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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

९० वेदान्तसार सात्त्विक अंशों से निश्चयात्मिकाबुद्धि तथा संकल्पविकल्पात्मक मन का उद्भव माना गया है। पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्चकर्मेन्द्रियाँ, पञ्चप्राण और मन ये सत्रह अवयव ही सूक्ष्मशरीर का निर्माण करते हैं। इस सूक्ष्मशरीर में विज्ञानमय, मनोमय तथा प्राणमय तीन कोष होते हैं। इनमें पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ और बुद्धिरूप विज्ञानमय कोष से आवृत्त हुआ चैतन्य ही समस्त व्यावहारिककार्यों को सम्पादित करता है। मन से युक्त पञ्चज्ञानेन्द्रियों से निर्मित मनोमयकोष जीव की इच्छाशक्ति का प्रतीक है। पञ्चप्राण एवं पञ्चकर्मेन्द्रियों से युक्त प्राणमयकोष में क्रियाशीलता की प्रधानता रहती है। इसप्रकार ये तीनों कोष स्थूलशरीर के माध्यम से विभिन्नकार्यों को सम्पन्न करते हैं। जैसाकि हम पूर्व में ही उल्लेख कर चुके हैं, सृष्टिप्रक्रिया में सृष्टि का चरमविकास स्थूलशरीर है। जिसका निर्माण पञ्चीकृत महाभूतों- आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी द्वारा होता है। इस स्थूलशरीर के चार प्रकार होते हैं- जरायुज (मनुष्य, पशु आदि) अण्डज (पक्षी, सर्पादि), स्वेदज (जूँ, मच्छर आदि) तथा उद्भिज्ज (लता, वृक्षादि)। वेदान्त के अनुसार-सृष्टि का अभिप्राय किसी नये पदार्थ का उत्पन्न होना नहीं है, अपितु यह तो मात्र अव्यक्त की स्थिति से व्यक्त दशा को प्राप्त करना है। ब्रह्म की आवरण और विक्षेप नामक दो शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण सृष्टिप्रक्रिया सम्पादित की जाती है। इनमें आवरणशक्ति ब्रह्म के यथार्थरूप को ठीक वैसे ही आच्छादित कर देती है जैसे, सामने पड़ी हुई रस्सी अन्धकारादि के कारण रस्सी प्रतीत नहीं होती। साथ ही दूसरी विक्षेप शक्ति उस आच्छादितवस्तु ब्रह्म में नवीनवस्तु संसार की, ठीक उसीप्रकार उद्भावना करती है जैसे-रस्सी में सर्प की प्रतीति। माया नामक शक्ति के कारण एक ही ब्रह्म में अनेकरूपात्मक जगत् की प्रतीति कैसे हो सकती है? इसके उत्तर में आचार्यों द्वारा यह दृष्टान्त दिया गया है। ठीक उसीप्रकार जैसे, तिमिररोग के कारण द्रष्टा को एक ही चन्द्रमा अनेकरूपों वाला दिखायी देता है वैसे, ही अविद्या (माया) के कारण कल्पित नामरूपादि के रूप में ब्रह्म के विभिन्न परिणाम दिखायी देते हैं। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को चित्र के माध्यम से अपेक्षाकृत अधिक सरलतापूर्वक समझा जा सकता है-

भूमिका ९१ चित्र १७ ब्रह्म तुरीयावस्था शुद्ध सत्त्वप्रधान अज्ञान मलिन सत्त्वप्रधान अज्ञान सूक्ष्मतम सृष्टि समष्टि ← ईश्वर — कारण शरीर — जीव → व्यष्टि एकोऽहं बहुस्याम् आनन्दमय कोष ब्रह्म शरीर के केश, लोम के समान ↓ स्वाभाविकरूप में सृष्टि की उत्पत्ति सुषुप्ति अवस्था ज्ञान आकाश गुण अपञ्चीकृत सूक्ष्म भूतों आकाश (शब्द) की उत्पत्ति वायु पञ्चीकृत वायु (शब्द, स्पर्श) ↓ अग्नि महाभूत अग्नि (शब्द, स्पर्श, रूप) ↓ जल पञ्चीकरण जल (शब्द स्पर्श, रूप, रस) ↓ पृथ्वी प्रक्रिया द्वारा पृथ्वी (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध)

९२ वेदान्तसार [चित्र/फ्लोचार्ट : वेदान्त की सृष्टिप्रक्रिया] ┌───────────────────────────────┐ ┌──────────────────────────────┐ │ अपञ्चीकृत महाभूतों से सूक्ष्म सृष्टि │ │ पञ्चीकृत महाभूतों से स्थूल सृष्टि │ └──────────────┬────────────────┘ │ १४ भुवन (ब्रह्माण्ड) │ │ └──────────────┬───────────────┘ ┌──────────────┴───────────────────────────┐ │ │ नासिका गुदा सम्पूर्णशरीर उदर कण्ठस्थानी │ ┌────────────┴───────────┐ │ प्राण अपान व्यान समान उदान │ │ सप्तऊर्ध्व लोक सप्तअधःलोक │ └──────────────┬──────────────────────────┘ │(भू भुवःस्वः आदि) (अतलवितलादि) │ │ └────────────┬───────────┘ ┌──────────┐ │ पञ्चप्राण रजॊऽशो से पृथक्-पृथक् ┌─────────┐ ┌───────┴──────┐ ┌─────────────┐ │स्वप्नावस्था│ │ │प्रणमयकोष│ │समस्त सांसारिक│ │ प्राणियों के │ └──────────┘ │ └─────────┘ │ भोग्य पदार्थ │ │ स्थूल शरीर │ श्रोत्र आकाश उपस्थ आनन्द सन्तानोत्पत्ति└──────────────┘ └──────┬──────┘ ┌────┐त्वक् ┌───────────┐वायु ┌───────────┐पायु मलोत्सर्जन ┌──────┴──────┐ │ │ │सात्त्विक अंशों│ │रजॊऽशों से │ │ अन्नमय कोष │ │ग्रहण│चक्षु │से अलग- │अग्नि│अलग-अलग │पाद चलना └──────┬──────┘ │करना│रसना │अलग │जल │पञ्चकर्मेन्द्रियाँ│पाणि आदान प्रदान │ जरायुज │ │घ्राण │पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ│पृथिवि └───────────┘वाक् बोलना │ अण्डज └────┘ └─────┬─────┘ │ स्वेदज ┌─────────┐ ┌─────┴───────┐ ┌────────────┐ │ उद्भिज्ज │विज्ञानमय│ │सभी के सत्त्वांशों│ │जाग्रतावस्था│ ▼ │ कोष │ │से मिलकर │ └────────────┘ ┌──────────────┐ └────┬────┘ │अन्तःकरण │ │ जीवों के अनेक│ │ └──────┬──────┘ ┌────────────┐ │ प्रकार काकारण│ │ │ │ मनोमयकोष │ └──────┬───────┘ │ └──────────┼────────────┘ │ │ │ ┌────────────────────┴───┐ ┌────┴────────────┐ ┌─────────┴──────┐ │ अशुद्धि की न्यूनाधिकता │ │ निश्चयात्मिका बुद्धि │ │ संशयात्मक मन │ │ अविद्या की विचित्रता │ └─────────────────┘ └────────────────┘ └────────────────────────┘ ( वेदान्त की सृष्टिप्रक्रिया ) (२०) अध्यारोप-अपवाद- ये दोनों वेदान्तदर्शन के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त हैं, क्योंकि यहाँ परमब्रह्म एवं जगत् पर विचार करने के ये ही मुख्य आधार हैं। अतः इस प्रसङ्ग में इनकी विवेचना आवश्यक है। अध्यारोप एवं अपवाद वस्तुतः ऐसे सिद्धान्त हैं, जिनके द्वारा प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष का, ज्ञात से अज्ञात का, मूर्त से अमूर्त का बोध होता है। इसमें प्रथम अध्यारोप द्वारा वस्तु में अवस्तु का आरोप किया जाता है, जैसे-रज्जु में सर्प का आरोप। यह आरोप वस्तुतः मिथ्याज्ञान है, जिसका बाद में 'अपवाद' विधि द्वारा निराकरण कर दिया जाता है। ऐसा करने से वस्तु के वास्तविकस्वरूप का ज्ञान हो जाता है। सम्पूर्ण वेदान्तदर्शन इन्हीं दो

