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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

भूमिका ९७ शङ्कराचार्य के मतानुसार ब्रह्मज्ञान होने के पश्चात् भी साधक को प्रारब्ध कर्मों का फल भोगना पड़ता है। उनके अनुसार जिसप्रकार कुम्हार बर्तन बनाने वाले चक्र (कुलाल) में दण्ड द्वारा गति उत्पन्न करता है; बाद में दण्ड हटाने पर भी वह स्वतः वेगपूर्वक चलता रहता है। वह वेग की समाप्ति पर ही रुकता है। ठीक उसीप्रकार विपाक की ओर उन्मुख प्रारब्ध कर्मों का क्षय उनके भोग के बाद ही होता है, पहले नहीं। इसी बात को उन्होंने बाण का उदाहरण देकर भी समझाया है। जिसप्रकार धनुष से छोड़ा गया बाण अपनी गति समाप्त करने पर ही रुकता है। उसीप्रकार प्रारब्धकर्मों का क्षय भी उनका उपभोग करने के बाद ही होता है। इसलिए जो गीता अथवा उपनिषद्ग्रन्थों में कर्मों के भस्मसात् होने की बात कही गयी है, वहाँ उनका अभिप्राय क्रियमाणकर्म से ही ग्रहण करना चाहिए, प्रारब्ध या सञ्चितकर्मों से नहीं। इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि जीवन्मुक्त अपने शरीर एवं इन्द्रियों द्वारा पूर्व-वासनाओं के प्रभाव से कर्म करता है तथा प्रारब्धकर्मों का भोग करता है। वह ज्ञान की दृष्टि से ही समस्त कर्मफलों का उपभोग करता है, क्योंकि इस स्थिति में वह सम्पूर्ण सांसारिक व्यवहार को मिथ्याप्रपञ्च के रूप में ही देखता है, वास्तविक रूप में नहीं। इसे जादूगर (इन्द्रजालिक) के दृष्टान्त द्वारा सरलतापूर्वक समझाया जा सकता है- मंच के ऊपर जादूगर जो भी प्रपञ्च प्रदर्शित करता है। वह वस्तुतः असत्य ही होता है, किन्तु उसके मिथ्यात्व की प्रतीति केवल जादूगर को ही होती है, अन्यों को नहीं। वहाँ उपस्थित सभी दर्शक उसके द्वारा प्रदर्शित समस्तप्रपञ्च में परमार्थ अर्थात् सत्यतत्त्व का ही दर्शन करते हैं। ठीक इसीप्रकार जीवन्मुक्त संसार के पदार्थों के मिथ्यात्व को जानने के कारण उनमें लिप्त नहीं होता है। इस कारण वह आँखों वाला होते हुए भी आँखों वाला नहीं होता तथा कानों वाला होते हुए भी कानों वाला नहीं होता है। उसकी स्थिति कमल के पत्ते पर रखी जल की बूँद के समान होती है जो संसार में रहते हुए भी उसमें लिप्त नहीं रहता है, स्वयं को पृथक् बनाए रखता है। जीवन्मुक्त की अवस्था में साधक यद्यपि अपने शरीर को धारण किए रहता है, किन्तु वास्तव में वह देह के प्रति अभिमान का ही परित्याग कर देता है। वह सभीप्रकार के विरोधों एवं द्वन्द्वों से मुक्त हो जाता है। उसका

९८ वेदान्तसार शत्रु, मित्र, मान, अपमान, लाभ-हानि, सुख-दुःख आदि भावनाएँ पूर्णतया शान्त हो जाती हैं। सामान्य लोगों के व्यवहार की अपेक्षा जगत् के प्रति इसका व्यवहार विलक्षण होता है। जीवन्मुक्त के व्यवहार के सम्बन्ध में शङ्कराचार्य का कथन है- सुषुप्तवज्जाग्रति यो न पश्यति द्वयं च पश्यन्नपि चाद्वयत्वतः। तथा च कुर्वन्नपि निष्क्रियश्च यः स आत्मविन्नान्य इतीह निश्चयः॥ (उपदेशसाहस्री-5) यम-नियमों के अनुष्ठान द्वारा वह अशुभकर्मों का परित्याग कर शुभ कर्मों में प्रवृत्त रहता है। अष्टाङ्गयोग का अनुष्ठान साधक के लिए पुण्य सञ्चय का कार्य करता है। शुभकर्मों के प्रति प्रवृत्ति ही उसके ब्रह्म साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करती है। उसका शरीर प्रारब्धकर्मफल भोगने पर्यन्त ही विद्यमान रहता है। प्रारब्धकर्मों के पूर्णक्षय के साथ ही उसका शरीरपात हो जाता है तथा वह पूर्णकाम, आप्तकाम और निष्काम बन जाता है। अन्ततः सभीप्रकार की इच्छाओं से मुक्त होने पर वह ब्रह्म ही बन जाता है। जीवन्मुक्त की मोक्षावस्था के बारे में आचार्यों का कथन है कि जिसप्रकार वायु पुष्प के मध्य में स्थित गन्धकोष से गंध लेकर बहता है। उसीप्रकार सामान्यरूप से लिङ्गशरीर, मनसहित इन्द्रियों को ग्रहण करके एक शरीर का परित्याग कर दूसरे शरीर में प्रवेश करता है, किन्तु जीवन्मुक्त का न केवल प्रारब्धकर्मों के उपभोग से स्थूलशरीर, अपितु अज्ञान के हेतु रूप में अविद्यमान होने के कारण सूक्ष्मशरीर, यहाँ तक कि ज्ञान के उदय से कारणशरीर भी विनष्ट हो जाता है। इसप्रकार इन तीनों शरीरों के समाप्त होने से साधक देहमुक्त होकर परमब्रह्म में ठीक उसीप्रकार विलीन हो जाता है, जैसे- तप्ततवे पर गिरी जल की बूँदें उसी में समा जाती हैं या समुद्र में उठने वाली लहरें उसी में विलीन हो जाती हैं। जिसप्रकार लहरों के समुद्र में समा जाने पर समुद्र और लहरों में किसीप्रकार का कोई भेद नहीं रहता है, ठीक उसीप्रकार जीवन्मुक्त एवं परमब्रह्म में कोई भेद नहीं रहता है। (२३) आत्मविषयक विभिन्न मत-आचार्य सदानन्द ने वेदान्तसार में बौद्ध, चार्वाक एवं मीमांसक आचार्यों के आत्मविषयक मतमतान्तरों को प्रस्तुत करते हुए वेदान्त की दृष्टि से यथार्थरूप में आत्मतत्त्व का प्रतिपादन

