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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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१०० वेदान्तसार जाती हैं, अपने विषयों को ग्रहण करना बन्द कर देती हैं तथा प्राणों की उपस्थिति में ही अपने विषयों को ग्रहण करने में समर्थ हो पाती हैं। साथ ही मैं भूखा हूँ, मैं प्यासा हूँ इत्यादि अनुभव प्राणों के द्वारा ही होता है। 'अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः' इत्यादि श्रुति भी इसमें प्रमाण है। इन सभी कारणों से प्राणों को ही आत्मा कहना तर्कसंगत है। (5) उक्त चारों मतों का खण्डन करते हुए अन्य चार्वाक आचार्य मन को ही आत्मा कहते हैं। उनके अनुसार-सुषुप्ति अवस्था में जब मन सो जाता है तो प्राणादि का भी अभाव देखा गया है। मन की जाग्रत अवस्था में ही प्राण, इन्द्रियाँ, शरीरादि कार्य करते हुए देखे जाते हैं। अतः मन को ही आत्मा कहना न्यायसंगत है। इसके अलावा मैं संकल्पवान् हूँ, मैं विकल्पवान् हूँ, नित्यप्रति ऐसा अनुभव होने से तथा 'अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः' इत्यादि श्रुतिवचनों से मन को ही आत्मा मानना चाहिए। (6) उपर्युक्त सभी चार्वाक मतों के खण्डन में बौद्ध दार्शनिकों ने बुद्धि में आत्मतत्त्व का प्रतिपादन करते हुए कहा-वस्तुतः बुद्धि ही आत्मा है, क्योंकि घटादि के निर्माण के लिए जिसप्रकार कुम्हार की उपस्थिति आवश्यक है, ठीक उसीप्रकार मन आदि इन्द्रियों में चेष्टा-सामर्थ्य के लिए उनके अधिष्ठातास्वरूप बुद्धि का अस्तित्व अनिवार्य है। मन को तो कुम्हार के चक्र के समान करणमात्र कहा जा सकता है, यही कुम्हाररूपी बुद्धि विद्यमान न हो तो मनरूपी चक्र घटादि का निर्माण करने में समर्थ नहीं होता है। साथ ही मैं कर्ता, मैं भोक्ता इत्यादि अनुभव एवं 'अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः' इत्यादि श्रुतिवचन, इसमें प्रमाण है। अतः इन सब कारणों से बुद्धि को ही आत्मा कहना तर्कसंगत सिद्ध करता है। (7) उक्त सभी मतों का निराकरण करते हुए प्रसिद्ध मीमांसक प्रभाकर भट्ट एवं नैयायिकों ने अज्ञान में आत्मतत्त्व का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार-बुद्धि आदि का भी अज्ञान में लीन होना देखा गया है। मैं अज्ञानी हूँ, इसप्रकार का अनुभव भी लोगों को होता ही है तथा सुषुप्तिकाल में बुद्धि आदि का भी अज्ञानरूप आत्मा में विलय होना देखा गया है। साथ ही 'अन्योऽन्तर आत्मा आनन्दमयः' इत्यादि श्रुतिवचनों के कारण, अज्ञान को आत्मा कहना युक्तियुक्त है। (8) उपर्युक्त मतों से भिन्नमत का प्रतिपादन करते हुए प्रसिद्ध मीमांसक कुमारिलभट्ट एवं उनके अनुयायी आचार्यों ने अज्ञानरूप उपाधि से युक्त