भूमिका ९३ सिद्धान्तों पर टिका हुआ है। आचार्य सदानन्द ने वेदान्तसार में अध्यारोप की इसप्रकार व्याख्या की है- “असर्पभूतायां रज्जौ सर्पारोपवद् वस्तुन्यवस्त्वारोपोऽध्यारोपः। वस्तु सच्चिदानन्दानन्ताद्वयं ब्रह्म। अज्ञानादिसकलजडसमूहोऽवस्तु।” अर्थात् वस्तु में अवस्तु का आरोप ही अध्यारोप है तथा एकमात्र सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म ही वस्तुतः वस्तु है। इसके अतिरिक्त अज्ञानादि सम्पूर्ण जड़समूह जिसके कारण इस मिथ्याजगत् की प्रतीति होती है; वह अवस्तु है। कुछ आचार्यों ने इसीको 'अध्यास' की संज्ञा भी प्रदान की है। वेदान्त अध्यारोप (अध्यास) का मूलकारण अज्ञान को मानता है। इसके प्रभाव से देखने वाला व्यक्ति वस्तु के वास्तविकस्वरूप को जानने में असमर्थ रहता है तथा वस्तु में अवस्तु की परिकल्पना करके भ्रमित रहता है इस विषय में आचार्य शङ्कर का मत है- अतस्मिंस्तद्बुद्धिः प्रभवति विमूढस्य तमसा। विवेकाभावाद्वै स्फुरति भुजगे रज्जुधिषणा॥ (विवेकचूड़ामणि-140) संक्षेप में अज्ञान के कारण मूढ़पुरुष किसी वस्तु में किसी अन्य वस्तु की परिकल्पना कर लेता है। जैसे, विवेक के अभाव से रज्जु को सर्प समझ लेना। इसीको यहाँ अध्यारोप या अध्यास कहा गया है। जिसप्रकार अनेकबार बादलों में सूर्य घिरा होने पर हमें वह दिखायी नहीं पड़ता है, ठीक वैसे ही मोया (अज्ञान) से आवृत्त हुए ब्रह्म का हमें प्रत्यक्ष नहीं होता है, अपितु उसके स्थान पर हमें माया की विक्षेप नामक शक्ति से दृश्यमान मिथ्या जगत् की प्रतीति होती है। इसप्रकार अध्यारोप के कारण जीव वस्तु के वास्तविकरूप को जानने में असमर्थ रहता है और वह सत् को असत् मान बैठता है, यही मिथ्याज्ञान उसके सांसारिकबन्धन का कारण बनता है। बन्धन के कारण इस मिथ्याज्ञान को विनष्ट करने के लिए वेदान्तदर्शन में सद् गुरु की आवश्यकता प्रतिपादित की गई है, जो अधिकारी शिष्य को 'अपवाद' पद्धति से उपदेश प्रदान करता है। जिससे शिष्य को वास्तविकता का ज्ञान हो जाता है और वह ब्रह्म को ही एकमात्र वास्तविकसत्ता मान लेता है तथा सम्पूर्णजगत् का मिथ्यात्व भी उसे हस्तामलकवत् प्रतीत होने लगता है। उसकी यह कल्पना रज्जु में की गई सर्प की भ्रान्ति के पश्चात् प्रकाश से होने वाली सर्पत्व की प्रतीति की समाप्ति के समान कही जा

९४ वेदान्तसार सकती है। जहाँ उसे रज्जु, रज्जुरूप में ही प्रतीत होती है। इसीप्रकार विवेक द्वारा ब्रह्म में मिथ्याप्रपञ्च सम्बन्धी अध्यारोप की निवृत्ति होने पर एकमात्र ब्रह्म की सत्ता ही रह जाती है। इसी प्रक्रिया को वेदान्त 'अपवाद' कहता है। आचार्य सदानन्द वेदान्तसार में इसका इसप्रकार उल्लेख करते हैं- “अपवादो नाम रज्जुविवर्तस्य सर्पस्य रज्जुमात्रत्वाद् वस्तुविवर्तस्या- वस्तुनोऽज्ञानादेः प्रपञ्चस्य वस्तुमात्रत्वम्।” (२१) सविकल्पक एवं निर्विकल्पक समाधि- मुक्ति की दिशा में जीव के लिए समाधि की उपयोगिता एवं महत्त्व को प्रायः सभी दर्शनों ने स्वीकार किया है। वेदान्तदर्शन ने भी इसका उल्लेख किया है। तदनुसार-ध्यान की उत्कृष्ट अवस्था को समाधि कहते हैं। इसके आठ अङ्ग होते हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इनमें से समाधि साधक की उत्कृष्ट अवस्था भी मानी गई है। इसे (क) सविकल्पक (ख) निर्विकल्पक मुख्यरूप से दो भागों में विभाजित किया गया है। सविकल्पकसमाधि में ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय इन तीनों की स्वतन्त्र स्थिति का ज्ञान बना रहता है। इस अवस्था में साधक को अपने अस्तित्व का भान रहता है। साथ ही उसे अद्वैतवस्तु ब्रह्म की भी प्रतीति होती रहती है तथा उस ज्ञान का भी वह दर्शन अथवा अनुभूति करता है, जिसके कारण उसे ब्रह्मतत्त्व की प्रतीति हुई है। उसकी इस स्थिति को एक उदाहरण द्वारा भलीप्रकार समझा जा सकता है- जिसप्रकार मिट्टी का हाथी देखने वाले को हाथी की प्रतीति होने पर भी उसके मिथ्या होने का बोध बना रहता है, सत्यता वहाँ मिट्टी की ही होती है। ठीक उसीप्रकार सर्वव्यापक, अक्षर, मायातीत परब्रह्मरूप चित्तवृत्ति से आकारित ज्ञाता, ज्ञान एवं ज्ञेय की प्रतीति होने पर भी वह उसे असत्य मानता है, सत्यता केवल परब्रह्म की स्वीकार करता है। इसी मनःस्थिति किंवा अनुभूति को दर्शन की भाषा में 'सविकल्पक समाधि' कहा गया है। आचार्य सदानन्द का इस विषय में कथन है- सविकल्पको नाम ज्ञातृज्ञानादिविकल्पलयनपेक्षयाऽद्वितीयवस्तुनि तदाकाराकारितायाश्चित्तवृत्तेरव- स्थानम् मृण्मयमजादिभानेऽपि मृद्भावन्वद् द्वैतभानेऽप्यद्वैतवस्तुभासदेः