भूमिका ९९ किया है। इस क्रम में इन्होंने सर्वप्रथम अत्यन्त सामान्यलोगों की दृष्टि को प्रस्तुत करते हुए कहा कि- (1) अत्यन्त साधारण लोग अपने समान ही अपने पुत्र के प्रति प्रेम होने तथा पुत्र के नष्ट-पुष्ट होने पर व्यक्ति को यह अनुभव होता है कि मैं नष्ट हो गया या मैं पुष्ट हो गया। इतना ही नहीं अनेकशः तो वह अपने से बढ़कर पुत्र को मानता है, क्योंकि स्वयं भूखा रहकर अपने पुत्रों को खिलाकर प्रसन्नता का अनुभव करता है। श्रुति को भी इस विषय में प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया गया है-“आत्मा वै जायते पुत्रः" अतः पुत्रों के प्रति व्यक्ति का अगाध प्रेम होने के कारण पुत्र को ही आत्मा कहना संगत है। (2) इसके विपरीत मधुर लगने वाले वचनों का कथन करते हुए, बृहस्पतिशिष्य चार्वाकमत को स्वीकार करने वाले आचार्यों ने अन्न एवं रस से बने इस शरीर को ही आत्मा माना। उनके अनुसार-मनुष्य जलते हुए घर में अपने पुत्र को छोड़कर अपनी जान बचाकर स्वयं बाहर आ जाता है। इसलिए उसका पुत्र की अपेक्षा अपने शरीर के प्रति अधिक प्रेम प्रदर्शित होता है, इसकारण तथा 'स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः' (वह पुरुष (आत्मा) अन्नरस का विकार है, इत्यादि श्रुतिवचनों से, साथ ही मैं मोटा हो गया हूँ, मैं दुर्बल हो गया हूँ इत्यादि अनुभवप्रमाण से स्थूलशरीर को ही आत्मा मानना उचित है। (3) पुत्रात्मवाद एवं शरीरात्मवाद का खण्डन करते हुए अन्य चार्वाक आचार्यों ने तर्क प्रस्तुत करते हुए इन्द्रियों को ही आत्मा माना है। तदनुसार-'सुषुप्तिकाल में शरीर चेष्टाविहीन हो जाता है। अतः इस शरीर को आत्मा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि चैतन्य से होने वाली शारीरिक चेष्टा इन्द्रियों के होने पर ही होती है। उनके अभाव में शरीर चेतनावहीन हो जाता है। इसके अतिरिक्त इन्द्रियों में विकृति आने पर मैं काना हूँ, मैं बहरा हूँ, इत्यादि अनुभव होता है। साथ ही 'ते ह प्राणाः प्रजापतिपितरमेत्य ब्रूयुः' इत्यादि श्रुतिवचन भी इसमें प्रमाण है। अतः इन्द्रियों को ही आत्मा मानना युक्तियुक्त है। (4) जबकि अन्य चार्वाक आचार्यों ने प्राणों को आत्मा माना है। उनके मत में वस्तुतः शरीर, पुत्र अथवा इन्द्रिय आत्मा नहीं है, अपितु प्राण ही आत्मा है, क्योंकि प्राणों के नष्ट होने पर समस्त इन्द्रियाँ निश्चल हो

१०० वेदान्तसार जाती हैं, अपने विषयों को ग्रहण करना बन्द कर देती हैं तथा प्राणों की उपस्थिति में ही अपने विषयों को ग्रहण करने में समर्थ हो पाती हैं। साथ ही मैं भूखा हूँ, मैं प्यासा हूँ इत्यादि अनुभव प्राणों के द्वारा ही होता है। 'अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः' इत्यादि श्रुति भी इसमें प्रमाण है। इन सभी कारणों से प्राणों को ही आत्मा कहना तर्कसंगत है। (5) उक्त चारों मतों का खण्डन करते हुए अन्य चार्वाक आचार्य मन को ही आत्मा कहते हैं। उनके अनुसार-सुषुप्ति अवस्था में जब मन सो जाता है तो प्राणादि का भी अभाव देखा गया है। मन की जाग्रत अवस्था में ही प्राण, इन्द्रियाँ, शरीरादि कार्य करते हुए देखे जाते हैं। अतः मन को ही आत्मा कहना न्यायसंगत है। इसके अलावा मैं संकल्पवान् हूँ, मैं विकल्पवान् हूँ, नित्यप्रति ऐसा अनुभव होने से तथा 'अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः' इत्यादि श्रुतिवचनों से मन को ही आत्मा मानना चाहिए। (6) उपर्युक्त सभी चार्वाक मतों के खण्डन में बौद्ध दार्शनिकों ने बुद्धि में आत्मतत्त्व का प्रतिपादन करते हुए कहा-वस्तुतः बुद्धि ही आत्मा है, क्योंकि घटादि के निर्माण के लिए जिसप्रकार कुम्हार की उपस्थिति आवश्यक है, ठीक उसीप्रकार मन आदि इन्द्रियों में चेष्टा-सामर्थ्य के लिए उनके अधिष्ठातास्वरूप बुद्धि का अस्तित्व अनिवार्य है। मन को तो कुम्हार के चक्र के समान करणमात्र कहा जा सकता है, यही कुम्हाररूपी बुद्धि विद्यमान न हो तो मनरूपी चक्र घटादि का निर्माण करने में समर्थ नहीं होता है। साथ ही मैं कर्ता, मैं भोक्ता इत्यादि अनुभव एवं 'अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः' इत्यादि श्रुतिवचन, इसमें प्रमाण है। अतः इन सब कारणों से बुद्धि को ही आत्मा कहना तर्कसंगत सिद्ध करता है। (7) उक्त सभी मतों का निराकरण करते हुए प्रसिद्ध मीमांसक प्रभाकर भट्ट एवं नैयायिकों ने अज्ञान में आत्मतत्त्व का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार-बुद्धि आदि का भी अज्ञान में लीन होना देखा गया है। मैं अज्ञानी हूँ, इसप्रकार का अनुभव भी लोगों को होता ही है तथा सुषुप्तिकाल में बुद्धि आदि का भी अज्ञानरूप आत्मा में विलय होना देखा गया है। साथ ही 'अन्योऽन्तर आत्मा आनन्दमयः' इत्यादि श्रुतिवचनों के कारण, अज्ञान को आत्मा कहना युक्तियुक्त है। (8) उपर्युक्त मतों से भिन्नमत का प्रतिपादन करते हुए प्रसिद्ध मीमांसक कुमारिलभट्ट एवं उनके अनुयायी आचार्यों ने अज्ञानरूप उपाधि से युक्त

भूमिका १०१ चैतन्य को आत्मा बताया। तदनुसार-अज्ञानघन और आनन्दमय आत्मा है, क्योंकि सुषुप्तिकाल में ज्ञान एवं अज्ञान दोनों के विद्यमान होने के कारण आत्मा में भी ज्ञान एवं अज्ञान दोनों का ही अस्तित्व रहता है। सोकर उठने के बाद व्यक्ति का यह अनुभव कि 'मैं खूब अच्छीप्रकार सोया अथवा ऐसा सोया कि मुझे कुछ भी पता नहीं लगा' प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। 'प्रज्ञान घन एवानन्दमयः' इत्यादि श्रुति भी इसमें प्रमाण है। (9) इसी क्रम में बौद्धमतावलम्बी एक अन्य मत शून्य को आत्मा मानता है। उनके विचार में-सुषुप्ति के समय सबका अभाव होने के कारण, अपनी सत्ता का भी भान न कराने वाली सुषुप्ति में किसी भी प्रकार की अनुभूति न होने से आत्मा का अभाव अर्थात् शून्य होना ही सिद्ध होता है। इसके अतिरिक्त 'असदेवेदमग्र आसीत्' इत्यादि श्रुति भी इस कथन में प्रमाणरूप में प्रस्तुत की गई है। आत्मविषयक उपर्युक्त मतों का पूर्वपक्ष के रूप में उल्लेख करने के पश्चात् आचार्य सदानन्द कहते हैं कि-अत्यन्त सामान्य लोगों द्वारा उदाहरण रूप में कहे गए श्रुतिवचनों, युक्तियों और अनुभवों में पूर्व-पूर्व में कही गई बात का, उत्तरोत्तर कही गई बात द्वारा स्वतः ही आत्मत्वविषयक कथन का बाध हो जाने से पुत्र आदि का आत्मा न होना स्पष्ट होता है। पुनरपि श्रुतिवाक्यों में परस्पर विरोध होने से सत्यता को जानने की जिज्ञासा अवश्य होती है, क्योंकि श्रुति वेदवाक्य होने के कारण शङ्का का विषय नहीं है। वेदवाक्य किसी भी परिस्थिति में अप्रामाणिक नहीं हो सकता है। फिर भी इन श्रुतिवाक्यों का उद्देश्य अरुन्धतीन्याय से स्थूल से सूक्ष्म का ज्ञान कराना ही कहा जा सकता है। इस प्रसंग में अरुन्धती न्याय को समझना उचित होगा। ( २४) अरुन्धतीन्याय-अरुन्धती एक अत्यन्त सूक्ष्म तारा है। विस्तृत आकाश में उसे सहजरूप में नहीं पहचाना जा सकता है। इसके लिए विद्वानों ने एक युक्ति का कथन किया है। सबसे पहले उस व्यक्ति को चन्द्रमा की ओर संकेत करके कहा जाता है कि यही अरुन्धती है। ऐसा कहने पर उसका ध्यान पूरे आकाश से हटकर चन्द्रमा पर केन्द्रित हो जाता है। तत्पश्चात् उसे कहा जाता है कि चन्द्रमा अरुन्धती नहीं है, अपितु उसके समीप स्थित सात तारे अरुन्धती हैं, पुनः उन सातों में से अन्तिम तीन तारों की ओर संकेत करके उनके अरुन्धती होने की बात कहते हैं।

