वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 126, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ें११२ वेदान्तसार ( ङ ) अभीष्टसिद्धये-यहाँ प्रयुक्त अभीष्ट शब्द भी विशेषव्याख्या की अपेक्षा रखता है, क्योंकि अभीष्ट शब्द यहाँ अनेकार्थक है, इस प्रसंग में इस शब्द के चार अर्थ किए जा सकते हैं- प्रथम, ग्रन्थ की निर्विघ्न- समाप्ति रूपकार्य की सिद्धि के लिए ग्रन्थकार अपने इष्ट ब्रह्म अथवा आत्मा की शरण में जाता है। द्वितीय, वेदान्तदर्शन का अत्यन्त सरलशैली में प्रकरणग्रन्थ का प्रणयन करना ग्रन्थकार का अभिप्रेत है, इस उद्देश्य की सिद्धि में आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए वह अपने आराध्य अथवा विवेच्य आत्मतत्त्व की शरण ग्रहण करता है। तृतीय, इस संसार में प्रत्येक प्राणी आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक त्रिविध दुःखों से पीड़ित है तथा ब्रह्मज्ञान इन्हें दूर करने में समर्थ है। अतः ग्रन्थकार अपने तथा अपने पाठकों के त्रिविध दुःख की आत्यन्तिकनिवृत्ति को अपना अभीष्ट मानकर, उसकी सिद्धिहेतु आराध्य का शरणागत होता है। इसके अतिरिक्त मानवजीवन का चरमलक्ष्य मोक्षप्राप्ति, ग्रन्थकार का लक्ष्य है, ग्रन्थ के माध्यम से ब्रह्मज्ञान, यथार्थज्ञान की चर्चा करके जिसके लिए वह प्रयत्नशील है। इसी अभीष्ट अर्थात् मोक्षप्राप्ति के लिए वह आत्मा अर्थात् परमात्मा का आश्रय ग्रहण करता है। प्रस्तुत मंगलाचरण के भाव को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-१८ स्वरूप ┌───────────────────────────┴──────────────────────────┐ सत् चित् आनन्दम् (कालातीत सत्ता) (ज्ञान, विज्ञान, (आनन्दस्वरूप) चैतन्य स्व प्रकाश सम्पन्न) │ ┌─────────────┐ अखण्डम् ────────────── ┌─────────────┐ ─── अखिलाधारम् ─── ┌───────┐ │अभीष्ट-सिद्धये│─ (एकमात्र │ आत्मा/ब्रह्म │ (सम्पूर्ण │आश्रये │ └─────────────┘ यथार्थ सत्ता) │परमात्मानम् │ चराचर प्रपञ्च └───────┘ └──────┬──────┘ का मूल │ आधार-कारण) ┌───────────────┼───────────────┐ अवाङ् अमनस् अगोचरम् (वाणी) (मन) (इन्द्रियों से ग्रहण न करने योग्य)