वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंमङ्गलाचरण ११३ विशेष-(1) प्रस्तुत कारिका की भाषा सरल, प्रसादगुणयुक्त, भावबोधगम्य, किन्तु अर्थगाम्भीर्य से युक्त प्रयुक्त हुई है। (2) ग्रन्थकार की अभिव्यक्तिसामर्थ्य एवं शब्द सौष्ठव की अभिव्यक्ति हुई है। (3) आत्मा शब्द का प्रयोग ब्रह्म अथवा परमात्मा के लिए किया गया है। (4) प्रस्तुत प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार का प्रतिपाद्य आत्मतत्त्व रहा है, ऐसा अभिप्रायं भी अभिव्यक्त हो रहा है। (5) आत्मा के सभी विशेषण साभिप्राय प्रयुक्त हुए हैं, जो उसकी लगभग सभी महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का कथन करते हैं। (6) ग्रन्थकार के विनम्रभाव की भी अभिव्यक्ति हुई है। अपने इष्ट के प्रति विनम्रभाव, समर्पितभाव सदैव मोक्षप्राप्ति का साधक होता है। अवतरणिका-मङ्गलाचरण में अपने आराध्य के स्मरण के पश्चात् प्रस्तुत श्लोक में आचार्य सदानन्द अपने गुरु अद्वयानन्द को नमन करके वेदान्तसार के कथन की प्रतिज्ञा करते हुए कहते हैं- अर्थतोऽप्यद्वयानन्दानतीतद्वैतभानतः। गुरुनाराध्य वेदान्तसारं वक्ष्ये यथामतिः॥२॥ अन्वय-अतीतद्वैतभानतः अर्थतः अपि अद्वयानन्दान् गुरून् आराध्य यथामतिः वेदान्तसारम् वक्ष्ये। अनुवाद- जिनकी द्वैतभावना दूर हो गई है, यथार्थरूप से भी अखण्ड आनन्दस्वरूप (अद्वयानन्द नामक) गुरु की आराधना करके (मैं सदानन्द अपनी) बुद्धि के अनुसार वेदान्तसार को कहूँगा। 'चन्द्रिका'- ग्रन्थ के प्रारम्भ में अपने इष्टदेव आत्मरूप परमात्मा का स्मरण करने के बाद ग्रन्थकार अपने पूज्यपाद गुरु को नमन करना अपना पुनीतकर्तव्य मानते हैं। साथ ही वे अपने गुरु की दो विशेषताओं का कथन करते हैं- (क) अतीतद्वैतभानतः- उनके गुरु का लौकिक नाम वस्तुतः अद्वयानन्द है। उनकी विशेषता है कि उन्होंने अपनी कठोरसाधना द्वारा ब्रह्म एवं जगत् के पार्थक्य को जान लिया है। आत्मा के दर्शन होने से उनकी द्वैतभावना दूर हो गयी है अर्थात् उनका अज्ञानरूप 'आवरण दूर हो गया है। अब उनकी