वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ें९८ वेदान्तसार शत्रु, मित्र, मान, अपमान, लाभ-हानि, सुख-दुःख आदि भावनाएँ पूर्णतया शान्त हो जाती हैं। सामान्य लोगों के व्यवहार की अपेक्षा जगत् के प्रति इसका व्यवहार विलक्षण होता है। जीवन्मुक्त के व्यवहार के सम्बन्ध में शङ्कराचार्य का कथन है- सुषुप्तवज्जाग्रति यो न पश्यति द्वयं च पश्यन्नपि चाद्वयत्वतः। तथा च कुर्वन्नपि निष्क्रियश्च यः स आत्मविन्नान्य इतीह निश्चयः॥ (उपदेशसाहस्री-5) यम-नियमों के अनुष्ठान द्वारा वह अशुभकर्मों का परित्याग कर शुभ कर्मों में प्रवृत्त रहता है। अष्टाङ्गयोग का अनुष्ठान साधक के लिए पुण्य सञ्चय का कार्य करता है। शुभकर्मों के प्रति प्रवृत्ति ही उसके ब्रह्म साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करती है। उसका शरीर प्रारब्धकर्मफल भोगने पर्यन्त ही विद्यमान रहता है। प्रारब्धकर्मों के पूर्णक्षय के साथ ही उसका शरीरपात हो जाता है तथा वह पूर्णकाम, आप्तकाम और निष्काम बन जाता है। अन्ततः सभीप्रकार की इच्छाओं से मुक्त होने पर वह ब्रह्म ही बन जाता है। जीवन्मुक्त की मोक्षावस्था के बारे में आचार्यों का कथन है कि जिसप्रकार वायु पुष्प के मध्य में स्थित गन्धकोष से गंध लेकर बहता है। उसीप्रकार सामान्यरूप से लिङ्गशरीर, मनसहित इन्द्रियों को ग्रहण करके एक शरीर का परित्याग कर दूसरे शरीर में प्रवेश करता है, किन्तु जीवन्मुक्त का न केवल प्रारब्धकर्मों के उपभोग से स्थूलशरीर, अपितु अज्ञान के हेतु रूप में अविद्यमान होने के कारण सूक्ष्मशरीर, यहाँ तक कि ज्ञान के उदय से कारणशरीर भी विनष्ट हो जाता है। इसप्रकार इन तीनों शरीरों के समाप्त होने से साधक देहमुक्त होकर परमब्रह्म में ठीक उसीप्रकार विलीन हो जाता है, जैसे- तप्ततवे पर गिरी जल की बूँदें उसी में समा जाती हैं या समुद्र में उठने वाली लहरें उसी में विलीन हो जाती हैं। जिसप्रकार लहरों के समुद्र में समा जाने पर समुद्र और लहरों में किसीप्रकार का कोई भेद नहीं रहता है, ठीक उसीप्रकार जीवन्मुक्त एवं परमब्रह्म में कोई भेद नहीं रहता है। (२३) आत्मविषयक विभिन्न मत-आचार्य सदानन्द ने वेदान्तसार में बौद्ध, चार्वाक एवं मीमांसक आचार्यों के आत्मविषयक मतमतान्तरों को प्रस्तुत करते हुए वेदान्त की दृष्टि से यथार्थरूप में आत्मतत्त्व का प्रतिपादन