१०२ \hfill वेदान्तसार

इसके बाद उन तीन तारों में से भी बीच के तारे को अरुन्धती बताकर उसके भी समीप स्थित अतिसूक्ष्म तारे की पहचान करवाते हैं। इसप्रकार इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में पाँच वाक्यों को आधार बनाते हैं- (क) चन्द्रमा (ख) सात तारे (ग) तीन तारे (घ) तीनों के बीच वाला तारा (ङ) बीच वाले के पास वाला सूक्ष्मतारा। इसप्रकार ज्ञाता को समझाने की दृष्टि से उसके बुद्धिस्तर को ध्यान में रखते हुए सीढ़ी के समान पूर्व-पूर्व का परित्याग करके सूक्ष्मतम अरुन्धती की पहचान कराना सरलकार्य हो जाता है। ठीक उसीप्रकार पुत्र आत्मा है, इत्यादि परस्परविरुद्ध अर्थों का प्रतिपादन करने वाले श्रुतिवाक्य कहे गए हैं, किन्तु इसमें जिज्ञासु की सामर्थ्य के अनुसार पूर्व-पूर्व का क्रमशः परित्याग करके उत्तरोत्तर सूक्ष्मब्रह्म का प्रतिपादन करना ही अभीष्ट है। अतः यहाँ परस्परविरोध की प्रतीति का लेशमात्र भी औचित्य नहीं है। इसलिए नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त एवं सत्यस्वभाव वाला आन्तरिक चैतन्य ही आत्मा है, अन्य कोई नहीं तथा वही यथार्थ है, ऐसा वेदान्तियों का मत है। (२५) महावाक्य- जीव और ब्रह्म में ऐक्य प्रतिपादन वेदान्तदर्शन का मुख्य विषय है। इसके अनुसार अज्ञान से ग्रस्त जीव अपने आपको ब्रह्म से अलग समझने लगता है। इसी अज्ञान के कारण उसे बार-बार संसार में जन्म लेना पड़ता है। आवागमन के इन असह्य कष्टों से मुक्ति पाने के लिए वह सद्गुरु की शरण में जाता है, जो उसे तत्त्वमसि इत्यादि वाक्यों के रूप में उपदेश प्रदान करता है। गुरु के उपदेश द्वारा जीव का अज्ञानरूपी अन्धकार विनष्ट हो जाता है और वह अपने आपको 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) इस अनुभववाक्य के रूप में पहचान लेता है। वेदान्तदर्शनविषयक ग्रन्थों में यद्यपि 12 महावाक्यों का उल्लेख किया गया है- तत्त्वमसि,$^1$ अहं ब्रह्मास्मि,$^2$ अयमात्माब्रह्म$^3$ एष ते आत्माऽन्तर्याम्यमृतः,$^4$ स यश्चायम्,$^5$ पुरुषे यश्चासौ,$^6$ आदित्ये स एकः,$^7$


  1. छान्दोग्योपनिषद्-6/8/7
  2. बृहदारण्यकोपनिषद्-1/4/10
  3. वही, 1/5/19
  4. वही, 3/7/3
  5. तैत्तिरीयोपनिषद्-2/8/1
  6. वही, 3/2/8
  7. वही, 2/8/1

भूमिका १०३ प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्मविज्ञानमानन्दं ब्रह्म,¹ सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म,² स एवमेवं पुरुषो ब्रह्म,³ सर्वं खल्विदं ब्रह्म,⁴ एकमेवाद्वितीयम्।⁵ इन महाकाव्यों में से प्रज्ञानं ब्रह्म, अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वमसि तथा अयमात्मा ब्रह्म इन चार को अत्यधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि ये चारों महावाक्य चार वेदों का प्रतिनिधित्व भी करते हैं, किन्तु आचार्य सदानन्द ने अपने वेदान्तसार में केवल दो महावाक्यों का निरूपण किया है (क) तत्त्वमसि (ख) अहं ब्रह्मास्मि। अतः हम यहाँ इन्हीं दोनों महावाक्यों का ही विवेचन प्रस्तुत करेंगे। (क) तत्त्वमसि - (उपदेशवाक्य) अर्थात् वह शुद्धचैतन्यस्वरूप ब्रह्म तुम हो। यह उपदेशवाक्य सद्गुरु अधिकारीशिष्य से कहता है। इस वाक्य में जीव और ब्रह्म का ऐक्य प्रतिपादन किया गया है, किन्तु इस सम्बन्ध में एक शंका होती है कि वेदान्त के अनुसार जीव अल्पज्ञ है और ब्रह्म को सर्वज्ञ बताया गया है तो फिर 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य द्वारा इन दोनों में ऐक्य का प्रतिपादन कैसे किया जा सकता है? जिसके लिए आचार्य सदानन्द ने तीन प्रकार के सम्बन्धों का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है (1) समानाधिकरण्यसम्बन्ध (2) विशेषण विशेष्यभावसम्बन्ध तथा (3) लक्ष्यलक्षणभावसम्बन्ध। इन त्रिविध सम्बन्धों द्वारा तत्त्वमसि वाक्य जीव और ब्रह्म के अखण्ड अर्थ का बोध कराता है। इस विषय में आचार्य सुरेश्वर भी कहते हैं- सामानाधिकरण्यञ्च विशेषणविशेष्यता। लक्ष्यलक्षणसम्बन्धः पदार्थप्रत्यगात्मनाम्। (नैष्कर्म्यसिद्धि 3/3) (१) समानाधिकरण्यसम्बन्ध- आचार्य सदानन्द इस सम्बन्ध की व्याख्या दो उदाहरण देकर प्रस्तुत करते हैं- सोऽयं देवदत्तः तथा तत्त्वमसि। इन दोनों वाक्यों का उद्देश्य एकत्व की प्रतीति करना है। 'यह वही देवदत्त है' इत्यादि प्रथम वाक्य किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा कहा गया है जिसने कुछ


  1. ऐतरेयोपनिषद्- 5/3
  2. तैत्तिरीयोपनिषद्-2/1/1
  3. ऐतरेयोपनिषद्- 3/13
  4. छान्दोग्योपनिषद्-3/19/1
  5. वही, 6/2/1