भूमिका ९५ निरन्तर ध्यान करने के परिणामस्वरूप जब साधक को ज्ञाता, ज्ञान आदि विकल्पों का भान नहीं रहता है तथा उसकी चित्तवृत्ति एकमात्र अद्वितीय वस्तु ब्रह्म में ही एकीभाव को प्राप्त कर लेती है, उसे अपना व ज्ञान दोनों में से किसी का बोध नहीं रहता। उसी स्थिति को दर्शन निर्विकल्पक समाधि कहता है। यही साधक की उत्कृष्टतमस्थिति है। इसे उदाहरण द्वारा हम इसप्रकार प्रदर्शित कर सकते हैं- जिसप्रकार पानी में घुल जाने पर नमक के अस्तित्व की प्रतीति प्रत्यक्षतः नहीं होती है, जबकि उसका अस्तित्व विद्यमान रहता है। ठीक इसीप्रकार जब चित्तवृत्ति उस अद्वितीयवस्तु ब्रह्म के साथ आत्यन्तिक तादात्म्य को प्राप्त कर लेती है। उससमय चित्तवृत्ति का अस्तित्व होने पर साधक को उसकी प्रतीति नहीं होती, एकमात्र ब्रह्म का ही बोध होता है। बस यही निर्विकल्पक समाधि कहलाती है। इस विषय में विद्यारण्यस्वामी कहते हैं- ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद्ध्येयैकगोचरम्। निवातदीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते॥ अर्थात् जिससमय चित्त, ध्याता एवं ध्यान की प्रतीति का परित्याग करके एकमात्र ध्येय ब्रह्मतत्त्व की अनुभूति करता है, उसे समाधि कहते हैं। इस अवस्था में चित्त वायुरहित स्थान में रखे दीपक के समान पूर्णतया निश्चल हो जाता है। आचार्य सदानन्द इसका इसप्रकार उल्लेख करते हैं- “निर्विकल्पकस्तु ज्ञातृज्ञानादिविकल्पलयापेक्षयाद्वितीयवस्तुनि तदाकारा कारितायाश्चित्तवृत्तितितरामेकाकीभावेनावस्थानम्” अर्थात् ज्ञाता एवं ज्ञान आदि के भेद का लोप होकर एकमात्र अद्वैतवस्तु ब्रह्म में तदाकार आकारित चित्तवृत्ति का एकीभाव ही निर्विकल्पक समाधि अथवा ज्ञान कहलाता है। (२२) जीवन्मुक्त का लक्षण-चार्वाक को छोड़कर सभी भारतीयदर्शनों की मान्यता है कि संसार में प्रत्येक प्राणी को अपने किए हुए कर्मों का फल भोगना पड़ता है। यह फल शुभ, अशुभ अथवा शुभाशुभ किसी भी प्रकार का हो सकता है, किन्तु कोई भी साधक विवेकज्ञान द्वारा इस कर्मफल को भस्मसात् करने में समर्थ है। मुण्डकोपनिषद् का यह कथन भी इसकी पुष्टि में प्रमाण है-

९६ वेदान्तसार भिद्यते हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥ (2/2/8) अर्थात् परमब्रह्म के साक्षात्कार के पश्चात् साधक की अज्ञानग्रन्थि विनष्ट हो जाती है तथा उसके सभीप्रकार के कर्म क्षीण होकर सभी संशय दूर हो जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भी अग्नि द्वारा ईंधन को भस्मसात् करने का उदाहरण देते हुए ज्ञानरूपी अग्नि से सभीप्रकार के कर्मों को जला डालने की बात कही गयी है- यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा। (4/37) फल की दृष्टि से कर्मों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है-(1) सञ्चितकर्म, (2) क्रियमाणकर्म, (3) प्रारब्धकर्म। अनादिकाल से किए गए कर्म जिनका फल अभी प्राप्त नहीं हुआ है, सञ्चितकर्म कहलाते हैं। मन, वाणी, कर्म द्वारा वर्तमानजन्म में किए जा रहे कर्म क्रियमाणकर्मों की श्रेणी में आते हैं, क्रियापूर्ण होने पर ये ही सञ्चितकर्मों की कोटि में आ जाते हैं। चिरकाल के सञ्चितकर्म जब फलोन्मुख होकर शुभाशुभ फल प्रदान करने में तत्पर हो जाते हैं, उन्हें प्रारब्धकर्म कहा जाता है। सञ्चित, क्रियमाण तथा प्रारब्धकर्मों का चक्र व्यक्ति के जीवन में निरन्तर चलता रहता है, किन्तु इस कर्मबन्धन से छुटकारा ज्ञान के उदय या फल के भोग द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। वेदान्त ज्ञान को मुक्ति का एकमात्र साधन मानता है। शङ्कराचार्य के अनुसार-'जिसप्रकार आग के बिना भोजन नहीं पकाया जा सकता है, उसीप्रकार ज्ञान के बिना मोक्षप्राप्ति असम्भव है।' यहाँ ज्ञान से अभिप्राय ब्रह्मज्ञान से ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वेदान्त अज्ञान को अनर्थ का मूलकारण स्वीकार करता है। वेदान्त के अनुसार यह अज्ञान ही जीव में अनेकप्रकार की भ्रान्तियाँ उत्पन्न करता है, जो उसके बन्धन का कारण बनती हैं। अज्ञान से उत्पन्न इन सभी भ्रान्तियों का निवारण सद्गुरु के मार्गदर्शन एवं उपदेश द्वारा प्रदत्त ज्ञान से सम्भव है। अज्ञान. के विनष्ट होने पर जीव को आत्मबोध ठीक उसीप्रकार हो जाता है, जैसे बादलों के हट जाने पर सूर्य का प्रकाश हो जाता है, किन्तु ज्ञान का प्रकाश होने पर साधक को तुरन्त मुक्ति नहीं मिलती, क्योंकि उसे अपने पूर्वजन्मों के सञ्चितकर्मों के फल को भोगना पड़ता है।

भूमिका ९७ शङ्कराचार्य के मतानुसार ब्रह्मज्ञान होने के पश्चात् भी साधक को प्रारब्ध कर्मों का फल भोगना पड़ता है। उनके अनुसार जिसप्रकार कुम्हार बर्तन बनाने वाले चक्र (कुलाल) में दण्ड द्वारा गति उत्पन्न करता है; बाद में दण्ड हटाने पर भी वह स्वतः वेगपूर्वक चलता रहता है। वह वेग की समाप्ति पर ही रुकता है। ठीक उसीप्रकार विपाक की ओर उन्मुख प्रारब्ध कर्मों का क्षय उनके भोग के बाद ही होता है, पहले नहीं। इसी बात को उन्होंने बाण का उदाहरण देकर भी समझाया है। जिसप्रकार धनुष से छोड़ा गया बाण अपनी गति समाप्त करने पर ही रुकता है। उसीप्रकार प्रारब्धकर्मों का क्षय भी उनका उपभोग करने के बाद ही होता है। इसलिए जो गीता अथवा उपनिषद्ग्रन्थों में कर्मों के भस्मसात् होने की बात कही गयी है, वहाँ उनका अभिप्राय क्रियमाणकर्म से ही ग्रहण करना चाहिए, प्रारब्ध या सञ्चितकर्मों से नहीं। इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि जीवन्मुक्त अपने शरीर एवं इन्द्रियों द्वारा पूर्व-वासनाओं के प्रभाव से कर्म करता है तथा प्रारब्धकर्मों का भोग करता है। वह ज्ञान की दृष्टि से ही समस्त कर्मफलों का उपभोग करता है, क्योंकि इस स्थिति में वह सम्पूर्ण सांसारिक व्यवहार को मिथ्याप्रपञ्च के रूप में ही देखता है, वास्तविक रूप में नहीं। इसे जादूगर (इन्द्रजालिक) के दृष्टान्त द्वारा सरलतापूर्वक समझाया जा सकता है- मंच के ऊपर जादूगर जो भी प्रपञ्च प्रदर्शित करता है। वह वस्तुतः असत्य ही होता है, किन्तु उसके मिथ्यात्व की प्रतीति केवल जादूगर को ही होती है, अन्यों को नहीं। वहाँ उपस्थित सभी दर्शक उसके द्वारा प्रदर्शित समस्तप्रपञ्च में परमार्थ अर्थात् सत्यतत्त्व का ही दर्शन करते हैं। ठीक इसीप्रकार जीवन्मुक्त संसार के पदार्थों के मिथ्यात्व को जानने के कारण उनमें लिप्त नहीं होता है। इस कारण वह आँखों वाला होते हुए भी आँखों वाला नहीं होता तथा कानों वाला होते हुए भी कानों वाला नहीं होता है। उसकी स्थिति कमल के पत्ते पर रखी जल की बूँद के समान होती है जो संसार में रहते हुए भी उसमें लिप्त नहीं रहता है, स्वयं को पृथक् बनाए रखता है। जीवन्मुक्त की अवस्था में साधक यद्यपि अपने शरीर को धारण किए रहता है, किन्तु वास्तव में वह देह के प्रति अभिमान का ही परित्याग कर देता है। वह सभीप्रकार के विरोधों एवं द्वन्द्वों से मुक्त हो जाता है। उसका

