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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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१०२ \hfill वेदान्तसार

इसके बाद उन तीन तारों में से भी बीच के तारे को अरुन्धती बताकर उसके भी समीप स्थित अतिसूक्ष्म तारे की पहचान करवाते हैं। इसप्रकार इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में पाँच वाक्यों को आधार बनाते हैं- (क) चन्द्रमा (ख) सात तारे (ग) तीन तारे (घ) तीनों के बीच वाला तारा (ङ) बीच वाले के पास वाला सूक्ष्मतारा। इसप्रकार ज्ञाता को समझाने की दृष्टि से उसके बुद्धिस्तर को ध्यान में रखते हुए सीढ़ी के समान पूर्व-पूर्व का परित्याग करके सूक्ष्मतम अरुन्धती की पहचान कराना सरलकार्य हो जाता है। ठीक उसीप्रकार पुत्र आत्मा है, इत्यादि परस्परविरुद्ध अर्थों का प्रतिपादन करने वाले श्रुतिवाक्य कहे गए हैं, किन्तु इसमें जिज्ञासु की सामर्थ्य के अनुसार पूर्व-पूर्व का क्रमशः परित्याग करके उत्तरोत्तर सूक्ष्मब्रह्म का प्रतिपादन करना ही अभीष्ट है। अतः यहाँ परस्परविरोध की प्रतीति का लेशमात्र भी औचित्य नहीं है। इसलिए नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त एवं सत्यस्वभाव वाला आन्तरिक चैतन्य ही आत्मा है, अन्य कोई नहीं तथा वही यथार्थ है, ऐसा वेदान्तियों का मत है। (२५) महावाक्य- जीव और ब्रह्म में ऐक्य प्रतिपादन वेदान्तदर्शन का मुख्य विषय है। इसके अनुसार अज्ञान से ग्रस्त जीव अपने आपको ब्रह्म से अलग समझने लगता है। इसी अज्ञान के कारण उसे बार-बार संसार में जन्म लेना पड़ता है। आवागमन के इन असह्य कष्टों से मुक्ति पाने के लिए वह सद्गुरु की शरण में जाता है, जो उसे तत्त्वमसि इत्यादि वाक्यों के रूप में उपदेश प्रदान करता है। गुरु के उपदेश द्वारा जीव का अज्ञानरूपी अन्धकार विनष्ट हो जाता है और वह अपने आपको 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) इस अनुभववाक्य के रूप में पहचान लेता है। वेदान्तदर्शनविषयक ग्रन्थों में यद्यपि 12 महावाक्यों का उल्लेख किया गया है- तत्त्वमसि,$^1$ अहं ब्रह्मास्मि,$^2$ अयमात्माब्रह्म$^3$ एष ते आत्माऽन्तर्याम्यमृतः,$^4$ स यश्चायम्,$^5$ पुरुषे यश्चासौ,$^6$ आदित्ये स एकः,$^7$


  1. छान्दोग्योपनिषद्-6/8/7
  2. बृहदारण्यकोपनिषद्-1/4/10
  3. वही, 1/5/19
  4. वही, 3/7/3
  5. तैत्तिरीयोपनिषद्-2/8/1
  6. वही, 3/2/8
  7. वही, 2/8/1