वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 113, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ९९ किया है। इस क्रम में इन्होंने सर्वप्रथम अत्यन्त सामान्यलोगों की दृष्टि को प्रस्तुत करते हुए कहा कि- (1) अत्यन्त साधारण लोग अपने समान ही अपने पुत्र के प्रति प्रेम होने तथा पुत्र के नष्ट-पुष्ट होने पर व्यक्ति को यह अनुभव होता है कि मैं नष्ट हो गया या मैं पुष्ट हो गया। इतना ही नहीं अनेकशः तो वह अपने से बढ़कर पुत्र को मानता है, क्योंकि स्वयं भूखा रहकर अपने पुत्रों को खिलाकर प्रसन्नता का अनुभव करता है। श्रुति को भी इस विषय में प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया गया है-“आत्मा वै जायते पुत्रः" अतः पुत्रों के प्रति व्यक्ति का अगाध प्रेम होने के कारण पुत्र को ही आत्मा कहना संगत है। (2) इसके विपरीत मधुर लगने वाले वचनों का कथन करते हुए, बृहस्पतिशिष्य चार्वाकमत को स्वीकार करने वाले आचार्यों ने अन्न एवं रस से बने इस शरीर को ही आत्मा माना। उनके अनुसार-मनुष्य जलते हुए घर में अपने पुत्र को छोड़कर अपनी जान बचाकर स्वयं बाहर आ जाता है। इसलिए उसका पुत्र की अपेक्षा अपने शरीर के प्रति अधिक प्रेम प्रदर्शित होता है, इसकारण तथा 'स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः' (वह पुरुष (आत्मा) अन्नरस का विकार है, इत्यादि श्रुतिवचनों से, साथ ही मैं मोटा हो गया हूँ, मैं दुर्बल हो गया हूँ इत्यादि अनुभवप्रमाण से स्थूलशरीर को ही आत्मा मानना उचित है। (3) पुत्रात्मवाद एवं शरीरात्मवाद का खण्डन करते हुए अन्य चार्वाक आचार्यों ने तर्क प्रस्तुत करते हुए इन्द्रियों को ही आत्मा माना है। तदनुसार-'सुषुप्तिकाल में शरीर चेष्टाविहीन हो जाता है। अतः इस शरीर को आत्मा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि चैतन्य से होने वाली शारीरिक चेष्टा इन्द्रियों के होने पर ही होती है। उनके अभाव में शरीर चेतनावहीन हो जाता है। इसके अतिरिक्त इन्द्रियों में विकृति आने पर मैं काना हूँ, मैं बहरा हूँ, इत्यादि अनुभव होता है। साथ ही 'ते ह प्राणाः प्रजापतिपितरमेत्य ब्रूयुः' इत्यादि श्रुतिवचन भी इसमें प्रमाण है। अतः इन्द्रियों को ही आत्मा मानना युक्तियुक्त है। (4) जबकि अन्य चार्वाक आचार्यों ने प्राणों को आत्मा माना है। उनके मत में वस्तुतः शरीर, पुत्र अथवा इन्द्रिय आत्मा नहीं है, अपितु प्राण ही आत्मा है, क्योंकि प्राणों के नष्ट होने पर समस्त इन्द्रियाँ निश्चल हो