९८ वेदान्तसार शत्रु, मित्र, मान, अपमान, लाभ-हानि, सुख-दुःख आदि भावनाएँ पूर्णतया शान्त हो जाती हैं। सामान्य लोगों के व्यवहार की अपेक्षा जगत् के प्रति इसका व्यवहार विलक्षण होता है। जीवन्मुक्त के व्यवहार के सम्बन्ध में शङ्कराचार्य का कथन है- सुषुप्तवज्जाग्रति यो न पश्यति द्वयं च पश्यन्नपि चाद्वयत्वतः। तथा च कुर्वन्नपि निष्क्रियश्च यः स आत्मविन्नान्य इतीह निश्चयः॥ (उपदेशसाहस्री-5) यम-नियमों के अनुष्ठान द्वारा वह अशुभकर्मों का परित्याग कर शुभ कर्मों में प्रवृत्त रहता है। अष्टाङ्गयोग का अनुष्ठान साधक के लिए पुण्य सञ्चय का कार्य करता है। शुभकर्मों के प्रति प्रवृत्ति ही उसके ब्रह्म साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करती है। उसका शरीर प्रारब्धकर्मफल भोगने पर्यन्त ही विद्यमान रहता है। प्रारब्धकर्मों के पूर्णक्षय के साथ ही उसका शरीरपात हो जाता है तथा वह पूर्णकाम, आप्तकाम और निष्काम बन जाता है। अन्ततः सभीप्रकार की इच्छाओं से मुक्त होने पर वह ब्रह्म ही बन जाता है। जीवन्मुक्त की मोक्षावस्था के बारे में आचार्यों का कथन है कि जिसप्रकार वायु पुष्प के मध्य में स्थित गन्धकोष से गंध लेकर बहता है। उसीप्रकार सामान्यरूप से लिङ्गशरीर, मनसहित इन्द्रियों को ग्रहण करके एक शरीर का परित्याग कर दूसरे शरीर में प्रवेश करता है, किन्तु जीवन्मुक्त का न केवल प्रारब्धकर्मों के उपभोग से स्थूलशरीर, अपितु अज्ञान के हेतु रूप में अविद्यमान होने के कारण सूक्ष्मशरीर, यहाँ तक कि ज्ञान के उदय से कारणशरीर भी विनष्ट हो जाता है। इसप्रकार इन तीनों शरीरों के समाप्त होने से साधक देहमुक्त होकर परमब्रह्म में ठीक उसीप्रकार विलीन हो जाता है, जैसे- तप्ततवे पर गिरी जल की बूँदें उसी में समा जाती हैं या समुद्र में उठने वाली लहरें उसी में विलीन हो जाती हैं। जिसप्रकार लहरों के समुद्र में समा जाने पर समुद्र और लहरों में किसीप्रकार का कोई भेद नहीं रहता है, ठीक उसीप्रकार जीवन्मुक्त एवं परमब्रह्म में कोई भेद नहीं रहता है। (२३) आत्मविषयक विभिन्न मत-आचार्य सदानन्द ने वेदान्तसार में बौद्ध, चार्वाक एवं मीमांसक आचार्यों के आत्मविषयक मतमतान्तरों को प्रस्तुत करते हुए वेदान्त की दृष्टि से यथार्थरूप में आत्मतत्त्व का प्रतिपादन

भूमिका ९९ किया है। इस क्रम में इन्होंने सर्वप्रथम अत्यन्त सामान्यलोगों की दृष्टि को प्रस्तुत करते हुए कहा कि- (1) अत्यन्त साधारण लोग अपने समान ही अपने पुत्र के प्रति प्रेम होने तथा पुत्र के नष्ट-पुष्ट होने पर व्यक्ति को यह अनुभव होता है कि मैं नष्ट हो गया या मैं पुष्ट हो गया। इतना ही नहीं अनेकशः तो वह अपने से बढ़कर पुत्र को मानता है, क्योंकि स्वयं भूखा रहकर अपने पुत्रों को खिलाकर प्रसन्नता का अनुभव करता है। श्रुति को भी इस विषय में प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया गया है-“आत्मा वै जायते पुत्रः" अतः पुत्रों के प्रति व्यक्ति का अगाध प्रेम होने के कारण पुत्र को ही आत्मा कहना संगत है। (2) इसके विपरीत मधुर लगने वाले वचनों का कथन करते हुए, बृहस्पतिशिष्य चार्वाकमत को स्वीकार करने वाले आचार्यों ने अन्न एवं रस से बने इस शरीर को ही आत्मा माना। उनके अनुसार-मनुष्य जलते हुए घर में अपने पुत्र को छोड़कर अपनी जान बचाकर स्वयं बाहर आ जाता है। इसलिए उसका पुत्र की अपेक्षा अपने शरीर के प्रति अधिक प्रेम प्रदर्शित होता है, इसकारण तथा 'स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः' (वह पुरुष (आत्मा) अन्नरस का विकार है, इत्यादि श्रुतिवचनों से, साथ ही मैं मोटा हो गया हूँ, मैं दुर्बल हो गया हूँ इत्यादि अनुभवप्रमाण से स्थूलशरीर को ही आत्मा मानना उचित है। (3) पुत्रात्मवाद एवं शरीरात्मवाद का खण्डन करते हुए अन्य चार्वाक आचार्यों ने तर्क प्रस्तुत करते हुए इन्द्रियों को ही आत्मा माना है। तदनुसार-'सुषुप्तिकाल में शरीर चेष्टाविहीन हो जाता है। अतः इस शरीर को आत्मा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि चैतन्य से होने वाली शारीरिक चेष्टा इन्द्रियों के होने पर ही होती है। उनके अभाव में शरीर चेतनावहीन हो जाता है। इसके अतिरिक्त इन्द्रियों में विकृति आने पर मैं काना हूँ, मैं बहरा हूँ, इत्यादि अनुभव होता है। साथ ही 'ते ह प्राणाः प्रजापतिपितरमेत्य ब्रूयुः' इत्यादि श्रुतिवचन भी इसमें प्रमाण है। अतः इन्द्रियों को ही आत्मा मानना युक्तियुक्त है। (4) जबकि अन्य चार्वाक आचार्यों ने प्राणों को आत्मा माना है। उनके मत में वस्तुतः शरीर, पुत्र अथवा इन्द्रिय आत्मा नहीं है, अपितु प्राण ही आत्मा है, क्योंकि प्राणों के नष्ट होने पर समस्त इन्द्रियाँ निश्चल हो