१०४ वेदान्तसार समय पूर्व देवदत्त को अन्यत्र किसी स्थान पर देखा था। उसी देवदत्त को अपने सामने पाकर वह व्यक्ति पहले देखे गए देवदत्त को याद करके अनायास ही कह उठता है—‘अरे! यह तो वही देवदत्त है’ (सोऽयं देवदत्तः) इस वाक्य में प्रयुक्त ‘सः’ शब्द तत्काल एवं तद्देशविशिष्ट देवदत्त का बोध कराने वाला है, जबकि ‘अयम्’ शब्द से एतत्काल, एतद्देशविशिष्ट देवदत्त का बोध होता है। यद्यपि सामान्यदृष्टि से हमें इस वाक्य में उस समय एवं उस स्थान तथा इस समय और इस स्थान के कारण काल तथा देशगत विरोध की प्रतीति होती है, तथापि सामानाधिकरण्यसम्बन्ध से इन दोनों शब्दों का अर्थ एक ही देवदत्तरूप पिण्डविशेष में पर्यवसित हो जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि इस सम्बन्ध द्वारा ये दोनों पद (सः और अयम्) एक ही देवदत्त का बोध कराते हैं। ठीक इसीप्रकार ‘तत्त्वमसि’ इस महावाक्य में प्रयुक्त ‘तत्’ शब्द परोक्षत्व एवं सर्वज्ञत्व आदि गुणों से विशिष्टचैतन्य का कथन करता है तथा ‘त्वम्’ पद प्रत्यक्षत्व एवं अल्पज्ञत्व आदि गुणों से विशिष्ट चैतन्य अर्थात् जीव का वाचक है। पूर्ववाक्य ‘सोऽयं देवदत्तः’ के अनुसार ही यद्यपि यहाँ भी तत् एवं त्वम् पदों के अर्थों में परोक्षत्व एवं प्रत्यक्षत्व तथा सर्वज्ञत्व और अल्पज्ञत्व के कारण प्रथमदृष्टि में विरोध की प्रतीति होती है, किन्तु यहाँ प्रतीत होने वाला विरोध वास्तविक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ‘तत्’ पद द्वारा जिस चैतन्य की तथा ‘त्वम्’ पद द्वारा जिस चैतन्य की यहाँ प्रतीति हो रही है, उन दोनों में कोई भेद नहीं है। वस्तुतः इन दोनों में भी पूर्ववत् सामानाधिकरण्य सम्बन्ध द्वारा एक चैतन्य में समानरूप से तात्पर्य परिलक्षित होने से इन दोनों में अभेद का बोध कराया जा रहा है। (२) विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध—जो शब्द अपने विशेष्य को अन्य शब्दों द्वारा विशेषरूप से अलग कर देता है, विशेषण तथा जो विशेषरूप से अलग होता है, वह विशेष्य कहलाता है। जैसे—‘नीलोत्पलम्’ इत्यादि वाक्य में ‘नील’ पद विशेषण तथा ‘उत्पल’ विशेष्य है। यहाँ विशेषण ‘नील’ पद विशेष्य उत्पल अर्थात् कमल को नीले रंग से भिन्न सभी लाल, पीले, श्वेत आदि रंगों से अलग कर देता है। इसप्रकार यहाँ प्रयुक्त विशेषण न केवल विशेष्य की विशेषता प्रदर्शित करता है, अपितु उसके विरोधीधर्मों से भी उसकी भिन्नता बताकर विरोधी धर्मों का व्यावर्तन कर देता है। ठीक इसीप्रकार ‘सोऽयं देवदत्तः’ इस वाक्य में ‘सः’ और ‘अयम्’ ये दोनों पद

भूमिका १०५ आपस में विशेषणविशेष्य बनकर विरोधी अंशों का व्यावर्तन करके देवदत्त में एकत्व की प्रतीति कराते हैं। इसलिए इस वाक्य द्वारा विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध से एक देवदत्त का ही बोध होता है। इस सम्बन्ध के आधार पर ‘सः’ पद ‘अयम्’ का विशेषण तथा ‘अयम्’ को ‘सः’ का विशेष्य मान लिया जाता है तथा तत्कालविशिष्ट एतत् कालविशिष्ट में प्रतीत होने वाले विरोध का व्यावर्तन होने से अयम् पद सः का विशेषण बन जाता है। इसप्रकार दोनों पद परस्परभेद के व्यावर्तक होने से देवदत्त पिण्ड अर्थात् व्यक्ति में एकत्व का बोध कराते हैं। ठीक इसीप्रकार विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध से ‘तत्त्वमसि’ इस वाक्य में भी जीव और ब्रह्म में ऐक्य की सिद्धि की जाती है। इस स्थिति में ‘तत्’ पद से सामान्यतया परोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्य तथा ‘त्वम्’ पद से अपरोक्षत्वादि विशिष्टचैतन्यरूप अर्थ के कारण भेद की प्रतीति होती है, किन्तु इनके परस्पर प्रतीत होने वाले इस भेद को विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध द्वारा दूर कर दिया जाता है। इस व्यावर्तन के परिणामस्वरूप दोनों पदों से विशुद्ध चैतन्यमात्ररूप अर्थ की प्रतीति होती है। (३) लक्ष्यलक्षणसम्बन्ध–सामान्यरूप से अभिधा शब्दशक्ति पदों के साक्षात् संकेतित अर्थ का बोध कराती है, किन्तु मुख्यार्थ के बाध होने पर रूढ़ि अथवा प्रयोजनवश उससे सम्बन्धित अर्थ की प्रतीति लक्षणा शब्द शक्ति द्वारा करायी जाती है। जैसे–‘सोऽयं देवदत्तः’ यहाँ प्रयुक्त ‘सः’ पद का मुख्यार्थ भूतकालविशिष्ट देवदत्त तथा ‘अयम्’ का वाच्यार्थ एतत्काल विशिष्ट देवदत्त होगा। तत्कालविशिष्ट और एतत्कालविशिष्ट में यहाँ प्रत्यक्षतः विरोध प्रतीत हो रहा है, किन्तु प्रतीत होने वाले इस विरोध का परित्याग करके अविरुद्ध अंश देवदत्त में अर्थग्रहण करने के लिए यहाँ लक्षणा का आश्रय लेना आवश्यक हो जाता है। जिसके द्वारा यह अर्थावबोध कराया गया है। वस्तुतः यह लक्षणा सामान्यलक्षणा से भिन्न ‘जहदजहल्लक्षणा’ मानी गई है, क्योंकि उक्त वाक्य में ‘सः’ और ‘अयम्’ पदों द्वारा प्रदर्शित वाच्यार्थों के विरुद्धांशों को त्यागकर केवल अविरुद्ध तत्त्व देवदत्त में ही अभिप्राय ग्रहण किया गया है। अतः थोड़ा-सा छोड़ देने

