वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 121, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका १०७ है। ठीक उसीप्रकार ब्रह्मविषयक अज्ञान को विनष्ट करके यह चित्तवृत्ति भी समाप्त हो जाती है- अज्ञानकलुषं जीव ज्ञानाभ्यासाद्धि निर्मलम्। कृत्वा ज्ञानं स्वयं नश्येत् जलं कतकरेणुवत्॥ इस विषय में ध्यातव्य है कि चैतन्यविषयक अज्ञानरूपी आवरण के विनष्ट होने के साथ-साथ ही साधक को 'अहं ब्रह्मास्मि' की अनुभूति होने लगती है। इसप्रकार 'अहं ब्रह्मास्मि' इस अनुभव में चित्तवृत्ति का ब्रह्म के आकार से आकारित होना, अज्ञान का विनाश तथा उसी के साथ सकल प्रपञ्च एवं चित्तवृत्ति का भी विलीन होना प्रमुख है। जिससमय साधक को ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है तो तत्त्वज्ञान के परिणामस्वरूप उसका द्वैतभाव भी समाप्त हो जाता है अर्थात् इस अवस्था में अद्वैतभाव की सिद्धि हो जाती है। अतः ब्रह्म को जानने वाला वस्तुतः ब्रह्म ही हो जाता है। यही 'अहं ब्रह्मास्मि' इस अनुभव का परमफल कहा जा सकता है।