तु संसार की, ठीक उसीप्रकार उद्भावना करती है जैसे-रस्सी में सर्प की प्रतीति। माया नामक शक्ति के कारण एक ही ब्रह्म में अनेकरूपात्मक जगत् की प्रतीति कैसे हो सकती है? इसके उत्तर में आचार्यों द्वारा यह दृष्टान्त दिया गया है। ठीक उसीप्रकार जैसे, तिमिररोग के कारण द्रष्टा को एक ही चन्द्रमा अनेकरूपों वाला दिखायी देता है वैसे, ही अविद्या (माया) के कारण कल्पित नामरूपादि के रूप में ब्रह्म के विभिन्न परिणाम दिखायी देते हैं। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को चित्र के माध्यम से अपेक्षाकृत अधिक सरलतापूर्वक समझा जा सकता है-