१०६ वेदान्तसार (जहत्) तथा थोड़ा सा ग्रहण कर लेने (अजहत्) के कारण इसे सामान्य लक्षणा से भिन्न जहदजहल्लक्षणा कहा गया है। इसीको 'भागलक्षणा' भी कहते हैं। तत्त्वमसि वाक्य में भी इसी भागलक्षणा द्वारा 'तत्' एवं 'त्वम्' पदों के वाच्यार्थ में स्थित विरुद्धांशों का परित्याग करके उनमें स्थित अविरुद्धांश अखण्डचैतन्य को ग्रहण करके ही वाक्यार्थ का बोध कराया जाता है। यहाँ तत् एवं त्वम् पदों का विरुद्धांशरहित वाच्यार्थ लक्षक कहा जाएगा तथा अखण्डचैतन्यरूप अर्थ लक्ष्य होगा। उस स्थिति में लक्ष्यलक्षणसम्बन्ध तथा भागलक्षणा द्वारा विरुद्ध अंश (परोक्षत्वादि विशिष्ट-अपरोक्षत्वादि विशिष्ट) का परित्याग करके अविरुद्ध अंश का ग्रहण करने पर अखण्ड चैतन्य का बोध होगा। इसप्रकार उपर्युक्त तीनों सम्बन्धों के द्वारा अधिकारीशिष्य गुरु की अनुकम्पा से 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य के अखण्ड, एकरसचैतन्यरूप अर्थ के साथ-साथ जीव एवं ब्रह्म के ऐक्य को भी जानने में समर्थ हो जाते हैं। (ख) अहं ब्रह्मास्मि (अनुभववाक्य) - यहाँ तक हमने तत्त्वमसि उपदेशवाक्य तथा उसके अभिप्राय को ग्रहण करने में प्रयुक्त सम्बन्धत्रय का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया। अब हम आचार्य सदानन्द द्वारा वेदान्तसार में वर्णित द्वितीय महावाक्य 'अहं ब्रह्मास्मि' का विवेचन प्रस्तुत करेंगे। वस्तुतः इन दोनों वाक्यों में परस्पर अत्यन्त घनिष्ठसम्बन्ध है, क्योंकि परमकृपालु गुरु से उपदेशवाक्य को सुनकर ही साधक ब्रह्म का साक्षात्कार करने के लिए प्रयत्नशील हो जाता है। वैराग्य आदि साधन-चतुष्टय से सम्पन्न अधिकारी शिष्य की चित्तवृत्ति सच्चिदानन्दघनपरम ब्रह्म के आकार से आकारित होकर प्रकाशित हो उठती है। चित् प्रतिबिम्ब को धारण कर यह चित्तवृत्ति परमब्रह्म को विषय बनाकर ब्रह्मविषयक अज्ञान को विनष्ट कर देती है तथा अज्ञान के नष्ट होने पर वह (चित्तवृत्ति) स्वयं भी नष्ट हो जाती है। इस सम्पूर्णप्रक्रिया की वेदान्त के ग्रन्थों में 'कतक रजोन्याय' के माध्यम से व्याख्या की गई है। जल को स्वच्छ करने वाला कतक चूर्ण जल की मलिनता को दूर करके जिसप्रकार स्वयं भी उसी जल में विलीन हो जाता

भूमिका १०७ है। ठीक उसीप्रकार ब्रह्मविषयक अज्ञान को विनष्ट करके यह चित्तवृत्ति भी समाप्त हो जाती है- अज्ञानकलुषं जीव ज्ञानाभ्यासाद्धि निर्मलम्। कृत्वा ज्ञानं स्वयं नश्येत् जलं कतकरेणुवत्॥ इस विषय में ध्यातव्य है कि चैतन्यविषयक अज्ञानरूपी आवरण के विनष्ट होने के साथ-साथ ही साधक को 'अहं ब्रह्मास्मि' की अनुभूति होने लगती है। इसप्रकार 'अहं ब्रह्मास्मि' इस अनुभव में चित्तवृत्ति का ब्रह्म के आकार से आकारित होना, अज्ञान का विनाश तथा उसी के साथ सकल प्रपञ्च एवं चित्तवृत्ति का भी विलीन होना प्रमुख है। जिससमय साधक को ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है तो तत्त्वज्ञान के परिणामस्वरूप उसका द्वैतभाव भी समाप्त हो जाता है अर्थात् इस अवस्था में अद्वैतभाव की सिद्धि हो जाती है। अतः ब्रह्म को जानने वाला वस्तुतः ब्रह्म ही हो जाता है। यही 'अहं ब्रह्मास्मि' इस अनुभव का परमफल कहा जा सकता है।

वेदान्तसार मूल एवम् 'चन्द्रिका' व्याख्या: मङ्गलाचरण

वेदान्तसारः अखण्डं सच्चिदानन्दमवाङ्मनसगोचरम्। आत्मानमखिलाधारमाश्रयेऽभीष्टसिद्धये॥१॥ अन्वय-सत्-चित्-आनन्दम्, अवाङ्मनसगोचरम्, अखिल-आधारम् अखण्डम्, आत्मानम् अभीष्टसिद्धये आश्रये। अनुवाद-(ग्रन्थ की निर्विघ्नसमाप्ति अथवा त्रिविधदुःख की आत्यन्तिक- निवृत्ति के लिए सत्य, ज्ञान एवं आनन्दस्वरूप, मन, वाणी तथा इन्द्रियों के अविषय, सम्पूर्ण स्थावरजङ्गमस्वरूप प्रपञ्च के आधारस्वरूप, अखण्ड परमात्मा का अभीष्ट (मनोरथ) की सिद्धि के लिए (मैं सदानन्द) आश्रय ग्रहण करता हूँ। 'चन्द्रिका'- किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने से पूर्व मंगलाचरण की भारतीयपरम्परा का निर्वाह करते हुए आचार्य सदानन्द वेदान्तदर्शन के प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार की निर्विघ्नसमाप्ति के लिए परमात्मा का स्मरण करते हुए कहते हैं कि मैं अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए सच्चिदानन्द, अवाङ्मनसगोचर, सम्पूर्णसृष्टि के आधार स्वरूप, अखण्ड, परमपिता परमात्मा का आश्रय लेता हूँ। प्रस्तुत मङ्गलाचरण में प्रयुक्त प्रत्येक पद विस्तृत व्याख्या की अपेक्षा रखता है, क्योंकि गम्भीर अभिप्राय को लिए हुए ये सभी शब्द ग्रन्थकार ने साभिप्राय प्रयुक्त किए हैं। वेदान्तदर्शन एकमात्र परमब्रह्म की सत्ता को स्वीकार करता है, साथ ही आत्मा एवं ब्रह्म की एकता का भी प्रतिपादन करता है। इसीलिए आचार्य सदानन्द ने यहाँ आत्मा शब्द का प्रयोग परमात्मा अथवा ब्रह्म के अर्थ में किया है। वेदान्त के अनुसार मानवजीवन का एकमात्रलक्ष्य परमब्रह्म का सायुज्य प्राप्त करना है। अतः प्रस्तुत श्लोक द्वारा इस ग्रन्थ के प्रयोजन की ओर भी ग्रन्थकार ने सङ्केत किया है। यहाँ आत्मा के चार विशेषणों का प्रयोग किया गया है, जिनमें उसकी सभी विशेषताओं का समावेश हो जाता है। अतः हम यहाँ उनकी क्रमशः व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं।

