वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिभाषा ११७ अथवा दर्शन का नाम भी वेदान्त हुआ, किन्तु विद्वानों ने वेदान्त शब्द की भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं- (1) वेद शब्द से संहिताग्रन्थ, ब्राह्मणग्रन्थ, आरण्यक एवं उपनिषद्ग्रन्थों तक अभिप्राय लिया जाता है। इन सभी में उपनिषदों की रचना सबसे अन्त में होने के कारण उपनिषद्ग्रन्थों को 'वेदान्त' कहा गया। (2) प्राचीनसमय में लेखन तकनीक के विकास के अभाव में वेदों को मौखिकरूप में ही कण्ठस्थ करके सुरक्षित रखने की परम्परा रही। यह परम्परा ज्ञान को गुरुमुख से शिष्यों द्वारा श्रवण करके सुरक्षित रखी गयी। इस क्रम में गुरुजन उपनिषदों का अध्यापन अपने शिष्यों को अन्त में कराते थे। इसलिए उपनिषदों को वेदान्त कहा गया। उपनिषदों को अन्त में पढ़ाने के पीछे उनका दृष्टिकोण यही था कि इनमें प्रतिपादित यज्ञादि के रहस्य एवं दार्शनिकविचार अत्यन्त जटिल थे, उनका आरम्भ में ज्ञान कराना अत्यन्त कठिन था। (3) इसके अतिरिक्त अध्यापनक्रम में उत्तरोत्तरज्ञान कराने की दृष्टि से भी उपनिषदों को अन्तिमस्थान सर्वसम्मति से दिया गया था, क्योंकि आचार्यों ने इसे पुण्य प्रदान करने वाली उचित विधि माना था। अतः उपनिषदों को वेदान्त-संज्ञा प्राप्त हुई। (4) कुछ अन्य आचार्यों ने उपनिषदों में ज्ञान की पराकाष्ठा को इनके 'वेदान्त' कहे जाने के हेतुरूप में स्वीकार किया, क्योंकि इन ग्रन्थों में हमें ज्ञान की उत्कृष्टतम स्थिति अर्थात् चरमसीमा देखने को मिलती है। इसलिए इनका 'वेदान्त' नामकरण उचित है। (ख) उपनिषदों के लिए प्रयुक्त वेदान्त शब्द की उपर्युक्त चारों ही व्याख्याएँ हमें युक्तिसंगत प्रतीत होती हैं। अतः उपनिषद् ही वस्तुतः वेदान्त हैं। इसलिए उनमें प्रतिपादित सिद्धान्त अथवा दर्शन का नाम भी आचार्यों द्वारा 'वेदान्त' ही रखा गया। वेदान्तदर्शन में स्थल-स्थल पर उपनिषद्वाक्यों को श्रुतिवचन के रूप में प्रस्तुत करते हुए प्रमाण भी माना गया है। इसके अतिरिक्त यहाँ प्रयुक्त उप एवं नि उपसर्गपूर्वक सद् धातु से क्विप् प्रत्यय करके निष्पन्न 'उपनिषद्' शब्द की भी आचार्यों ने विभिन्न व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं। क्योंकि 'षदॢविशरणगत्यवसादनेषु' के अनुसार 'सद्' धातु के विशरण (नष्ट होना), गति (जाना) एवं अवसादन (शिथिल करना) इन तीन अर्थों के आधार पर उपनिषद् के भी तीन अर्थ किए जा सकते हैं।