वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९४ वेदान्तसार स्थिति वस्तुतः जीवन्मुक्त के समान है, जो अपने प्रारब्धकर्मों के कारण स्थूलशरीर को धारण किए हुए हैं। वे वस्तुतः ब्रह्मस्वरूप ही हैं। ऐसे गुरु अद्वयानन्द के श्रीचरणों में बैठकर आचार्य सदानन्द ने वेदान्त की शिक्षा ग्रहण की है। अतः वेदान्तसार का उपदेश करने से पूर्व ग्रन्थकार उच्चकोटि के साधक परमगुरु को नमन करते हुए उनका आराधन करते हैं। (ख) अद्वयानन्दान्- यद्यपि ग्रन्थकार सदानन्द योगीन्द्र का सांसारिक नाम भी अद्वयानन्द है तथापि उन्होंने योगियों के लिए भी अगम्य आत्मतत्त्व का साक्षात्कार कर लिया है, जिसके कारण उनकी द्वैतभावना पूर्णतया विनष्ट हो चुकी है। सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म में ही उन्हें सदैव आनन्द की अनुभूति होती रहती है। वे सांसारिकता से पूर्णतया ऊपर उठ चुके हैं। इस दृष्टि से वे सच्चे अर्थों में यथानाम तथा गुण वाले हो गए हैं। इसप्रकार की विशेषता वाले सार्थनामा गुरु को ग्रन्थकार अपनी प्रणामाञ्जलि प्रस्तुत करने के बाद ही अपने नूतन प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार का उपदेश करने की प्रतिज्ञा करते हैं। (ग) यथामति- इस शब्द द्वारा ग्रन्थकार अपनी विनम्रता प्रदर्शित करते हुए कहते हैं कि वेदान्तदर्शन अत्यन्त गूढ़विषय है। ब्रह्मसूत्र, उपनिषद् आदि अनेकग्रन्थों में आचार्यों ने अत्यन्त विस्तार से इसका विवेचन किया है। इस सम्पूर्णविवेचन के कारण यह दर्शन अत्यधिक जटिल हो गया है तथा सामान्यव्यक्ति की बुद्धि के लिए इसे ग्रहण करना कठिन हो गया है। अतः मैंने ऐसा अनुभव किया कि वेदान्तदर्शन के सिद्धान्तों को समझाने वाला एक संक्षिप्त एवं सरलग्रन्थ बनाया जाए। इस संकल्प को लेकर मैंने गुरुकृपा एवं भगवत्कृपा से जो कुछ भी सीखा है। उसको अपनी बुद्धि सामर्थ्य से सरलरूप में प्रस्तुत करने का मैं यह विनम्र प्रयास कर रहा हूँ। परमात्मा इस कार्य में मुझे सफलता प्रदान करे। (घ) वेदान्तसार-जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है (वेदान्तस्य सारः, इति वेदान्तसारः) वेदान्तदर्शन का सार। वेद शब्द से अभिप्राय संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों से लिया जाता है। संहिताग्रन्थों में प्रतिपादित ज्ञान की व्याख्या उत्तरोत्तर वैदिकसाहित्य में की गई तथा इसकी पराकाष्ठा हमें उपनिषद्ग्रन्थों में देखने को मिलती है। इसलिए इनमें प्रतिपादित सिद्धान्त अथवा दर्शन का नाम ही वेदान्त रखा गया। उन्हीं सब सिद्धान्तों को सार-संक्षेपरूप में प्रस्तावितग्रन्थ में प्रतिपादित करने की प्रतिज्ञा