मङ्गलाचरण १०९ (क) सच्चिदानन्दम्-सभी वेदान्तग्रन्थों में ब्रह्म के लिए इस विशेषण का प्रयोग किया गया है, जो इसकी तीन विशेषताओं की ओर संकेत करता है सत्, चित् और आनन्द। सत् शब्द अस् भुवि धातु से शत् प्रत्यय करके निष्पन्न होता है। इसका अभिप्राय है सत्तावान्। यहाँ प्रयुक्त सत् शब्द भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों में उसकी विद्यमानता का कथन करता है, क्योंकि वेदान्तदर्शन के अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र ऐसी वस्तु है जो तीनों कालों में यहाँ तक कि प्रलय के उपरान्त भी विद्यमान रहती है। यह न केवल सृष्टि के आरम्भ में विद्यमान थी, अपितु वर्तमान में भी है तथा आगे भी रहेगी। अतः यह कालातीत यथार्थसत्ता है। चिती संज्ञाने धातु से क्विप् प्रत्यय करके निष्पन्न 'चित्' शब्द ज्ञान का वाचक है। ब्रह्म को चित् कहकर उसके ज्ञानस्वरूप का प्रतिपादन किया गया है। तैत्तिरीयोपनिषद् कहता है-'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (2/1/1) बृहदारण्यकोपनिषद् उसे विज्ञान कहता है- विज्ञानमानन्दं ब्रह्म (3/9/28)। अतः ब्रह्म विज्ञानमय है। विज्ञान का सामान्य अर्थ है- विशिष्टज्ञान अथवा विशुद्ध ज्ञान। यहाँ ब्रह्म को विज्ञान इसलिए कहा गया है, क्योंकि इसके द्वारा सभी पदार्थ जाने जाते हैं, वह ज्ञानस्वरूप है। चित् शब्द का एक अन्य अर्थ चैतन्य भी है, अर्थात् सभी प्राणियों, वनस्पतिजगत् आदि में जो चैतन्य प्रतीत होता है, वह उनमें ब्रह्म के अस्तित्व को सिद्ध करता है। वाचस्पतिमिश्र ने 'चित्' का अर्थ 'स्वप्रकाशत्व' किया है-स्वप्रकाशत्वं चित्त्वम् (ब्रह्मसूत्र भामतीटीका 1/1/1)। यहाँ स्वयंप्रकाश का अभिप्राय है- किसी अन्य से प्रकाशित न होना, अपितु अपने प्रकाश से सभी को प्रकाशित करना। यही विशेषता वेदान्त के ब्रह्म में विद्यमान है। वह स्वयं प्रकाश है तथा सूर्य आदि तेज-पुञ्जों का भी प्रकाशक है- इस सम्बन्ध में मुण्डकोपनिषद् ब्रह्म को ज्योतिषां ज्योतिः कहता है- हिरण्मये परे कोशे विरज ब्रह्म निष्कलम्। तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः॥ (2/2/9) इसप्रकार यहाँ प्रयुक्त 'चित्' शब्द विज्ञान, ज्ञान, चैतन्य एवं स्वप्रकाशत्व आदि अर्थों की प्रतीति कराता है, जो ब्रह्म अथवा आत्मा के वैशिष्ट्य का कथन करते हैं।

११० वेदान्तसार सभी उपनिषद् एवं वेदान्तग्रन्थ ब्रह्म के लिए आनन्द का प्रयोग करते हैं। इस सम्बन्ध में तैत्तिरीयोपनिषद् कहता है कि-सभी प्राणी आनन्द से उत्पन्न होते हैं, आनन्द में स्थित हैं तथा अन्त में आनन्द में ही उनका लय भी हो जाता है- आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति (तैत्तिरीयोपनिषद्-3/6) ब्रह्म वस्तुतः आनन्दस्वरूप है (अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः)। यह सभी के अन्तरतम में विद्यमान रहता है। इसप्रकार यहाँ प्रयुक्त सत्, चित् और आनन्द ये तीनों पद ब्रह्म की अनेक विशेषताओं का कथन करते हुए उसकी महिमा को कहते हैं। (ख) अवाङ्मनसगोचरम्-यह आत्मतत्त्व ज्ञानेन्द्रियों के प्रत्यक्षज्ञान का विषय नहीं है। यहाँ तक कि सर्वत्र गतिवाला मन भी उस तक पहुँचने में समर्थ नहीं है और यदि कोई साधक उसे योग आदि क्रियाओं द्वारा जान भी लेता है तो उसकी वाणी उसका कथन करने में समर्थ नहीं है। इसीलिए उसे गूँगे का गुड़ कहा गया है। जिसप्रकार गूँगा व्यक्ति गुड़ के स्वाद को कहने में असमर्थ रहता है, वह उसका केवल अनुभव कर सकता है। ठीक उसीप्रकार उस परमब्रह्म का दर्शन करने पर भी साधक उसका वर्णन करने में असमर्थ रहता है। इसी अभिप्राय को केनोपनिषद् इसप्रकार प्रदर्शित करता है- न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग् गच्छति नो मनः। न विद्मो न जानीमो यथैतदनुशिष्यात्॥ (केनो०-3) अर्थात् ब्रह्म अविज्ञेय है, किन्तु इसका यह अर्थ भी नहीं लेना चाहिए कि उसकी सत्ता नहीं है, अपितु उसकी सत्ता अवश्य है। योगविद्या एवं सद्गुरु के उपदेश से उसका साक्षात्कार किया जा सकता है। वह केवल अनुभव का विषय है। सम्भवतः इसीकारण उपनिषदों में 'नेति नेति' कहकर उसके स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है। इस विषय में बृहदारण्यकोपनिषद् कहता है- 'स एष नेति नेत्यात्मा (3/9/26)। यहाँ नेति नेति का अभिप्राय 'ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ नहीं है', यह ग्रहण करना चाहिए। वस्तुतः इस विशेषण द्वारा ब्रह्म को अविज्ञेय एवं अकथनीय कहा गया है।

मङ्गलाचरण १११ (ग) अखिलाधारम्-यह ब्रह्म सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च का मूल आधार है। वह आकाश आदि मूलकारणों का भी कारण है। यदि हम उसका भी कारण मानें तो फिर उसका भी कारण, इसप्रकार बार-बार सोचने पर अनवस्था दोष होगा। इसलिए एकमात्र ब्रह्म को ही वेदान्त में सम्पूर्ण चराचर जगत् का कारण माना गया है तथा उसका कोई कारण नहीं है। वह सम्पूर्णसृष्टि की रचना करने में पूर्णतया समर्थ है। इसके लिए उसे किसी अन्य बाह्यसत्ता की आवश्यकता नहीं है। सृष्टिरूपी कार्य के लिए वही उपादानकारण भी है और निमित्तकारण भी। इस विषय में यहाँ मकड़ी का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है, क्योंकि वह अपने जाले के निर्माण में उपादान और निमित्तकारण दोनों होती है। जिसप्रकार मनुष्य के केश एवं लोम स्वाभाविकरूप में उत्पन्न होते हैं। उसमें श्वसनप्रक्रिया स्वाभाविकरूप से होती है। ठीक उसीप्रकार अक्षरब्रह्म से यह सृष्टि उत्पन्न होती है। अतः एकमात्र वही इस सम्पूर्ण सृष्टि का आधार अर्थात् एकमात्र कारण है। वही ब्रह्म इस समस्तसृष्टि का सञ्चालक, पालक आदि भी है। इसकी सृष्टि, स्थिति एवं विनाश उसी की इच्छा पर निर्भर है। इसलिए जब वह चाहता है तो सम्पूर्णप्रपञ्च को अपने में ही समेटकर अकेला विद्यमान रहता है। (घ) अखण्डम्-समस्त श्रुतियाँ ब्रह्म को एकमेवाद्वितीयम् कहकर वर्णित करती हैं। अद्वैतवेदान्त के अनुसार इस सम्पूर्ण चराचरजगत् में एक ही यथार्थसत्ता है और वह है ब्रह्म। किसी भी वस्तु के एकत्व अनेकत्व का निर्णय भेद के आधार पर किया जाता है, जिसे तीन श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं-स्वगत, सजातिगत तथा विजातीय भेद। वृक्ष का शाखाओं एवं पत्तों में स्वगतभेद होता है। आम्र और केले के वृक्षों में सजातीयभेद विद्यमान है, उनकी जाति वृक्षत्व एक होते हुए भी वे व्यक्तिशः भिन्न हैं तथा वृक्ष का पत्थर से विजातीयभेद होता है। ब्रह्म एक है, अतः अद्वितीय है वह उपर्युक्त तीनों प्रकार के भेदों से रहित है। इसीलिए उसे एकमेवाद्वितीयम् कहा गया है। जिसे ग्रन्थकार ने अखण्डम् विशेषण द्वारा अभिव्यक्त किया है। ब्रह्म की इस विशेषता को उपनिषदों में इसप्रकार कहा गया है- ओ३म् पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