१०० वेदान्तसार जाती हैं, अपने विषयों को ग्रहण करना बन्द कर देती हैं तथा प्राणों की उपस्थिति में ही अपने विषयों को ग्रहण करने में समर्थ हो पाती हैं। साथ ही मैं भूखा हूँ, मैं प्यासा हूँ इत्यादि अनुभव प्राणों के द्वारा ही होता है। 'अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः' इत्यादि श्रुति भी इसमें प्रमाण है। इन सभी कारणों से प्राणों को ही आत्मा कहना तर्कसंगत है। (5) उक्त चारों मतों का खण्डन करते हुए अन्य चार्वाक आचार्य मन को ही आत्मा कहते हैं। उनके अनुसार-सुषुप्ति अवस्था में जब मन सो जाता है तो प्राणादि का भी अभाव देखा गया है। मन की जाग्रत अवस्था में ही प्राण, इन्द्रियाँ, शरीरादि कार्य करते हुए देखे जाते हैं। अतः मन को ही आत्मा कहना न्यायसंगत है। इसके अलावा मैं संकल्पवान् हूँ, मैं विकल्पवान् हूँ, नित्यप्रति ऐसा अनुभव होने से तथा 'अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः' इत्यादि श्रुतिवचनों से मन को ही आत्मा मानना चाहिए। (6) उपर्युक्त सभी चार्वाक मतों के खण्डन में बौद्ध दार्शनिकों ने बुद्धि में आत्मतत्त्व का प्रतिपादन करते हुए कहा-वस्तुतः बुद्धि ही आत्मा है, क्योंकि घटादि के निर्माण के लिए जिसप्रकार कुम्हार की उपस्थिति आवश्यक है, ठीक उसीप्रकार मन आदि इन्द्रियों में चेष्टा-सामर्थ्य के लिए उनके अधिष्ठातास्वरूप बुद्धि का अस्तित्व अनिवार्य है। मन को तो कुम्हार के चक्र के समान करणमात्र कहा जा सकता है, यही कुम्हाररूपी बुद्धि विद्यमान न हो तो मनरूपी चक्र घटादि का निर्माण करने में समर्थ नहीं होता है। साथ ही मैं कर्ता, मैं भोक्ता इत्यादि अनुभव एवं 'अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः' इत्यादि श्रुतिवचन, इसमें प्रमाण है। अतः इन सब कारणों से बुद्धि को ही आत्मा कहना तर्कसंगत सिद्ध करता है। (7) उक्त सभी मतों का निराकरण करते हुए प्रसिद्ध मीमांसक प्रभाकर भट्ट एवं नैयायिकों ने अज्ञान में आत्मतत्त्व का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार-बुद्धि आदि का भी अज्ञान में लीन होना देखा गया है। मैं अज्ञानी हूँ, इसप्रकार का अनुभव भी लोगों को होता ही है तथा सुषुप्तिकाल में बुद्धि आदि का भी अज्ञानरूप आत्मा में विलय होना देखा गया है। साथ ही 'अन्योऽन्तर आत्मा आनन्दमयः' इत्यादि श्रुतिवचनों के कारण, अज्ञान को आत्मा कहना युक्तियुक्त है। (8) उपर्युक्त मतों से भिन्नमत का प्रतिपादन करते हुए प्रसिद्ध मीमांसक कुमारिलभट्ट एवं उनके अनुयायी आचार्यों ने अज्ञानरूप उपाधि से युक्त

भूमिका १०१ चैतन्य को आत्मा बताया। तदनुसार-अज्ञानघन और आनन्दमय आत्मा है, क्योंकि सुषुप्तिकाल में ज्ञान एवं अज्ञान दोनों के विद्यमान होने के कारण आत्मा में भी ज्ञान एवं अज्ञान दोनों का ही अस्तित्व रहता है। सोकर उठने के बाद व्यक्ति का यह अनुभव कि 'मैं खूब अच्छीप्रकार सोया अथवा ऐसा सोया कि मुझे कुछ भी पता नहीं लगा' प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। 'प्रज्ञान घन एवानन्दमयः' इत्यादि श्रुति भी इसमें प्रमाण है। (9) इसी क्रम में बौद्धमतावलम्बी एक अन्य मत शून्य को आत्मा मानता है। उनके विचार में-सुषुप्ति के समय सबका अभाव होने के कारण, अपनी सत्ता का भी भान न कराने वाली सुषुप्ति में किसी भी प्रकार की अनुभूति न होने से आत्मा का अभाव अर्थात् शून्य होना ही सिद्ध होता है। इसके अतिरिक्त 'असदेवेदमग्र आसीत्' इत्यादि श्रुति भी इस कथन में प्रमाणरूप में प्रस्तुत की गई है। आत्मविषयक उपर्युक्त मतों का पूर्वपक्ष के रूप में उल्लेख करने के पश्चात् आचार्य सदानन्द कहते हैं कि-अत्यन्त सामान्य लोगों द्वारा उदाहरण रूप में कहे गए श्रुतिवचनों, युक्तियों और अनुभवों में पूर्व-पूर्व में कही गई बात का, उत्तरोत्तर कही गई बात द्वारा स्वतः ही आत्मत्वविषयक कथन का बाध हो जाने से पुत्र आदि का आत्मा न होना स्पष्ट होता है। पुनरपि श्रुतिवाक्यों में परस्पर विरोध होने से सत्यता को जानने की जिज्ञासा अवश्य होती है, क्योंकि श्रुति वेदवाक्य होने के कारण शङ्का का विषय नहीं है। वेदवाक्य किसी भी परिस्थिति में अप्रामाणिक नहीं हो सकता है। फिर भी इन श्रुतिवाक्यों का उद्देश्य अरुन्धतीन्याय से स्थूल से सूक्ष्म का ज्ञान कराना ही कहा जा सकता है। इस प्रसंग में अरुन्धती न्याय को समझना उचित होगा। ( २४) अरुन्धतीन्याय-अरुन्धती एक अत्यन्त सूक्ष्म तारा है। विस्तृत आकाश में उसे सहजरूप में नहीं पहचाना जा सकता है। इसके लिए विद्वानों ने एक युक्ति का कथन किया है। सबसे पहले उस व्यक्ति को चन्द्रमा की ओर संकेत करके कहा जाता है कि यही अरुन्धती है। ऐसा कहने पर उसका ध्यान पूरे आकाश से हटकर चन्द्रमा पर केन्द्रित हो जाता है। तत्पश्चात् उसे कहा जाता है कि चन्द्रमा अरुन्धती नहीं है, अपितु उसके समीप स्थित सात तारे अरुन्धती हैं, पुनः उन सातों में से अन्तिम तीन तारों की ओर संकेत करके उनके अरुन्धती होने की बात कहते हैं।

