भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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मङ्गलाचरण ११५ आचार्य सदानन्द द्वारा प्रस्तुत कारिका में करते हुए उसका सार्थक नामकरण किया गया है। (ङ) वक्ष्ये-ब्रू धातु से आसन्नवर्ती भविष्य के अर्थ में लुट् लकार का प्रयोग ग्रन्थकार ने साभिप्राय किया है, क्योंकि इस प्रतिज्ञा के तुरन्त पश्चात् आचार्य सदानन्द अनुबन्धचतुष्टय का कथन करते हुए ग्रन्थ का आरम्भ कर देते हैं। प्रस्तुत श्लोक के अभिप्राय को इसप्रकार भी समझ सकते हैं- चित्र-१९ जिनकी द्वैत भावना दूर हो गई यथार्थरूप में भी अखण्ड आनन्दस्वरूप (अतीतद्वैतभानतः) | | (अर्थतः अपि अद्वयानन्दान्) अद्वयानन्द नामक गुरु का) (अद्वयानन्दान् गुरून्) | आराधन करके (आराध्य) | अहं आचार्य सदानन्दः —अपनी बुद्धि के अनुसार (यथामतिः) | वेदान्तसारम् वक्ष्ये विशेष-(1) "देवमिवाचार्यमुपासीत" देवता के समान ही आचार्य अर्थात् गुरु की भी उपासना करनी चाहिए, इत्यादि भारतीयमान्यता की पालना की गई है। (2) अद्वयानन्द शब्द में श्लेष अलंकार का प्रयोग हुआ है, क्योंकि इसका एक अर्थ आचार्य सदानन्द के गुरु का सांसारिक नाम, द्वितीय ब्रह्म तथा तृतीय अर्थ अद्वयानन्द का विशेषण है। (3) यहाँ प्रयुक्त आराध्य शब्द ग्रन्थकार के श्रद्धाभक्तिपूर्वक गुरु के प्रति नमन की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है। (4) गुरु की महत्ता की अभिव्यक्ति हुई है। शास्त्रकारों ने भी कहा है- 'यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