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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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१०६ वेदान्तसार (जहत्) तथा थोड़ा सा ग्रहण कर लेने (अजहत्) के कारण इसे सामान्य लक्षणा से भिन्न जहदजहल्लक्षणा कहा गया है। इसीको 'भागलक्षणा' भी कहते हैं। तत्त्वमसि वाक्य में भी इसी भागलक्षणा द्वारा 'तत्' एवं 'त्वम्' पदों के वाच्यार्थ में स्थित विरुद्धांशों का परित्याग करके उनमें स्थित अविरुद्धांश अखण्डचैतन्य को ग्रहण करके ही वाक्यार्थ का बोध कराया जाता है। यहाँ तत् एवं त्वम् पदों का विरुद्धांशरहित वाच्यार्थ लक्षक कहा जाएगा तथा अखण्डचैतन्यरूप अर्थ लक्ष्य होगा। उस स्थिति में लक्ष्यलक्षणसम्बन्ध तथा भागलक्षणा द्वारा विरुद्ध अंश (परोक्षत्वादि विशिष्ट-अपरोक्षत्वादि विशिष्ट) का परित्याग करके अविरुद्ध अंश का ग्रहण करने पर अखण्ड चैतन्य का बोध होगा। इसप्रकार उपर्युक्त तीनों सम्बन्धों के द्वारा अधिकारीशिष्य गुरु की अनुकम्पा से 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य के अखण्ड, एकरसचैतन्यरूप अर्थ के साथ-साथ जीव एवं ब्रह्म के ऐक्य को भी जानने में समर्थ हो जाते हैं। (ख) अहं ब्रह्मास्मि (अनुभववाक्य) - यहाँ तक हमने तत्त्वमसि उपदेशवाक्य तथा उसके अभिप्राय को ग्रहण करने में प्रयुक्त सम्बन्धत्रय का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया। अब हम आचार्य सदानन्द द्वारा वेदान्तसार में वर्णित द्वितीय महावाक्य 'अहं ब्रह्मास्मि' का विवेचन प्रस्तुत करेंगे। वस्तुतः इन दोनों वाक्यों में परस्पर अत्यन्त घनिष्ठसम्बन्ध है, क्योंकि परमकृपालु गुरु से उपदेशवाक्य को सुनकर ही साधक ब्रह्म का साक्षात्कार करने के लिए प्रयत्नशील हो जाता है। वैराग्य आदि साधन-चतुष्टय से सम्पन्न अधिकारी शिष्य की चित्तवृत्ति सच्चिदानन्दघनपरम ब्रह्म के आकार से आकारित होकर प्रकाशित हो उठती है। चित् प्रतिबिम्ब को धारण कर यह चित्तवृत्ति परमब्रह्म को विषय बनाकर ब्रह्मविषयक अज्ञान को विनष्ट कर देती है तथा अज्ञान के नष्ट होने पर वह (चित्तवृत्ति) स्वयं भी नष्ट हो जाती है। इस सम्पूर्णप्रक्रिया की वेदान्त के ग्रन्थों में 'कतक रजोन्याय' के माध्यम से व्याख्या की गई है। जल को स्वच्छ करने वाला कतक चूर्ण जल की मलिनता को दूर करके जिसप्रकार स्वयं भी उसी जल में विलीन हो जाता