१०२ \hfill वेदान्तसार

इसके बाद उन तीन तारों में से भी बीच के तारे को अरुन्धती बताकर उसके भी समीप स्थित अतिसूक्ष्म तारे की पहचान करवाते हैं। इसप्रकार इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में पाँच वाक्यों को आधार बनाते हैं- (क) चन्द्रमा (ख) सात तारे (ग) तीन तारे (घ) तीनों के बीच वाला तारा (ङ) बीच वाले के पास वाला सूक्ष्मतारा। इसप्रकार ज्ञाता को समझाने की दृष्टि से उसके बुद्धिस्तर को ध्यान में रखते हुए सीढ़ी के समान पूर्व-पूर्व का परित्याग करके सूक्ष्मतम अरुन्धती की पहचान कराना सरलकार्य हो जाता है। ठीक उसीप्रकार पुत्र आत्मा है, इत्यादि परस्परविरुद्ध अर्थों का प्रतिपादन करने वाले श्रुतिवाक्य कहे गए हैं, किन्तु इसमें जिज्ञासु की सामर्थ्य के अनुसार पूर्व-पूर्व का क्रमशः परित्याग करके उत्तरोत्तर सूक्ष्मब्रह्म का प्रतिपादन करना ही अभीष्ट है। अतः यहाँ परस्परविरोध की प्रतीति का लेशमात्र भी औचित्य नहीं है। इसलिए नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त एवं सत्यस्वभाव वाला आन्तरिक चैतन्य ही आत्मा है, अन्य कोई नहीं तथा वही यथार्थ है, ऐसा वेदान्तियों का मत है। (२५) महावाक्य- जीव और ब्रह्म में ऐक्य प्रतिपादन वेदान्तदर्शन का मुख्य विषय है। इसके अनुसार अज्ञान से ग्रस्त जीव अपने आपको ब्रह्म से अलग समझने लगता है। इसी अज्ञान के कारण उसे बार-बार संसार में जन्म लेना पड़ता है। आवागमन के इन असह्य कष्टों से मुक्ति पाने के लिए वह सद्गुरु की शरण में जाता है, जो उसे तत्त्वमसि इत्यादि वाक्यों के रूप में उपदेश प्रदान करता है। गुरु के उपदेश द्वारा जीव का अज्ञानरूपी अन्धकार विनष्ट हो जाता है और वह अपने आपको 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) इस अनुभववाक्य के रूप में पहचान लेता है। वेदान्तदर्शनविषयक ग्रन्थों में यद्यपि 12 महावाक्यों का उल्लेख किया गया है- तत्त्वमसि,$^1$ अहं ब्रह्मास्मि,$^2$ अयमात्माब्रह्म$^3$ एष ते आत्माऽन्तर्याम्यमृतः,$^4$ स यश्चायम्,$^5$ पुरुषे यश्चासौ,$^6$ आदित्ये स एकः,$^7$


  1. छान्दोग्योपनिषद्-6/8/7
  2. बृहदारण्यकोपनिषद्-1/4/10
  3. वही, 1/5/19
  4. वही, 3/7/3
  5. तैत्तिरीयोपनिषद्-2/8/1
  6. वही, 3/2/8
  7. वही, 2/8/1

भूमिका १०३ प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्मविज्ञानमानन्दं ब्रह्म,¹ सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म,² स एवमेवं पुरुषो ब्रह्म,³ सर्वं खल्विदं ब्रह्म,⁴ एकमेवाद्वितीयम्।⁵ इन महाकाव्यों में से प्रज्ञानं ब्रह्म, अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वमसि तथा अयमात्मा ब्रह्म इन चार को अत्यधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि ये चारों महावाक्य चार वेदों का प्रतिनिधित्व भी करते हैं, किन्तु आचार्य सदानन्द ने अपने वेदान्तसार में केवल दो महावाक्यों का निरूपण किया है (क) तत्त्वमसि (ख) अहं ब्रह्मास्मि। अतः हम यहाँ इन्हीं दोनों महावाक्यों का ही विवेचन प्रस्तुत करेंगे। (क) तत्त्वमसि - (उपदेशवाक्य) अर्थात् वह शुद्धचैतन्यस्वरूप ब्रह्म तुम हो। यह उपदेशवाक्य सद्गुरु अधिकारीशिष्य से कहता है। इस वाक्य में जीव और ब्रह्म का ऐक्य प्रतिपादन किया गया है, किन्तु इस सम्बन्ध में एक शंका होती है कि वेदान्त के अनुसार जीव अल्पज्ञ है और ब्रह्म को सर्वज्ञ बताया गया है तो फिर 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य द्वारा इन दोनों में ऐक्य का प्रतिपादन कैसे किया जा सकता है? जिसके लिए आचार्य सदानन्द ने तीन प्रकार के सम्बन्धों का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है (1) समानाधिकरण्यसम्बन्ध (2) विशेषण विशेष्यभावसम्बन्ध तथा (3) लक्ष्यलक्षणभावसम्बन्ध। इन त्रिविध सम्बन्धों द्वारा तत्त्वमसि वाक्य जीव और ब्रह्म के अखण्ड अर्थ का बोध कराता है। इस विषय में आचार्य सुरेश्वर भी कहते हैं- सामानाधिकरण्यञ्च विशेषणविशेष्यता। लक्ष्यलक्षणसम्बन्धः पदार्थप्रत्यगात्मनाम्। (नैष्कर्म्यसिद्धि 3/3) (१) समानाधिकरण्यसम्बन्ध- आचार्य सदानन्द इस सम्बन्ध की व्याख्या दो उदाहरण देकर प्रस्तुत करते हैं- सोऽयं देवदत्तः तथा तत्त्वमसि। इन दोनों वाक्यों का उद्देश्य एकत्व की प्रतीति करना है। 'यह वही देवदत्त है' इत्यादि प्रथम वाक्य किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा कहा गया है जिसने कुछ


  1. ऐतरेयोपनिषद्- 5/3
  2. तैत्तिरीयोपनिषद्-2/1/1
  3. ऐतरेयोपनिषद्- 3/13
  4. छान्दोग्योपनिषद्-3/19/1
  5. वही, 6/2/1

१०४ वेदान्तसार समय पूर्व देवदत्त को अन्यत्र किसी स्थान पर देखा था। उसी देवदत्त को अपने सामने पाकर वह व्यक्ति पहले देखे गए देवदत्त को याद करके अनायास ही कह उठता है—‘अरे! यह तो वही देवदत्त है’ (सोऽयं देवदत्तः) इस वाक्य में प्रयुक्त ‘सः’ शब्द तत्काल एवं तद्देशविशिष्ट देवदत्त का बोध कराने वाला है, जबकि ‘अयम्’ शब्द से एतत्काल, एतद्देशविशिष्ट देवदत्त का बोध होता है। यद्यपि सामान्यदृष्टि से हमें इस वाक्य में उस समय एवं उस स्थान तथा इस समय और इस स्थान के कारण काल तथा देशगत विरोध की प्रतीति होती है, तथापि सामानाधिकरण्यसम्बन्ध से इन दोनों शब्दों का अर्थ एक ही देवदत्तरूप पिण्डविशेष में पर्यवसित हो जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि इस सम्बन्ध द्वारा ये दोनों पद (सः और अयम्) एक ही देवदत्त का बोध कराते हैं। ठीक इसीप्रकार ‘तत्त्वमसि’ इस महावाक्य में प्रयुक्त ‘तत्’ शब्द परोक्षत्व एवं सर्वज्ञत्व आदि गुणों से विशिष्टचैतन्य का कथन करता है तथा ‘त्वम्’ पद प्रत्यक्षत्व एवं अल्पज्ञत्व आदि गुणों से विशिष्ट चैतन्य अर्थात् जीव का वाचक है। पूर्ववाक्य ‘सोऽयं देवदत्तः’ के अनुसार ही यद्यपि यहाँ भी तत् एवं त्वम् पदों के अर्थों में परोक्षत्व एवं प्रत्यक्षत्व तथा सर्वज्ञत्व और अल्पज्ञत्व के कारण प्रथमदृष्टि में विरोध की प्रतीति होती है, किन्तु यहाँ प्रतीत होने वाला विरोध वास्तविक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ‘तत्’ पद द्वारा जिस चैतन्य की तथा ‘त्वम्’ पद द्वारा जिस चैतन्य की यहाँ प्रतीति हो रही है, उन दोनों में कोई भेद नहीं है। वस्तुतः इन दोनों में भी पूर्ववत् सामानाधिकरण्य सम्बन्ध द्वारा एक चैतन्य में समानरूप से तात्पर्य परिलक्षित होने से इन दोनों में अभेद का बोध कराया जा रहा है। (२) विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध—जो शब्द अपने विशेष्य को अन्य शब्दों द्वारा विशेषरूप से अलग कर देता है, विशेषण तथा जो विशेषरूप से अलग होता है, वह विशेष्य कहलाता है। जैसे—‘नीलोत्पलम्’ इत्यादि वाक्य में ‘नील’ पद विशेषण तथा ‘उत्पल’ विशेष्य है। यहाँ विशेषण ‘नील’ पद विशेष्य उत्पल अर्थात् कमल को नीले रंग से भिन्न सभी लाल, पीले, श्वेत आदि रंगों से अलग कर देता है। इसप्रकार यहाँ प्रयुक्त विशेषण न केवल विशेष्य की विशेषता प्रदर्शित करता है, अपितु उसके विरोधीधर्मों से भी उसकी भिन्नता बताकर विरोधी धर्मों का व्यावर्तन कर देता है। ठीक इसीप्रकार ‘सोऽयं देवदत्तः’ इस वाक्य में ‘सः’ और ‘अयम्’ ये दोनों पद

