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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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११६ वेदान्तसार (5) वेदान्तसार वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ है। प्रकरणग्रन्थ की शास्त्रों में इसप्रकार परिभाषा प्रस्तुत की गई है- शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम्। आहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चितः॥ अवतरणिका-वेदान्तसार के उपदेश की प्रतिज्ञा करने के उपरान्त 'वेदान्त' शब्द की व्याख्या करके अनुबन्धचतुष्टय का उल्लेख करते हुए सदानन्द योगीन्द्र कहते हैं- वेदान्तो नामोपनिषत्प्रमाणं तदुपकारीणि शारीरकसूत्रादीनि च। अस्य वेदान्तप्रकरणत्वात्तदीयैरेवानुबन्धैस्तद्गतासिद्धेर्न ते पृथगालोचनीयाः। तत्रानुबन्धो नामाधिकारिविषयसम्बन्धप्रयोजनानि॥३॥ पदच्छेद-वेदान्तः नाम उपनिषद् प्रमाणम्, तत् उपकारीणि शारीरक सूत्रादीनि च। अस्य वेदान्त-प्रकरणत्वात् तदीयैः एव अनुबन्धैः तद्गता-सिद्धेः, न ते पृथक् आलोचनीयाः। तत्र अनुबन्धः नाम अधिकारी-विषय- सम्बन्ध-प्रयोजनानि॥ अनुवाद-उपनिषद् को प्रमाण मानकर चलने वाला शास्त्र वस्तुतः वेदान्त कहा गया है और ब्रह्मसूत्र (शारीरकसूत्र) आदि उनके उपकारक (व्याख्या) ग्रन्थ हैं। इस (वेदान्तसार) के वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ होने से, उसके अनुबन्धों के साथ ही इसकी भी अनुबन्धवत्ता सिद्ध होने के कारण, उन्हें अलग मानना उचित नहीं है। 'चन्द्रिका'-प्रस्तुत खण्ड में ग्रन्थकार ने मुख्यरूप से चार बातों की ओर संकेत किया है। प्रथम, वेदान्त की परिभाषा देते हुए उसे उपनिषदों को आधार मानकर चलने वाला शास्त्र बताना। द्वितीय, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भगवद्- गीता आदि ग्रन्थों को वेदान्त के ही उपकारक अर्थात् व्याख्याग्रन्थ प्रतिपादित करना। तृतीय, प्रस्तावित वेदान्तसार वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ होने, वेदान्त के सभी अनुबन्ध प्रस्तुतग्रन्थ पर भी लागू होने से उनको पृथक् मानने का निषेध तथा अन्त में अनुबन्ध चतुष्टय-अधिकारी, विषय, सम्बन्ध एवं प्रयोजन का नामोल्लेख किया गया है। अब हम इन चार बातों को ध्यान में रखकर ही इस खण्ड की व्याख्या प्रस्तुत करेंगे। (क) वेदानाम् अन्तः, इति वेदान्तः इस व्याख्या के अनुसार-वेदों के अन्तिमभाग अर्थात् उपनिषद् ही वेदान्त हैं। अतः इनमें प्रतिपादित सिद्धान्त