११२ वेदान्तसार ( ङ ) अभीष्टसिद्धये-यहाँ प्रयुक्त अभीष्ट शब्द भी विशेषव्याख्या की अपेक्षा रखता है, क्योंकि अभीष्ट शब्द यहाँ अनेकार्थक है, इस प्रसंग में इस शब्द के चार अर्थ किए जा सकते हैं- प्रथम, ग्रन्थ की निर्विघ्न- समाप्ति रूपकार्य की सिद्धि के लिए ग्रन्थकार अपने इष्ट ब्रह्म अथवा आत्मा की शरण में जाता है। द्वितीय, वेदान्तदर्शन का अत्यन्त सरलशैली में प्रकरणग्रन्थ का प्रणयन करना ग्रन्थकार का अभिप्रेत है, इस उद्देश्य की सिद्धि में आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए वह अपने आराध्य अथवा विवेच्य आत्मतत्त्व की शरण ग्रहण करता है। तृतीय, इस संसार में प्रत्येक प्राणी आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक त्रिविध दुःखों से पीड़ित है तथा ब्रह्मज्ञान इन्हें दूर करने में समर्थ है। अतः ग्रन्थकार अपने तथा अपने पाठकों के त्रिविध दुःख की आत्यन्तिकनिवृत्ति को अपना अभीष्ट मानकर, उसकी सिद्धिहेतु आराध्य का शरणागत होता है। इसके अतिरिक्त मानवजीवन का चरमलक्ष्य मोक्षप्राप्ति, ग्रन्थकार का लक्ष्य है, ग्रन्थ के माध्यम से ब्रह्मज्ञान, यथार्थज्ञान की चर्चा करके जिसके लिए वह प्रयत्नशील है। इसी अभीष्ट अर्थात् मोक्षप्राप्ति के लिए वह आत्मा अर्थात् परमात्मा का आश्रय ग्रहण करता है। प्रस्तुत मंगलाचरण के भाव को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-१८ स्वरूप ┌───────────────────────────┴──────────────────────────┐ सत् चित् आनन्दम् (कालातीत सत्ता) (ज्ञान, विज्ञान, (आनन्दस्वरूप) चैतन्य स्व प्रकाश सम्पन्न) │ ┌─────────────┐ अखण्डम् ────────────── ┌─────────────┐ ─── अखिलाधारम् ─── ┌───────┐ │अभीष्ट-सिद्धये│─ (एकमात्र │ आत्मा/ब्रह्म │ (सम्पूर्ण │आश्रये │ └─────────────┘ यथार्थ सत्ता) │परमात्मानम् │ चराचर प्रपञ्च └───────┘ └──────┬──────┘ का मूल │ आधार-कारण) ┌───────────────┼───────────────┐ अवाङ् अमनस् अगोचरम् (वाणी) (मन) (इन्द्रियों से ग्रहण न करने योग्य)

मङ्गलाचरण ११३ विशेष-(1) प्रस्तुत कारिका की भाषा सरल, प्रसादगुणयुक्त, भावबोधगम्य, किन्तु अर्थगाम्भीर्य से युक्त प्रयुक्त हुई है। (2) ग्रन्थकार की अभिव्यक्तिसामर्थ्य एवं शब्द सौष्ठव की अभिव्यक्ति हुई है। (3) आत्मा शब्द का प्रयोग ब्रह्म अथवा परमात्मा के लिए किया गया है। (4) प्रस्तुत प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार का प्रतिपाद्य आत्मतत्त्व रहा है, ऐसा अभिप्रायं भी अभिव्यक्त हो रहा है। (5) आत्मा के सभी विशेषण साभिप्राय प्रयुक्त हुए हैं, जो उसकी लगभग सभी महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का कथन करते हैं। (6) ग्रन्थकार के विनम्रभाव की भी अभिव्यक्ति हुई है। अपने इष्ट के प्रति विनम्रभाव, समर्पितभाव सदैव मोक्षप्राप्ति का साधक होता है। अवतरणिका-मङ्गलाचरण में अपने आराध्य के स्मरण के पश्चात् प्रस्तुत श्लोक में आचार्य सदानन्द अपने गुरु अद्वयानन्द को नमन करके वेदान्तसार के कथन की प्रतिज्ञा करते हुए कहते हैं- अर्थतोऽप्यद्वयानन्दानतीतद्वैतभानतः। गुरुनाराध्य वेदान्तसारं वक्ष्ये यथामतिः॥२॥ अन्वय-अतीतद्वैतभानतः अर्थतः अपि अद्वयानन्दान् गुरून् आराध्य यथामतिः वेदान्तसारम् वक्ष्ये। अनुवाद- जिनकी द्वैतभावना दूर हो गई है, यथार्थरूप से भी अखण्ड आनन्दस्वरूप (अद्वयानन्द नामक) गुरु की आराधना करके (मैं सदानन्द अपनी) बुद्धि के अनुसार वेदान्तसार को कहूँगा। 'चन्द्रिका'- ग्रन्थ के प्रारम्भ में अपने इष्टदेव आत्मरूप परमात्मा का स्मरण करने के बाद ग्रन्थकार अपने पूज्यपाद गुरु को नमन करना अपना पुनीतकर्तव्य मानते हैं। साथ ही वे अपने गुरु की दो विशेषताओं का कथन करते हैं- (क) अतीतद्वैतभानतः- उनके गुरु का लौकिक नाम वस्तुतः अद्वयानन्द है। उनकी विशेषता है कि उन्होंने अपनी कठोरसाधना द्वारा ब्रह्म एवं जगत् के पार्थक्य को जान लिया है। आत्मा के दर्शन होने से उनकी द्वैतभावना दूर हो गयी है अर्थात् उनका अज्ञानरूप 'आवरण दूर हो गया है। अब उनकी