भूमिका १०५ आपस में विशेषणविशेष्य बनकर विरोधी अंशों का व्यावर्तन करके देवदत्त में एकत्व की प्रतीति कराते हैं। इसलिए इस वाक्य द्वारा विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध से एक देवदत्त का ही बोध होता है। इस सम्बन्ध के आधार पर ‘सः’ पद ‘अयम्’ का विशेषण तथा ‘अयम्’ को ‘सः’ का विशेष्य मान लिया जाता है तथा तत्कालविशिष्ट एतत् कालविशिष्ट में प्रतीत होने वाले विरोध का व्यावर्तन होने से अयम् पद सः का विशेषण बन जाता है। इसप्रकार दोनों पद परस्परभेद के व्यावर्तक होने से देवदत्त पिण्ड अर्थात् व्यक्ति में एकत्व का बोध कराते हैं। ठीक इसीप्रकार विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध से ‘तत्त्वमसि’ इस वाक्य में भी जीव और ब्रह्म में ऐक्य की सिद्धि की जाती है। इस स्थिति में ‘तत्’ पद से सामान्यतया परोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्य तथा ‘त्वम्’ पद से अपरोक्षत्वादि विशिष्टचैतन्यरूप अर्थ के कारण भेद की प्रतीति होती है, किन्तु इनके परस्पर प्रतीत होने वाले इस भेद को विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध द्वारा दूर कर दिया जाता है। इस व्यावर्तन के परिणामस्वरूप दोनों पदों से विशुद्ध चैतन्यमात्ररूप अर्थ की प्रतीति होती है। (३) लक्ष्यलक्षणसम्बन्ध–सामान्यरूप से अभिधा शब्दशक्ति पदों के साक्षात् संकेतित अर्थ का बोध कराती है, किन्तु मुख्यार्थ के बाध होने पर रूढ़ि अथवा प्रयोजनवश उससे सम्बन्धित अर्थ की प्रतीति लक्षणा शब्द शक्ति द्वारा करायी जाती है। जैसे–‘सोऽयं देवदत्तः’ यहाँ प्रयुक्त ‘सः’ पद का मुख्यार्थ भूतकालविशिष्ट देवदत्त तथा ‘अयम्’ का वाच्यार्थ एतत्काल विशिष्ट देवदत्त होगा। तत्कालविशिष्ट और एतत्कालविशिष्ट में यहाँ प्रत्यक्षतः विरोध प्रतीत हो रहा है, किन्तु प्रतीत होने वाले इस विरोध का परित्याग करके अविरुद्ध अंश देवदत्त में अर्थग्रहण करने के लिए यहाँ लक्षणा का आश्रय लेना आवश्यक हो जाता है। जिसके द्वारा यह अर्थावबोध कराया गया है। वस्तुतः यह लक्षणा सामान्यलक्षणा से भिन्न ‘जहदजहल्लक्षणा’ मानी गई है, क्योंकि उक्त वाक्य में ‘सः’ और ‘अयम्’ पदों द्वारा प्रदर्शित वाच्यार्थों के विरुद्धांशों को त्यागकर केवल अविरुद्ध तत्त्व देवदत्त में ही अभिप्राय ग्रहण किया गया है। अतः थोड़ा-सा छोड़ देने

१०६ वेदान्तसार (जहत्) तथा थोड़ा सा ग्रहण कर लेने (अजहत्) के कारण इसे सामान्य लक्षणा से भिन्न जहदजहल्लक्षणा कहा गया है। इसीको 'भागलक्षणा' भी कहते हैं। तत्त्वमसि वाक्य में भी इसी भागलक्षणा द्वारा 'तत्' एवं 'त्वम्' पदों के वाच्यार्थ में स्थित विरुद्धांशों का परित्याग करके उनमें स्थित अविरुद्धांश अखण्डचैतन्य को ग्रहण करके ही वाक्यार्थ का बोध कराया जाता है। यहाँ तत् एवं त्वम् पदों का विरुद्धांशरहित वाच्यार्थ लक्षक कहा जाएगा तथा अखण्डचैतन्यरूप अर्थ लक्ष्य होगा। उस स्थिति में लक्ष्यलक्षणसम्बन्ध तथा भागलक्षणा द्वारा विरुद्ध अंश (परोक्षत्वादि विशिष्ट-अपरोक्षत्वादि विशिष्ट) का परित्याग करके अविरुद्ध अंश का ग्रहण करने पर अखण्ड चैतन्य का बोध होगा। इसप्रकार उपर्युक्त तीनों सम्बन्धों के द्वारा अधिकारीशिष्य गुरु की अनुकम्पा से 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य के अखण्ड, एकरसचैतन्यरूप अर्थ के साथ-साथ जीव एवं ब्रह्म के ऐक्य को भी जानने में समर्थ हो जाते हैं। (ख) अहं ब्रह्मास्मि (अनुभववाक्य) - यहाँ तक हमने तत्त्वमसि उपदेशवाक्य तथा उसके अभिप्राय को ग्रहण करने में प्रयुक्त सम्बन्धत्रय का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया। अब हम आचार्य सदानन्द द्वारा वेदान्तसार में वर्णित द्वितीय महावाक्य 'अहं ब्रह्मास्मि' का विवेचन प्रस्तुत करेंगे। वस्तुतः इन दोनों वाक्यों में परस्पर अत्यन्त घनिष्ठसम्बन्ध है, क्योंकि परमकृपालु गुरु से उपदेशवाक्य को सुनकर ही साधक ब्रह्म का साक्षात्कार करने के लिए प्रयत्नशील हो जाता है। वैराग्य आदि साधन-चतुष्टय से सम्पन्न अधिकारी शिष्य की चित्तवृत्ति सच्चिदानन्दघनपरम ब्रह्म के आकार से आकारित होकर प्रकाशित हो उठती है। चित् प्रतिबिम्ब को धारण कर यह चित्तवृत्ति परमब्रह्म को विषय बनाकर ब्रह्मविषयक अज्ञान को विनष्ट कर देती है तथा अज्ञान के नष्ट होने पर वह (चित्तवृत्ति) स्वयं भी नष्ट हो जाती है। इस सम्पूर्णप्रक्रिया की वेदान्त के ग्रन्थों में 'कतक रजोन्याय' के माध्यम से व्याख्या की गई है। जल को स्वच्छ करने वाला कतक चूर्ण जल की मलिनता को दूर करके जिसप्रकार स्वयं भी उसी जल में विलीन हो जाता

