वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 111, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ९७ शङ्कराचार्य के मतानुसार ब्रह्मज्ञान होने के पश्चात् भी साधक को प्रारब्ध कर्मों का फल भोगना पड़ता है। उनके अनुसार जिसप्रकार कुम्हार बर्तन बनाने वाले चक्र (कुलाल) में दण्ड द्वारा गति उत्पन्न करता है; बाद में दण्ड हटाने पर भी वह स्वतः वेगपूर्वक चलता रहता है। वह वेग की समाप्ति पर ही रुकता है। ठीक उसीप्रकार विपाक की ओर उन्मुख प्रारब्ध कर्मों का क्षय उनके भोग के बाद ही होता है, पहले नहीं। इसी बात को उन्होंने बाण का उदाहरण देकर भी समझाया है। जिसप्रकार धनुष से छोड़ा गया बाण अपनी गति समाप्त करने पर ही रुकता है। उसीप्रकार प्रारब्धकर्मों का क्षय भी उनका उपभोग करने के बाद ही होता है। इसलिए जो गीता अथवा उपनिषद्ग्रन्थों में कर्मों के भस्मसात् होने की बात कही गयी है, वहाँ उनका अभिप्राय क्रियमाणकर्म से ही ग्रहण करना चाहिए, प्रारब्ध या सञ्चितकर्मों से नहीं। इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि जीवन्मुक्त अपने शरीर एवं इन्द्रियों द्वारा पूर्व-वासनाओं के प्रभाव से कर्म करता है तथा प्रारब्धकर्मों का भोग करता है। वह ज्ञान की दृष्टि से ही समस्त कर्मफलों का उपभोग करता है, क्योंकि इस स्थिति में वह सम्पूर्ण सांसारिक व्यवहार को मिथ्याप्रपञ्च के रूप में ही देखता है, वास्तविक रूप में नहीं। इसे जादूगर (इन्द्रजालिक) के दृष्टान्त द्वारा सरलतापूर्वक समझाया जा सकता है- मंच के ऊपर जादूगर जो भी प्रपञ्च प्रदर्शित करता है। वह वस्तुतः असत्य ही होता है, किन्तु उसके मिथ्यात्व की प्रतीति केवल जादूगर को ही होती है, अन्यों को नहीं। वहाँ उपस्थित सभी दर्शक उसके द्वारा प्रदर्शित समस्तप्रपञ्च में परमार्थ अर्थात् सत्यतत्त्व का ही दर्शन करते हैं। ठीक इसीप्रकार जीवन्मुक्त संसार के पदार्थों के मिथ्यात्व को जानने के कारण उनमें लिप्त नहीं होता है। इस कारण वह आँखों वाला होते हुए भी आँखों वाला नहीं होता तथा कानों वाला होते हुए भी कानों वाला नहीं होता है। उसकी स्थिति कमल के पत्ते पर रखी जल की बूँद के समान होती है जो संसार में रहते हुए भी उसमें लिप्त नहीं रहता है, स्वयं को पृथक् बनाए रखता है। जीवन्मुक्त की अवस्था में साधक यद्यपि अपने शरीर को धारण किए रहता है, किन्तु वास्तव में वह देह के प्रति अभिमान का ही परित्याग कर देता है। वह सभीप्रकार के विरोधों एवं द्वन्द्वों से मुक्त हो जाता है। उसका