१९४ वेदान्तसार स्थिति वस्तुतः जीवन्मुक्त के समान है, जो अपने प्रारब्धकर्मों के कारण स्थूलशरीर को धारण किए हुए हैं। वे वस्तुतः ब्रह्मस्वरूप ही हैं। ऐसे गुरु अद्वयानन्द के श्रीचरणों में बैठकर आचार्य सदानन्द ने वेदान्त की शिक्षा ग्रहण की है। अतः वेदान्तसार का उपदेश करने से पूर्व ग्रन्थकार उच्चकोटि के साधक परमगुरु को नमन करते हुए उनका आराधन करते हैं। (ख) अद्वयानन्दान्- यद्यपि ग्रन्थकार सदानन्द योगीन्द्र का सांसारिक नाम भी अद्वयानन्द है तथापि उन्होंने योगियों के लिए भी अगम्य आत्मतत्त्व का साक्षात्कार कर लिया है, जिसके कारण उनकी द्वैतभावना पूर्णतया विनष्ट हो चुकी है। सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म में ही उन्हें सदैव आनन्द की अनुभूति होती रहती है। वे सांसारिकता से पूर्णतया ऊपर उठ चुके हैं। इस दृष्टि से वे सच्चे अर्थों में यथानाम तथा गुण वाले हो गए हैं। इसप्रकार की विशेषता वाले सार्थनामा गुरु को ग्रन्थकार अपनी प्रणामाञ्जलि प्रस्तुत करने के बाद ही अपने नूतन प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार का उपदेश करने की प्रतिज्ञा करते हैं। (ग) यथामति- इस शब्द द्वारा ग्रन्थकार अपनी विनम्रता प्रदर्शित करते हुए कहते हैं कि वेदान्तदर्शन अत्यन्त गूढ़विषय है। ब्रह्मसूत्र, उपनिषद् आदि अनेकग्रन्थों में आचार्यों ने अत्यन्त विस्तार से इसका विवेचन किया है। इस सम्पूर्णविवेचन के कारण यह दर्शन अत्यधिक जटिल हो गया है तथा सामान्यव्यक्ति की बुद्धि के लिए इसे ग्रहण करना कठिन हो गया है। अतः मैंने ऐसा अनुभव किया कि वेदान्तदर्शन के सिद्धान्तों को समझाने वाला एक संक्षिप्त एवं सरलग्रन्थ बनाया जाए। इस संकल्प को लेकर मैंने गुरुकृपा एवं भगवत्कृपा से जो कुछ भी सीखा है। उसको अपनी बुद्धि सामर्थ्य से सरलरूप में प्रस्तुत करने का मैं यह विनम्र प्रयास कर रहा हूँ। परमात्मा इस कार्य में मुझे सफलता प्रदान करे। (घ) वेदान्तसार-जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है (वेदान्तस्य सारः, इति वेदान्तसारः) वेदान्तदर्शन का सार। वेद शब्द से अभिप्राय संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों से लिया जाता है। संहिताग्रन्थों में प्रतिपादित ज्ञान की व्याख्या उत्तरोत्तर वैदिकसाहित्य में की गई तथा इसकी पराकाष्ठा हमें उपनिषद्ग्रन्थों में देखने को मिलती है। इसलिए इनमें प्रतिपादित सिद्धान्त अथवा दर्शन का नाम ही वेदान्त रखा गया। उन्हीं सब सिद्धान्तों को सार-संक्षेपरूप में प्रस्तावितग्रन्थ में प्रतिपादित करने की प्रतिज्ञा

मङ्गलाचरण ११५ आचार्य सदानन्द द्वारा प्रस्तुत कारिका में करते हुए उसका सार्थक नामकरण किया गया है। (ङ) वक्ष्ये-ब्रू धातु से आसन्नवर्ती भविष्य के अर्थ में लुट् लकार का प्रयोग ग्रन्थकार ने साभिप्राय किया है, क्योंकि इस प्रतिज्ञा के तुरन्त पश्चात् आचार्य सदानन्द अनुबन्धचतुष्टय का कथन करते हुए ग्रन्थ का आरम्भ कर देते हैं। प्रस्तुत श्लोक के अभिप्राय को इसप्रकार भी समझ सकते हैं- चित्र-१९ जिनकी द्वैत भावना दूर हो गई यथार्थरूप में भी अखण्ड आनन्दस्वरूप (अतीतद्वैतभानतः) | | (अर्थतः अपि अद्वयानन्दान्) अद्वयानन्द नामक गुरु का) (अद्वयानन्दान् गुरून्) | आराधन करके (आराध्य) | अहं आचार्य सदानन्दः —अपनी बुद्धि के अनुसार (यथामतिः) | वेदान्तसारम् वक्ष्ये विशेष-(1) "देवमिवाचार्यमुपासीत" देवता के समान ही आचार्य अर्थात् गुरु की भी उपासना करनी चाहिए, इत्यादि भारतीयमान्यता की पालना की गई है। (2) अद्वयानन्द शब्द में श्लेष अलंकार का प्रयोग हुआ है, क्योंकि इसका एक अर्थ आचार्य सदानन्द के गुरु का सांसारिक नाम, द्वितीय ब्रह्म तथा तृतीय अर्थ अद्वयानन्द का विशेषण है। (3) यहाँ प्रयुक्त आराध्य शब्द ग्रन्थकार के श्रद्धाभक्तिपूर्वक गुरु के प्रति नमन की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है। (4) गुरु की महत्ता की अभिव्यक्ति हुई है। शास्त्रकारों ने भी कहा है- 'यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥

परिभाषा

११६ वेदान्तसार (5) वेदान्तसार वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ है। प्रकरणग्रन्थ की शास्त्रों में इसप्रकार परिभाषा प्रस्तुत की गई है- शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम्। आहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चितः॥ अवतरणिका-वेदान्तसार के उपदेश की प्रतिज्ञा करने के उपरान्त 'वेदान्त' शब्द की व्याख्या करके अनुबन्धचतुष्टय का उल्लेख करते हुए सदानन्द योगीन्द्र कहते हैं- वेदान्तो नामोपनिषत्प्रमाणं तदुपकारीणि शारीरकसूत्रादीनि च। अस्य वेदान्तप्रकरणत्वात्तदीयैरेवानुबन्धैस्तद्गतासिद्धेर्न ते पृथगालोचनीयाः। तत्रानुबन्धो नामाधिकारिविषयसम्बन्धप्रयोजनानि॥३॥ पदच्छेद-वेदान्तः नाम उपनिषद् प्रमाणम्, तत् उपकारीणि शारीरक सूत्रादीनि च। अस्य वेदान्त-प्रकरणत्वात् तदीयैः एव अनुबन्धैः तद्गता-सिद्धेः, न ते पृथक् आलोचनीयाः। तत्र अनुबन्धः नाम अधिकारी-विषय- सम्बन्ध-प्रयोजनानि॥ अनुवाद-उपनिषद् को प्रमाण मानकर चलने वाला शास्त्र वस्तुतः वेदान्त कहा गया है और ब्रह्मसूत्र (शारीरकसूत्र) आदि उनके उपकारक (व्याख्या) ग्रन्थ हैं। इस (वेदान्तसार) के वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ होने से, उसके अनुबन्धों के साथ ही इसकी भी अनुबन्धवत्ता सिद्ध होने के कारण, उन्हें अलग मानना उचित नहीं है। 'चन्द्रिका'-प्रस्तुत खण्ड में ग्रन्थकार ने मुख्यरूप से चार बातों की ओर संकेत किया है। प्रथम, वेदान्त की परिभाषा देते हुए उसे उपनिषदों को आधार मानकर चलने वाला शास्त्र बताना। द्वितीय, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भगवद्- गीता आदि ग्रन्थों को वेदान्त के ही उपकारक अर्थात् व्याख्याग्रन्थ प्रतिपादित करना। तृतीय, प्रस्तावित वेदान्तसार वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ होने, वेदान्त के सभी अनुबन्ध प्रस्तुतग्रन्थ पर भी लागू होने से उनको पृथक् मानने का निषेध तथा अन्त में अनुबन्ध चतुष्टय-अधिकारी, विषय, सम्बन्ध एवं प्रयोजन का नामोल्लेख किया गया है। अब हम इन चार बातों को ध्यान में रखकर ही इस खण्ड की व्याख्या प्रस्तुत करेंगे। (क) वेदानाम् अन्तः, इति वेदान्तः इस व्याख्या के अनुसार-वेदों के अन्तिमभाग अर्थात् उपनिषद् ही वेदान्त हैं। अतः इनमें प्रतिपादित सिद्धान्त