वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका १०३ प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्मविज्ञानमानन्दं ब्रह्म,¹ सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म,² स एवमेवं पुरुषो ब्रह्म,³ सर्वं खल्विदं ब्रह्म,⁴ एकमेवाद्वितीयम्।⁵ इन महाकाव्यों में से प्रज्ञानं ब्रह्म, अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वमसि तथा अयमात्मा ब्रह्म इन चार को अत्यधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि ये चारों महावाक्य चार वेदों का प्रतिनिधित्व भी करते हैं, किन्तु आचार्य सदानन्द ने अपने वेदान्तसार में केवल दो महावाक्यों का निरूपण किया है (क) तत्त्वमसि (ख) अहं ब्रह्मास्मि। अतः हम यहाँ इन्हीं दोनों महावाक्यों का ही विवेचन प्रस्तुत करेंगे। (क) तत्त्वमसि - (उपदेशवाक्य) अर्थात् वह शुद्धचैतन्यस्वरूप ब्रह्म तुम हो। यह उपदेशवाक्य सद्गुरु अधिकारीशिष्य से कहता है। इस वाक्य में जीव और ब्रह्म का ऐक्य प्रतिपादन किया गया है, किन्तु इस सम्बन्ध में एक शंका होती है कि वेदान्त के अनुसार जीव अल्पज्ञ है और ब्रह्म को सर्वज्ञ बताया गया है तो फिर 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य द्वारा इन दोनों में ऐक्य का प्रतिपादन कैसे किया जा सकता है? जिसके लिए आचार्य सदानन्द ने तीन प्रकार के सम्बन्धों का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है (1) समानाधिकरण्यसम्बन्ध (2) विशेषण विशेष्यभावसम्बन्ध तथा (3) लक्ष्यलक्षणभावसम्बन्ध। इन त्रिविध सम्बन्धों द्वारा तत्त्वमसि वाक्य जीव और ब्रह्म के अखण्ड अर्थ का बोध कराता है। इस विषय में आचार्य सुरेश्वर भी कहते हैं- सामानाधिकरण्यञ्च विशेषणविशेष्यता। लक्ष्यलक्षणसम्बन्धः पदार्थप्रत्यगात्मनाम्। (नैष्कर्म्यसिद्धि 3/3) (१) समानाधिकरण्यसम्बन्ध- आचार्य सदानन्द इस सम्बन्ध की व्याख्या दो उदाहरण देकर प्रस्तुत करते हैं- सोऽयं देवदत्तः तथा तत्त्वमसि। इन दोनों वाक्यों का उद्देश्य एकत्व की प्रतीति करना है। 'यह वही देवदत्त है' इत्यादि प्रथम वाक्य किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा कहा गया है जिसने कुछ
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