भूमिका १०७ है। ठीक उसीप्रकार ब्रह्मविषयक अज्ञान को विनष्ट करके यह चित्तवृत्ति भी समाप्त हो जाती है- अज्ञानकलुषं जीव ज्ञानाभ्यासाद्धि निर्मलम्। कृत्वा ज्ञानं स्वयं नश्येत् जलं कतकरेणुवत्॥ इस विषय में ध्यातव्य है कि चैतन्यविषयक अज्ञानरूपी आवरण के विनष्ट होने के साथ-साथ ही साधक को 'अहं ब्रह्मास्मि' की अनुभूति होने लगती है। इसप्रकार 'अहं ब्रह्मास्मि' इस अनुभव में चित्तवृत्ति का ब्रह्म के आकार से आकारित होना, अज्ञान का विनाश तथा उसी के साथ सकल प्रपञ्च एवं चित्तवृत्ति का भी विलीन होना प्रमुख है। जिससमय साधक को ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है तो तत्त्वज्ञान के परिणामस्वरूप उसका द्वैतभाव भी समाप्त हो जाता है अर्थात् इस अवस्था में अद्वैतभाव की सिद्धि हो जाती है। अतः ब्रह्म को जानने वाला वस्तुतः ब्रह्म ही हो जाता है। यही 'अहं ब्रह्मास्मि' इस अनुभव का परमफल कहा जा सकता है।

वेदान्तसार मूल एवम् 'चन्द्रिका' व्याख्या: मङ्गलाचरण

वेदान्तसारः अखण्डं सच्चिदानन्दमवाङ्मनसगोचरम्। आत्मानमखिलाधारमाश्रयेऽभीष्टसिद्धये॥१॥ अन्वय-सत्-चित्-आनन्दम्, अवाङ्मनसगोचरम्, अखिल-आधारम् अखण्डम्, आत्मानम् अभीष्टसिद्धये आश्रये। अनुवाद-(ग्रन्थ की निर्विघ्नसमाप्ति अथवा त्रिविधदुःख की आत्यन्तिक- निवृत्ति के लिए सत्य, ज्ञान एवं आनन्दस्वरूप, मन, वाणी तथा इन्द्रियों के अविषय, सम्पूर्ण स्थावरजङ्गमस्वरूप प्रपञ्च के आधारस्वरूप, अखण्ड परमात्मा का अभीष्ट (मनोरथ) की सिद्धि के लिए (मैं सदानन्द) आश्रय ग्रहण करता हूँ। 'चन्द्रिका'- किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने से पूर्व मंगलाचरण की भारतीयपरम्परा का निर्वाह करते हुए आचार्य सदानन्द वेदान्तदर्शन के प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार की निर्विघ्नसमाप्ति के लिए परमात्मा का स्मरण करते हुए कहते हैं कि मैं अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए सच्चिदानन्द, अवाङ्मनसगोचर, सम्पूर्णसृष्टि के आधार स्वरूप, अखण्ड, परमपिता परमात्मा का आश्रय लेता हूँ। प्रस्तुत मङ्गलाचरण में प्रयुक्त प्रत्येक पद विस्तृत व्याख्या की अपेक्षा रखता है, क्योंकि गम्भीर अभिप्राय को लिए हुए ये सभी शब्द ग्रन्थकार ने साभिप्राय प्रयुक्त किए हैं। वेदान्तदर्शन एकमात्र परमब्रह्म की सत्ता को स्वीकार करता है, साथ ही आत्मा एवं ब्रह्म की एकता का भी प्रतिपादन करता है। इसीलिए आचार्य सदानन्द ने यहाँ आत्मा शब्द का प्रयोग परमात्मा अथवा ब्रह्म के अर्थ में किया है। वेदान्त के अनुसार मानवजीवन का एकमात्रलक्ष्य परमब्रह्म का सायुज्य प्राप्त करना है। अतः प्रस्तुत श्लोक द्वारा इस ग्रन्थ के प्रयोजन की ओर भी ग्रन्थकार ने सङ्केत किया है। यहाँ आत्मा के चार विशेषणों का प्रयोग किया गया है, जिनमें उसकी सभी विशेषताओं का समावेश हो जाता है। अतः हम यहाँ उनकी क्रमशः व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं।

मङ्गलाचरण १०९ (क) सच्चिदानन्दम्-सभी वेदान्तग्रन्थों में ब्रह्म के लिए इस विशेषण का प्रयोग किया गया है, जो इसकी तीन विशेषताओं की ओर संकेत करता है सत्, चित् और आनन्द। सत् शब्द अस् भुवि धातु से शत् प्रत्यय करके निष्पन्न होता है। इसका अभिप्राय है सत्तावान्। यहाँ प्रयुक्त सत् शब्द भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों में उसकी विद्यमानता का कथन करता है, क्योंकि वेदान्तदर्शन के अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र ऐसी वस्तु है जो तीनों कालों में यहाँ तक कि प्रलय के उपरान्त भी विद्यमान रहती है। यह न केवल सृष्टि के आरम्भ में विद्यमान थी, अपितु वर्तमान में भी है तथा आगे भी रहेगी। अतः यह कालातीत यथार्थसत्ता है। चिती संज्ञाने धातु से क्विप् प्रत्यय करके निष्पन्न 'चित्' शब्द ज्ञान का वाचक है। ब्रह्म को चित् कहकर उसके ज्ञानस्वरूप का प्रतिपादन किया गया है। तैत्तिरीयोपनिषद् कहता है-'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (2/1/1) बृहदारण्यकोपनिषद् उसे विज्ञान कहता है- विज्ञानमानन्दं ब्रह्म (3/9/28)। अतः ब्रह्म विज्ञानमय है। विज्ञान का सामान्य अर्थ है- विशिष्टज्ञान अथवा विशुद्ध ज्ञान। यहाँ ब्रह्म को विज्ञान इसलिए कहा गया है, क्योंकि इसके द्वारा सभी पदार्थ जाने जाते हैं, वह ज्ञानस्वरूप है। चित् शब्द का एक अन्य अर्थ चैतन्य भी है, अर्थात् सभी प्राणियों, वनस्पतिजगत् आदि में जो चैतन्य प्रतीत होता है, वह उनमें ब्रह्म के अस्तित्व को सिद्ध करता है। वाचस्पतिमिश्र ने 'चित्' का अर्थ 'स्वप्रकाशत्व' किया है-स्वप्रकाशत्वं चित्त्वम् (ब्रह्मसूत्र भामतीटीका 1/1/1)। यहाँ स्वयंप्रकाश का अभिप्राय है- किसी अन्य से प्रकाशित न होना, अपितु अपने प्रकाश से सभी को प्रकाशित करना। यही विशेषता वेदान्त के ब्रह्म में विद्यमान है। वह स्वयं प्रकाश है तथा सूर्य आदि तेज-पुञ्जों का भी प्रकाशक है- इस सम्बन्ध में मुण्डकोपनिषद् ब्रह्म को ज्योतिषां ज्योतिः कहता है- हिरण्मये परे कोशे विरज ब्रह्म निष्कलम्। तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः॥ (2/2/9) इसप्रकार यहाँ प्रयुक्त 'चित्' शब्द विज्ञान, ज्ञान, चैतन्य एवं स्वप्रकाशत्व आदि अर्थों की प्रतीति कराता है, जो ब्रह्म अथवा आत्मा के वैशिष्ट्य का कथन करते हैं।