वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 122, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंवेदान्तसारः अखण्डं सच्चिदानन्दमवाङ्मनसगोचरम्। आत्मानमखिलाधारमाश्रयेऽभीष्टसिद्धये॥१॥ अन्वय-सत्-चित्-आनन्दम्, अवाङ्मनसगोचरम्, अखिल-आधारम् अखण्डम्, आत्मानम् अभीष्टसिद्धये आश्रये। अनुवाद-(ग्रन्थ की निर्विघ्नसमाप्ति अथवा त्रिविधदुःख की आत्यन्तिक- निवृत्ति के लिए सत्य, ज्ञान एवं आनन्दस्वरूप, मन, वाणी तथा इन्द्रियों के अविषय, सम्पूर्ण स्थावरजङ्गमस्वरूप प्रपञ्च के आधारस्वरूप, अखण्ड परमात्मा का अभीष्ट (मनोरथ) की सिद्धि के लिए (मैं सदानन्द) आश्रय ग्रहण करता हूँ। 'चन्द्रिका'- किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने से पूर्व मंगलाचरण की भारतीयपरम्परा का निर्वाह करते हुए आचार्य सदानन्द वेदान्तदर्शन के प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार की निर्विघ्नसमाप्ति के लिए परमात्मा का स्मरण करते हुए कहते हैं कि मैं अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए सच्चिदानन्द, अवाङ्मनसगोचर, सम्पूर्णसृष्टि के आधार स्वरूप, अखण्ड, परमपिता परमात्मा का आश्रय लेता हूँ। प्रस्तुत मङ्गलाचरण में प्रयुक्त प्रत्येक पद विस्तृत व्याख्या की अपेक्षा रखता है, क्योंकि गम्भीर अभिप्राय को लिए हुए ये सभी शब्द ग्रन्थकार ने साभिप्राय प्रयुक्त किए हैं। वेदान्तदर्शन एकमात्र परमब्रह्म की सत्ता को स्वीकार करता है, साथ ही आत्मा एवं ब्रह्म की एकता का भी प्रतिपादन करता है। इसीलिए आचार्य सदानन्द ने यहाँ आत्मा शब्द का प्रयोग परमात्मा अथवा ब्रह्म के अर्थ में किया है। वेदान्त के अनुसार मानवजीवन का एकमात्रलक्ष्य परमब्रह्म का सायुज्य प्राप्त करना है। अतः प्रस्तुत श्लोक द्वारा इस ग्रन्थ के प्रयोजन की ओर भी ग्रन्थकार ने सङ्केत किया है। यहाँ आत्मा के चार विशेषणों का प्रयोग किया गया है, जिनमें उसकी सभी विशेषताओं का समावेश हो जाता है। अतः हम यहाँ उनकी क्रमशः व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं।