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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

परिभाषा

११६ वेदान्तसार (5) वेदान्तसार वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ है। प्रकरणग्रन्थ की शास्त्रों में इसप्रकार परिभाषा प्रस्तुत की गई है- शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम्। आहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चितः॥ अवतरणिका-वेदान्तसार के उपदेश की प्रतिज्ञा करने के उपरान्त 'वेदान्त' शब्द की व्याख्या करके अनुबन्धचतुष्टय का उल्लेख करते हुए सदानन्द योगीन्द्र कहते हैं- वेदान्तो नामोपनिषत्प्रमाणं तदुपकारीणि शारीरकसूत्रादीनि च। अस्य वेदान्तप्रकरणत्वात्तदीयैरेवानुबन्धैस्तद्गतासिद्धेर्न ते पृथगालोचनीयाः। तत्रानुबन्धो नामाधिकारिविषयसम्बन्धप्रयोजनानि॥३॥ पदच्छेद-वेदान्तः नाम उपनिषद् प्रमाणम्, तत् उपकारीणि शारीरक सूत्रादीनि च। अस्य वेदान्त-प्रकरणत्वात् तदीयैः एव अनुबन्धैः तद्गता-सिद्धेः, न ते पृथक् आलोचनीयाः। तत्र अनुबन्धः नाम अधिकारी-विषय- सम्बन्ध-प्रयोजनानि॥ अनुवाद-उपनिषद् को प्रमाण मानकर चलने वाला शास्त्र वस्तुतः वेदान्त कहा गया है और ब्रह्मसूत्र (शारीरकसूत्र) आदि उनके उपकारक (व्याख्या) ग्रन्थ हैं। इस (वेदान्तसार) के वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ होने से, उसके अनुबन्धों के साथ ही इसकी भी अनुबन्धवत्ता सिद्ध होने के कारण, उन्हें अलग मानना उचित नहीं है। 'चन्द्रिका'-प्रस्तुत खण्ड में ग्रन्थकार ने मुख्यरूप से चार बातों की ओर संकेत किया है। प्रथम, वेदान्त की परिभाषा देते हुए उसे उपनिषदों को आधार मानकर चलने वाला शास्त्र बताना। द्वितीय, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भगवद्- गीता आदि ग्रन्थों को वेदान्त के ही उपकारक अर्थात् व्याख्याग्रन्थ प्रतिपादित करना। तृतीय, प्रस्तावित वेदान्तसार वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ होने, वेदान्त के सभी अनुबन्ध प्रस्तुतग्रन्थ पर भी लागू होने से उनको पृथक् मानने का निषेध तथा अन्त में अनुबन्ध चतुष्टय-अधिकारी, विषय, सम्बन्ध एवं प्रयोजन का नामोल्लेख किया गया है। अब हम इन चार बातों को ध्यान में रखकर ही इस खण्ड की व्याख्या प्रस्तुत करेंगे। (क) वेदानाम् अन्तः, इति वेदान्तः इस व्याख्या के अनुसार-वेदों के अन्तिमभाग अर्थात् उपनिषद् ही वेदान्त हैं। अतः इनमें प्रतिपादित सिद्धान्त

परिभाषा ११७ अथवा दर्शन का नाम भी वेदान्त हुआ, किन्तु विद्वानों ने वेदान्त शब्द की भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं- (1) वेद शब्द से संहिताग्रन्थ, ब्राह्मणग्रन्थ, आरण्यक एवं उपनिषद्ग्रन्थों तक अभिप्राय लिया जाता है। इन सभी में उपनिषदों की रचना सबसे अन्त में होने के कारण उपनिषद्ग्रन्थों को 'वेदान्त' कहा गया। (2) प्राचीनसमय में लेखन तकनीक के विकास के अभाव में वेदों को मौखिकरूप में ही कण्ठस्थ करके सुरक्षित रखने की परम्परा रही। यह परम्परा ज्ञान को गुरुमुख से शिष्यों द्वारा श्रवण करके सुरक्षित रखी गयी। इस क्रम में गुरुजन उपनिषदों का अध्यापन अपने शिष्यों को अन्त में कराते थे। इसलिए उपनिषदों को वेदान्त कहा गया। उपनिषदों को अन्त में पढ़ाने के पीछे उनका दृष्टिकोण यही था कि इनमें प्रतिपादित यज्ञादि के रहस्य एवं दार्शनिकविचार अत्यन्त जटिल थे, उनका आरम्भ में ज्ञान कराना अत्यन्त कठिन था। (3) इसके अतिरिक्त अध्यापनक्रम में उत्तरोत्तरज्ञान कराने की दृष्टि से भी उपनिषदों को अन्तिमस्थान सर्वसम्मति से दिया गया था, क्योंकि आचार्यों ने इसे पुण्य प्रदान करने वाली उचित विधि माना था। अतः उपनिषदों को वेदान्त-संज्ञा प्राप्त हुई। (4) कुछ अन्य आचार्यों ने उपनिषदों में ज्ञान की पराकाष्ठा को इनके 'वेदान्त' कहे जाने के हेतुरूप में स्वीकार किया, क्योंकि इन ग्रन्थों में हमें ज्ञान की उत्कृष्टतम स्थिति अर्थात् चरमसीमा देखने को मिलती है। इसलिए इनका 'वेदान्त' नामकरण उचित है। (ख) उपनिषदों के लिए प्रयुक्त वेदान्त शब्द की उपर्युक्त चारों ही व्याख्याएँ हमें युक्तिसंगत प्रतीत होती हैं। अतः उपनिषद् ही वस्तुतः वेदान्त हैं। इसलिए उनमें प्रतिपादित सिद्धान्त अथवा दर्शन का नाम भी आचार्यों द्वारा 'वेदान्त' ही रखा गया। वेदान्तदर्शन में स्थल-स्थल पर उपनिषद्वाक्यों को श्रुतिवचन के रूप में प्रस्तुत करते हुए प्रमाण भी माना गया है। इसके अतिरिक्त यहाँ प्रयुक्त उप एवं नि उपसर्गपूर्वक सद् धातु से क्विप् प्रत्यय करके निष्पन्न 'उपनिषद्' शब्द की भी आचार्यों ने विभिन्न व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं। क्योंकि 'षदॢविशरणगत्यवसादनेषु' के अनुसार 'सद्' धातु के विशरण (नष्ट होना), गति (जाना) एवं अवसादन (शिथिल करना) इन तीन अर्थों के आधार पर उपनिषद् के भी तीन अर्थ किए जा सकते हैं।

११८ वेदान्तसार (१) इन ग्रन्थों के अध्ययन से मोक्ष के इच्छुक साधकों की संसार की कारणरूप अविद्या नष्ट (विशरण) हो जाती है एवं उनका मोक्षमार्ग प्रशस्त होता है। (२) इनके अध्ययनपूर्वक चिन्तन से ब्रह्म की प्राप्ति अथवा ज्ञान होता है। इसलिए इन्हें उपनिषद् कहते हैं (गति)। (३) इन ग्रन्थों के अध्ययन द्वारा व्यक्ति के आध्यात्मिक, आधिभौतिक एवं आधिदैविक तीन प्रकार के दुःख शिथिल होते हैं। (अवसादन) इसलिए इन्हें उपनिषद् कहा जाता है। शङ्कराचार्य ने उपनिषद् का मुख्य अर्थ ब्रह्मविद्या तथा अप्रधान अर्थ 'ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन करने वाला विशेषग्रन्थ' किया है- तस्माद् विद्यायां मुख्यया वृत्त्या उपनिषच्छब्दो वर्तते ग्रन्थे तु भक्त्या... वस्तुतः नि उपसर्गपूर्वक सद् धातु का एक अर्थ बैठना भी है तथा यहाँ प्रयुक्त 'उप' उपसर्ग 'समीप' अर्थ का द्योतक है। अतः यज्ञ की दृष्टि से अग्नि के समीप बैठना, ज्ञान की दृष्टि से गुरु के समीप बैठना, तपस्या अथवा ध्यान की दृष्टि से निश्चल होकर ब्रह्म के समीप बैठना इत्यादि अर्थ भी इस शब्द के किए जा सकते हैं। जो उपनिषद्ग्रन्थों के विविध अभिप्रायों को अभिव्यक्त करते हैं। इसप्रकार की विशेषताओं से सम्पन्न ज्ञानराशि के अथाह आगार उपनिषद्ग्रन्थों को प्रमाणरूप में मानकर चलने वाला दर्शन 'वेदान्त' कहा गया। शारीरकसूत्र आदि ग्रन्थ इन्हीं उपनिषद् एवं वेदान्त की व्याख्या करने के कारण इनका उपकार करने वाले हैं। शारीरकसूत्र से यहाँ अभिप्राय महर्षि व्यास विरचित ब्रह्मसूत्र से है तथा 'आदि' शब्द श्रीमद्भगवद्गीता के लिए प्रयुक्त हुआ है, अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीता एवं ब्रह्मसूत्र आदि ग्रन्थ इसी वेदान्त की सरलतम व्याख्या के लिए लिखे गए हैं। यहाँ प्रयुक्त 'शारीरक सूत्र' शब्द भी व्याख्या की अपेक्षा रखता है- (ग) शारीरकसूत्रादीनि-"शरीरमेव शरीरकं तत्र भवो जीवः शारीरकः स सूत्र्यते यथातथ्येन निरुप्यते यैस्तानि शारीरकसूत्राणि अथातो ब्रह्मजिज्ञासेत्यादीनि" अर्थात् शरीर शब्द से 'कुत्सा' अर्थ में 'क' प्रत्यय करने पर शरीरक शब्द निष्पन्न होता है। तत्पश्चात् 'तत्र भवः' इस अभिप्राय की अभिव्यक्ति के लिए 'अण्' प्रत्यय करने पर आदिवृद्धि होकर शारीरक

अनुबन्ध चतुष्टय

अनुबन्ध चतुष्टय १११ शब्द बनता है। इसका अर्थ है- 'कुत्सित शरीर में निवास करने वाला-जीवात्मा।' जिन सूत्रों में उस जीवात्मा के यथार्थस्वरूप का प्रतिपादन किया गया है, उन्हें शारीरकसूत्र नाम दिया गया। इन सूत्रों की रचना महर्षि व्यास द्वारा की गयी है। इन्हीं का दूसरा नाम ब्रह्मसूत्र भी है। सूत्रादीनि में प्रयुक्त आदि शब्द से अभिप्राय श्रीमद्भगवद्गीता एवं इसीप्रकार के अन्यग्रन्थों से लिया जाना चाहिए। जिनमें आत्म-तत्त्व का विवेचन किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता आत्मतत्त्व विवेचन करने वाला उत्कृष्टग्रन्थ माना गया है। इसमें वेदान्तस्वरूप उपनिषद् में प्रतिपादित दर्शन की ही पुष्टि एवं व्याख्या की गयी है। इस दृष्टि से इसे भी उपनिषदों का उपकारक कहा गया है। इसलिए वेदान्तदर्शन को भलीप्रकार समझने के लिए ब्रह्मसूत्र एवं श्रीमद्भगवद्गीता आदि वेदान्तसिद्धान्त के प्रतिपादक ग्रन्थों का जिज्ञासु अथवा साधक को अवश्य अध्ययन करना चाहिए। ऐसा ग्रन्थकार का अभिप्राय स्वीकार किया जा सकता है। (घ) उपर्युक्त खण्ड के तृतीय अंश में ग्रन्थकार प्रस्तावित 'वेदान्तसार' को वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ बताते हुए वेदान्त के सभी अनुबन्ध चतुष्टय को प्रस्तुतग्रन्थ पर भी लागू होने की बात कहते हुए, उन्हें पृथक् मानने की आवश्यकता नहीं है, ऐसा प्रतिपादन करते हैं। इस प्रसङ्ग में प्रकरण एवं अनुबन्ध दो शब्द विशेष व्याख्या की अपेक्षा रखते हैं- (१) प्रकरणग्रन्थ - यदि किसी ग्रन्थ में शास्त्रविशेष के किसी एक भाग अथवा सिद्धान्त का विस्तृतविवेचन सरलतम रीति से प्रस्तुत किया जाता है तो वह ग्रन्थ उस शास्त्र का प्रकरणग्रन्थ कहलाता है। जैसे- नाट्यशास्त्र के सिद्धान्तों का सरलतम ढंग से प्रतिपादन करने वाला आचार्य धनञ्जय विरचित दशरूपकम् नामक ग्रन्थ। ठीक इसीप्रकार प्रस्तुत वेदान्तसार में भी वेदान्तदर्शन के सिद्धान्तों को सरलरूप में प्रतिपादित किया गया है। अतः इसे भी 'वेदान्त' का प्रकरणग्रन्थ कहा गया है। (२) अनुबन्ध - कोई भी व्यक्ति ग्रन्थविशेष को देखने के पश्चात् इसप्रकार विचार करता है- (क) यह किस विषय का ग्रन्थ है? अर्थात् इसमें किस विषय का प्रतिपादन किया गया है। (ख) क्या मैं इस ग्रन्थ को पढ़ सकता हूँ अथवा क्या इसे पढ़ने का मैं अधिकारी हूँ, क्योंकि कोई भी व्यक्ति प्रत्येक विषय को पढ़ने तथा समझने में समर्थ नहीं हो सकता। (ग) इस पुस्तक में प्रतिपादितविषय तथा पुस्तक के नामकरण में क्या कोई

१२० वेदान्तसार सम्बन्ध है अर्थात् क्या इस पुस्तक के नामकरण तथा इसमें प्रतिपादित विषय में कोई सीधा सम्बन्ध है? (घ) इस ग्रन्थ का अध्ययन करने से क्या मुझे कोई लाभ होगा? कहीं इस पुस्तक के अध्ययन से मेरा समय और शक्ति व्यर्थ तो नहीं होंगे? इन चार बातों को ध्यान में रख़कर ही कोई भी व्यक्ति किसी ग्रन्थ के अध्ययन में प्रवृत्त होता है। मनोनुकूलता होने पर ही वह ग्रन्थ को प्रारम्भ से अन्त तक रुचिपूर्वक पढ़ता है, उस पर चिन्तन करता है। इसीलिए कोई भी ग्रन्थकार ग्रन्थ के प्रारम्भ में इन चारों बातों का उल्लेख अवश्य करता है। इसीको शास्त्रीयभाषा में अनुबन्ध-चतुष्टय कहा जाता है। इसी बात को विद्वानों ने इसप्रकार प्रतिपादित किया है- ज्ञातार्थं ज्ञातसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते। ग्रन्थादौ तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः।। (वाचस्पत्यम्) वेदान्तदर्शन के मुख्यग्रन्थ ब्रह्मसूत्र आदि में अनुबन्धचतुष्टय का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया गया है तथा प्रस्तुत 'वेदान्तसार' वेदान्तदर्शन का ही एक प्रकरणग्रन्थ है। इसलिए इनकी आपस में अनुबन्धवत्ता स्वतः सिद्ध होती है अर्थात् ब्रह्मसूत्र एवं वेदान्तसार के अनुबन्धचतुष्टय में लेशमात्र भी भेद नहीं है। ब्रह्मसूत्र के अनुबन्ध वेदान्तसार पर भी लागू होते हैं। अतः इनको पृथक्-पृथक् मानने का औचित्य नहीं है। प्रस्तुतखण्ड के अन्तिम अंश में ग्रन्थकार अनुबन्धचतुष्टय का अधिकारी, विषय, सम्बन्ध और प्रयोजन के रूप में नामोल्लेख करके, अग्रिम खण्ड में उसे स्पष्ट करते हैं। जिसका विस्तृत विवेचन हम अग्रिम खण्ड की व्याख्या करते समय ही करेंगे। विशेष- (1) 'वेदान्त' शब्द वेदान्तदर्शन के लिए प्रयुक्त हुआ है। (2) 'उपकारक' से अभिप्राय व्याख्या करने वाले ग्रन्थों से ग्रहण करना चाहिए। (3) ब्रह्मसूत्र वेदान्तदर्शन का उत्कृष्टग्रन्थ माना गया है जिसकी संरचना महर्षि व्यास ने की। इसी का अन्य नाम 'शारीरकसूत्र' भी है। (4) वेदान्तसार की रचना आचार्य सदानन्द ने गद्यखण्डों के रूप में की है। सम्पूर्णग्रन्थ में कुल 37 गद्यखण्डों का प्रयोग हुआ है। (5) अपने कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार ने पदे-पदे श्रुतिवचनों (उपनिषद्वाक्यों) को प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया है। प्राचीनसमय में विषय प्रतिपादन की यही शैली रही है।

अनुबन्ध चतुष्टय १२१ (6) प्रस्तुतखण्ड के तृतीय अंश में प्रयुक्त 'न ते पृथक् आलोचनीयाः' का अभिप्राय 'उन्हें अलग नहीं समझना चाहिए' करना उचित है, किन्तु कुछ विद्वानो ने 'उनकी अलग से व्याख्या उचित नहीं है' ऐसा अर्थ भी किया है। (7) प्रस्तुत अंश के अन्तिमचरण में प्रयुक्त 'तत्र' पद के व्याख्याकारों में विद्वन्मनोरञ्जिनीकार ने इसका वेदान्तशास्त्र अर्थ किया है, जबकि कुछ अन्य विद्वान् इसे 'अनुबन्ध के सम्बन्ध में' प्रयुक्त मानते हैं। (8) यहाँ प्रयुक्त 'नाम' पद 'वस्तुतः' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है। (9) उपर्युक्त खण्ड के अभिप्राय को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-२० [वेदान्तशास्त्र] [उपनिषद्] → [अनुबन्ध चतुष्टय] ← [ब्रह्मसूत्र (शारीरकसूत्र / श्रीमद्भगवद्गीता] [प्रमाण स्वरूप] ← [अनुबन्ध चतुष्टय] → [उपकारक/व्याख्या ग्रन्थ] [अधिकारी] [विषय] [सम्बन्ध] [प्रोजन] ↑ (अनुबन्ध चतुष्टय) ← [वेदान्तप्रकरणत्वात् तदीयैः एव अनुबन्धैः तद्वत्ता सिद्धेः न ते पृथक् आलोचनीयाः।] वेदान्तसार [प्रकरण ग्रन्थ] अवतरणिका-वेदान्तसार एवं वेदान्तशास्त्र के अनुबन्ध-चतुष्टय के ऐक्य प्रतिपादनपूर्वक आचार्य सदानन्द, अधिकारी, विषय, सम्बन्ध और प्रयोजन इस अनुबन्ध का नाम संकीर्तन करने के बाद प्रस्तुतखण्ड में प्रथम अनुबन्ध अधिकारी की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करते हुए कहते हैं- अधिकारी तु विधिवदधीतवेदवेदाङ्गत्वेनापाततोऽधिगताखिल- वेदार्थोऽस्मिन् जन्मनि जन्मान्तरे वा काम्यनिषिद्धवर्जनपुरःसरं नित्य-

१२२ वेदान्तसार नैमित्तिकप्रायश्चित्तोपासनानुष्ठानेन निर्गतनिखिलकल्मषतया नितान्त- निर्मलस्वान्तः साधनचतुष्टयसम्पन्नः प्रमाता। पदच्छेद-अधिकारी तु विधिवत्-अधीन-वेद-वेदाङ्गत्वेन आपाततः अधिगत अखिल वेदार्थः, अस्मिन् जन्मनि जन्मान्तरे वा, काम्य-निषिद्ध-वर्जन पुरःसरम्, नित्य-नैमित्तिक- प्रायश्चित्त-उपासना-अनुष्ठानेन, निर्गत-निखिल कल्मषतया, नितान्त-निर्मल-स्व-अन्तः, साधन-चतुष्टय-सम्पन्नः प्रमाता। अनुवाद- अधिकारी तो वस्तुतः (वह) जिज्ञासु (प्रमाता) है, जिसने वेद-वेदाङ्गों का विधिपूर्वक अध्ययन करके सम्पूर्णवेदों के अभिप्राय को भलीप्रकार जान लिया है। इस जन्म में अथवा पूर्वजन्म में, कामनाओं को पूर्ण करने वाले काम्यकर्म तथा शास्त्रों द्वारा निषेध किए गए कर्मों को छोड़ने के साथ-साथ, नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित्त और उपासनाकर्मों के अनुष्ठान से, सम्पूर्णपापों (कल्मषता) से मुक्त, अत्यधिक निर्मल अन्तःकरण वाला होकर साधन-चतुष्टय को अपना लिया है। 'चन्द्रिका'- वस्तुतः वेदान्तशास्त्र का अध्ययन करने का अधिकारी केवल वही जिज्ञासु व्यक्ति हो सकता है जिसने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेदादि संहिता ग्रन्थों तथा इनके ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों का गहन अध्ययन करने के साथ-साथ, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द एवं ज्योतिष इन छः वेदाङ्गों का गुरुमुख से विधिवत् ज्ञान प्राप्त किया हो। परिणामस्वरूप वेदों में प्रतिपादित अभिप्राय को हृदयंगम कर लिया हो। इसप्रकार वेदों का विस्तृत एवं गहन अध्ययन सम्भव है, व्यक्ति एक जन्म में पूर्णरूप से न कर सके अथवा अधिकारी बनने की योग्यता के लिए यदि व्यक्ति के लिए एक जन्म पर्याप्त न हो तो यह कार्य वह अनेकजन्मों में भी निष्पादित कर सकता है। इसी अभिप्राय को व्यक्त करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि इस वर्तमान जन्म में अथवा पूर्व जन्मों में जिस साधक ने अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने के साधनस्वरूप जितने भी काम्यकर्म हैं तथा हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि एवं आचार्यों द्वारा लिखे गए शास्त्रों में जिन कर्मों का निषेध किया गया है अर्थात् जिन्हें करने से पाप अथवा नरक की प्राप्ति होती है, ब्रह्महत्या आदि ऐसे निषिद्धकर्मों का भी जिसने परित्याग कर दिया हो, ऐसा प्रमाता ही वेदान्तशास्त्र के अध्ययन का अधिकारी हो सकता है। ग्रन्थकार ने यहाँ तक प्रमाता के लिए दो बातों पर अधिक जोर दिया प्रथम, वेद-वेदाङ्गों का गुरुमुख से विधिपूर्वक गहन अध्ययन, द्वितीय, काम्य

अनुबन्ध चतुष्टय १२३

एवं निषिद्धकर्मों का परित्याग। तत्पश्चात् उसके द्वारा किए जाने वाले उन कर्मों का उल्लेख करते हैं जिनके करने से उस जिज्ञासु का अन्तःकरण पूर्णतया पापरहित होकर नितान्तनिर्मल हो जाता है। इस क्रम में नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित्त और उपासन चार कर्मों के करने का प्रावधान किया गया है। (१) नित्यकर्म- वे कहलाते हैं जिनके करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति न हो, किन्तु न करने से हानि अवश्य होती हो। जैसे-दन्तधावन्, स्नान करने या घर में झाडू लगाने से कोई विशेष पुण्य नहीं होता है, किन्तु इनके न करने से घर में कूड़ा बढ़ने, शरीर पर मैल की वृद्धि होने से स्वास्थ्य विषयक हानि अवश्य होती है। इसीप्रकार व्यक्ति दिनभर जाने-अन्जाने अनेक पापकर्म करता है, वे एकत्रित होकर हानिकर न हों, इसके लिए किए गए सन्ध्यावन्दन आदि कर्म भी नित्यकर्मों की श्रेणी में ही परिगणित हैं। (२) किसी निमित्तविशेष को मानकर किए गए कर्म नैमित्तिक कहलाते हैं। जैसे-पुत्र आदि के उत्पन्न होने पर किए गए जातेष्टियज्ञ अथवा ग्रहण आदि के अवसर पर किया गया स्नान, नैमित्तिककर्म की कोटि में आता है। (३) जाने अन्जाने किए गए पापों के प्रक्षालन के लिए प्रायश्चित्त स्वरूप किए गए कर्म चान्द्रायण व्रतादि प्रायश्चित्त कर्मों की श्रेणी में माने गए हैं। शास्त्रों की ऐसी मान्यता है कि इन कर्मों को करने से व्यक्ति पापमुक्त हो जाता है। (४) सम्पूर्ण चराचरजगत् को उस परमब्रह्म परमात्मा का स्वरूप मानकर चित्त की एकाग्रता के लिए अत्यन्त आदरभाव से जो प्रयास किए जाते हैं, उन्हें दार्शनिकभाषा में उपासनकर्म कहते हैं। इस क्रम में साधक वस्तुतः अपने आराध्यदेव का सगुणरूप में चिन्तन करते हुए इधर-उधर भटकते हुए अपने मन को एक स्थान पर लगाता है। छान्दोग्योपनिषद् में आचार्य शाण्डिल्य ने इस विद्या का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है। इसीकारण इस विद्या को उनके नाम से “शाण्डिल्य-विद्या" के रूप में जाना जाता है। नित्य, नैमित्तिक एवं प्रायश्चित्तकर्मों द्वारा साधक की बुद्धि की शुद्धि होती है तथा उपासनकर्मों से चित्त की एकाग्रता में वृद्धि होती है। इसलिए साधक को अनिवार्यरूप से इन कर्मों को करना चाहिए, तभी वह इस शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी होता है। यद्यपि नित्य, नैमित्तिक एवं उपासन- कर्मों द्वारा पितृलोक तथा सत्यलोकादि की प्राप्ति भी होती है तथापि इनका

१२४ वेदान्तसार मुख्य अभिप्राय यहाँ बुद्धि की शुद्धि तथा चित्त की एकाग्रता ही माना गया है। प्रस्तुत खण्ड के अन्त में ग्रन्थकार अधिकारी के लिए अन्तिम शर्त ‘साधनचतुष्टयसम्पन्न होना' की अनिवार्यता का प्रतिपादन करते हैं। यहाँ 'साधनचतुष्टय' से अभिप्राय (1) नित्य अनित्यवस्तुविवेक (2) ऐहिक एवं पारलौकिक फलों के प्रति वैराग्यभावना (3) शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान और श्रद्धा आदि छः प्रकार की सम्पत्ति तथा (4) मोक्षप्राप्ति के लिए प्रबल इच्छा से है। इन चार प्रकार के साधनों से सम्पन्न प्रमाता ही इस शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी हो सकता है, ऐसा आचार्य सदानन्द प्रतिपादित करते हैं। इनमें प्रथम, नित्य-अनित्य वस्तुविवेक से अभिप्राय उस निश्चयात्मक चिन्तन से है, जिसमें प्रमाता एकमात्र परमब्रह्म को नित्य सत्ता वाला तथा उसके अतिरिक्त समस्त दृश्यमानपदार्थों को अनित्य मानता है। द्वितीय, विराग-इस संसार में कर्म द्वारा प्राप्त होने वाली भोग-विलास विषयक सामग्री, जिनमें हम असीम आनन्द का अनुभव करते हैं, कर्मजन्य होने से अनित्य हैं, क्योंकि जो वस्तु हमें आज दिखायी दे रही है, वही कल नष्ट हो जाती है। इसीप्रकार यज्ञादिकमों के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले स्वर्ग आदि भी अनित्य ही हैं, क्योंकि पुण्य के विद्यमान रहने तक ही व्यक्ति स्वर्ग में रह सकता है। उसके बाद उसे पुनः पृथ्वीलोक पर ही जन्म लेना पड़ता है (क्षीणे पुण्ये निवर्तते मृत्युलोके)। इस दृष्टि से इहलौकिक एवं पारलौकिकसुखों के प्रति वैराग्य की भावना रखना श्रेयष्कर है। तृतीय-शमादि षटकसम्पत्ति में शम से अभिप्राय है जिसप्रकार भूख-प्यास से व्याकुल व्यक्ति का मन बार-बार अन्न एवं जल की ओर जाता है। ठीक उसीप्रकार श्रवण, मनन इत्यादि को छोड़कर अन्य सांसारिक विषयों की ओर बार-बार दौड़कर जाते हुए मन को विशेषप्रकार की अन्तःकरणवृत्ति द्वारा रोका जाना ही 'शम' है। दम- चक्षुश्रोत्रादि बाह्य इन्द्रियों को ब्रह्मसाक्षात्कार के साधनस्वरूप श्रवण-मनन आदि से व्यतिरिक्त विषयों में जाने से रोकना ही दम है। दूसरे शब्दों में बाह्य इन्द्रियों को सांसारिकविषयों की ओर जाने से नियन्त्रित करना ही दम है। इसीप्रकार शास्त्रों द्वारा बताए गए नित्य, नैमित्तिक कर्मों का शास्त्रोक्त विधि द्वारा परित्याग करना उपरति है। शरीर का धर्म समझकर सर्दी-गर्मी

अनुबन्ध चतुष्टय १२५ को सहन कर लेना तितिक्षा कहलाता है। वश में किए हुए मन को ब्रह्म साक्षात्कार के साधनस्वरूप श्रवण, मनन आदि को उसके अनुरूप विषयों में लगाना ही समाधि है। साथ ही गुरु द्वारा उपदिष्टवाक्यों में अगाध विश्वास रखना ही श्रद्धा माना गया है। इसके बिना ब्रह्मप्राप्ति लगभग असम्भव ही है। इस छः प्रकार की सम्पत्ति से सम्पन्न प्रमाता ही इस शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी हो सकता है। उपर्युक्त साधनत्रय के अतिरिक्त एक अन्य साधन मोक्ष की प्राप्ति के प्रति प्रबल इच्छा होना, भी ग्रन्थकार ने अधिकारी के लिए आवश्यक माना है, क्योंकि मोक्षेच्छा के अभाव में व्यक्ति की इस शास्त्र में प्रवृत्ति ही नहीं होगी। ब्रह्मज्ञान उसके लिए व्यर्थ होगा। इसप्रकार वेदवेदाङ्गों का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने वाला प्रमाता, काम्य एवं निषिद्धकर्मों का परित्याग करके नित्य, नैमित्तिक आदि कर्मों के अनुष्ठान द्वारा, पूर्णतया पवित्र, निर्मलचित्त सम्पन्न होकर नित्य-अनित्य वस्तुविवेक आदि साधन-चतुष्टय से समृद्ध होकर ही इस शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी हो सकता है। विशेष-(1) प्रस्तुत खण्ड में ग्रन्थकार ने अनुबन्धचतुष्टय के प्रथम अनुबन्ध 'अधिकारी' होने के लिए अनिवार्य योग्यताओं का उल्लेख अत्यन्त संक्षेप में किया है। (2) ग्रन्थकार ने यहाँ वेदवेदाङ्गों के 'विधिवत्' गुरुमुख से अध्ययन करने पर विशेषबल दिया है। उसके अभाव में वेदों के ज्ञान को प्राप्त करना असम्भव है, ऐसी व्यञ्जना से प्रतीति हो रही है। (3) प्रस्तुत अंश में ग्रन्थकार ने 'अस्मिन् जन्मनि जन्मान्तरे वा' कहकर पुनर्जन्म के सिद्धान्त को मान्यता प्रदान की है। इस सम्बन्ध में शूद्रादासी के गर्भ से उत्पन्न महात्मा विदुर को उदाहरणरूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, जिन्होंने पूर्वजन्म के सञ्चितकर्मों के फलस्वरूप तत्त्वदर्शी ज्ञानी के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त की। (4) निर्गतानि निखिलानि कल्मषाणि यस्य सः, निर्गतनिखिल कल्मषः तस्य भावः (भावे तल्) निर्गत निखिल कल्मषता तया। तृतीया विभक्ति, एकवचन, (5) तत्त्वज्ञान के लिए चित्त की निर्मलता की अनिवार्य आवश्यकता प्रतिपादित की गई है। रागद्वेष आदि वासनारूपी कल्मष के निकलने पर ही व्यक्ति का चित्त शुद्ध होता है।

१२६ वेदान्तसार (6) प्रस्तुत गद्यांश में ग्रन्थकार ने उनके समय में विद्यमान कर्मकाण्ड एवं भक्तिकाण्ड के अनुयायियों में समन्वय करने का श्लाघनीय प्रयास किया है। (7) साधनचतुष्टयसम्पन्नः- साधनानां चतुष्टयं इति साधनचतुष्टयं तेन सम्पन्नः। (8) साधन चतुष्टय से अभिप्राय- नित्यानित्यवस्तुविवेक, इहामुत्रार्थ- फलभोगविराग, शमादिषट्कसम्पत्ति तथा मुमुक्षुत्व इत्यादि चार साधनों से है, जिनकी ग्रन्थकार ने आगे विस्तृत व्याख्या की है। (9) वेदान्त के अधिकारी के लिए साधनचतुष्टयसम्पन्न होने की अनिवायर्ता प्रतिपादित की गई है। (10) यहाँ प्रयुक्त 'जन्मान्तरे' से पूर्वजन्म और आगे आने वाला जन्म दोनों अर्थों का ग्रहण किया जा सकता है। (11) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है- चित्र-२१ वेदान्त शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी अस्मिन् जन्मनि जन्मान्तरे वा निर्मल अन्तःकरण वाला साधन-चतुष्टय सम्पन्न विधिपूर्वक काम्य निषिद्ध वेदोक्त कर्मों नित्यानित्य मोक्षेच्छा वेद-वेदांगों का सम्पादन वस्तु विवेक का अध्ययन कर्मों का परित्याग नित्य अनित्य (ब्रह्म) (दृश्यमान जगत्) नित्य प्रायश्चित्त उपासना (सन्ध्या वन्दनादि) (चान्द्रायणादि) (सगुण ब्रह्म चिन्तन) इहलौकिक पारलौकिक नैमित्तिक फलों के प्रति (जातकर्मादि) विरक्ति (संहिता ग्रन्थ, वेद) (शिक्षा, कल्पादि शम दम उपरति तितिक्षा समाधि श्रद्धा छः वेदाङ्ग) षट्क सम्पत्ति

