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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 314 में से

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भूमिका १०१ चैतन्य को आत्मा बताया। तदनुसार-अज्ञानघन और आनन्दमय आत्मा है, क्योंकि सुषुप्तिकाल में ज्ञान एवं अज्ञान दोनों के विद्यमान होने के कारण आत्मा में भी ज्ञान एवं अज्ञान दोनों का ही अस्तित्व रहता है। सोकर उठने के बाद व्यक्ति का यह अनुभव कि 'मैं खूब अच्छीप्रकार सोया अथवा ऐसा सोया कि मुझे कुछ भी पता नहीं लगा' प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। 'प्रज्ञान घन एवानन्दमयः' इत्यादि श्रुति भी इसमें प्रमाण है। (9) इसी क्रम में बौद्धमतावलम्बी एक अन्य मत शून्य को आत्मा मानता है। उनके विचार में-सुषुप्ति के समय सबका अभाव होने के कारण, अपनी सत्ता का भी भान न कराने वाली सुषुप्ति में किसी भी प्रकार की अनुभूति न होने से आत्मा का अभाव अर्थात् शून्य होना ही सिद्ध होता है। इसके अतिरिक्त 'असदेवेदमग्र आसीत्' इत्यादि श्रुति भी इस कथन में प्रमाणरूप में प्रस्तुत की गई है। आत्मविषयक उपर्युक्त मतों का पूर्वपक्ष के रूप में उल्लेख करने के पश्चात् आचार्य सदानन्द कहते हैं कि-अत्यन्त सामान्य लोगों द्वारा उदाहरण रूप में कहे गए श्रुतिवचनों, युक्तियों और अनुभवों में पूर्व-पूर्व में कही गई बात का, उत्तरोत्तर कही गई बात द्वारा स्वतः ही आत्मत्वविषयक कथन का बाध हो जाने से पुत्र आदि का आत्मा न होना स्पष्ट होता है। पुनरपि श्रुतिवाक्यों में परस्पर विरोध होने से सत्यता को जानने की जिज्ञासा अवश्य होती है, क्योंकि श्रुति वेदवाक्य होने के कारण शङ्का का विषय नहीं है। वेदवाक्य किसी भी परिस्थिति में अप्रामाणिक नहीं हो सकता है। फिर भी इन श्रुतिवाक्यों का उद्देश्य अरुन्धतीन्याय से स्थूल से सूक्ष्म का ज्ञान कराना ही कहा जा सकता है। इस प्रसंग में अरुन्धती न्याय को समझना उचित होगा। ( २४) अरुन्धतीन्याय-अरुन्धती एक अत्यन्त सूक्ष्म तारा है। विस्तृत आकाश में उसे सहजरूप में नहीं पहचाना जा सकता है। इसके लिए विद्वानों ने एक युक्ति का कथन किया है। सबसे पहले उस व्यक्ति को चन्द्रमा की ओर संकेत करके कहा जाता है कि यही अरुन्धती है। ऐसा कहने पर उसका ध्यान पूरे आकाश से हटकर चन्द्रमा पर केन्द्रित हो जाता है। तत्पश्चात् उसे कहा जाता है कि चन्द्रमा अरुन्धती नहीं है, अपितु उसके समीप स्थित सात तारे अरुन्धती हैं, पुनः उन सातों में से अन्तिम तीन तारों की ओर संकेत करके उनके अरुन्धती होने की बात कहते हैं।

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