अनुबन्ध चतुष्टय १२७ अवतरणिका- तत्पश्चात् काम्य, निषिद्ध, नित्य-नैमित्तिक आदि कर्मों की सोदाहरण व्याख्या करते हुए ग्रन्थकार क्रमशः इन कर्मों के परित्याग एवं आचरण के मुख्य एवं गौण फलों का कथन करते हैं- काम्यानि स्वर्गादीष्टसाधनानि ज्योतिष्टोमादीनि। निषिद्धानि नरकाद्यनिष्टसाधनानि ब्राह्मणहननादीनि। नित्यान्यकरणे प्रत्यवायसाधनानि सन्ध्यावन्दनादीनि। नैमित्तिकानि पुत्रजन्माद्यनुबन्धीनि जातेष्ट्यादीनि। प्रायश्चित्तानि पापक्षयसाधनानि चान्द्रायणादीनि। उपासनानि सगुणब्रह्मविषयमानसव्यापाररूपाणि शाण्डिल्यविद्यादीनि। एतेषां नित्यादीनां बुद्धिशुद्धिः परं प्रयोजनमुपासनानां तु चित्तैकाग्र्यं "तमेतमात्मानं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन" इत्यादिश्रुतेः "तपसा कल्मषं हन्ति" इत्यादि स्मृतेश्च। नित्यनैमित्तिक- प्रायश्चित्तोपासनानां त्ववान्तरफलं पितृलोकसत्यलोकप्राप्तिः "कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोक" इत्यादि-श्रुतेः। पदच्छेद-काम्यानि-स्वर्गादि इष्टसाधनानि, ज्योतिष्टोम-आदीनि। निषिद्धा- नि नरकादि अनिष्टसाधनानि, ब्राह्मणहनन-आदीनि। नित्यानि-अकरणे प्रत्यवायसाधनानि, सन्ध्यावन्दन-आदीनि। नैमित्तिकानि पुत्र जन्मादि अनुबन्धीनि, जातेष्टि-आदीनि। प्रायश्चित्तानि-पाप-क्षय साधनानि चान्द्रायण-आदीनि। उपासनानि-सगुणब्रह्मविषय-मानस-व्यापाररूपाणि, शाण्डिल्यविद्या-आदीनि। एतेषां नित्यादीनाम्-बुद्धि-शुद्धिः परम् प्रयोजनम्। उपासनानाम्-तु चित्त-एकाग्र्यम्। "तम् एतम् आत्मानम् वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन" इत्यादि श्रुतेः।¹ "तपसा कल्मषम् हन्ति" इत्यादि स्मृतेः च।² नित्य-नैमित्तिक-प्रायश्चित्त उपासनानाम् तु अवान्तर-फलम् पितृलोक-सत्यलोक-प्राप्तिः "कर्मणा पितृलोकः विद्यया देवलोकः" इत्यादि-श्रुतेः।³ अनुवाद-स्वर्ग आदि कामनाओं के साधनस्वरूप ज्योतिष्टोमयाग आदि काम्यकर्म हैं। नरक आदि अनिष्ट के साधनरूप ब्राह्मणहनन आदि निषिद्धकर्म हैं। जिनके न करने पर भविष्य में दुःख की सम्भावना हो,

  1. बृहदारण्यकोपनिषद्- 4.4.22
  2. मनुस्मृति-12.104
  3. बृहदा. 1.5.16

१२८ वेदान्तसार सन्ध्यावन्दन आदि नित्यकर्म हैं। पुत्रजन्म के अवसर पर किए जाने वाले जातेष्टियज्ञ आदि नैमित्तिककर्म हैं। पाप के प्रक्षालन हेतु किए जाने वाले चान्द्रायणव्रत आदि प्रायश्चित्तकर्म हैं। (इसीप्रकार) मन की वृत्ति को स्थिर करने के लिए सगुण ब्रह्मविषयक मानसिकव्यापाररूप शाण्डिल्यविद्या आदि उपासनकर्म हैं। इन कर्मों में नित्य आदि कर्मों के अनुष्ठान का मुख्यप्रयोजन बुद्धि की शुद्धि करना है, जबकि उपासनकर्मों का (परम प्रयोजन) चित्त को एकाग्र करना है। 'उस इस आत्मा को ब्राह्मण लोग वेदों में प्रतिपादित वचनों एवं यज्ञ द्वारा जानने की इच्छा करते हैं', इत्यादि श्रुतिवचन तथा "तप द्वारा पाप को विनष्ट करता है" इत्यादि स्मृतिवचन (इस सम्बन्ध में) प्रमाण हैं। नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित्त एवं उपासनकर्मों का गौणफल तो (उनके द्वारा) पितृलोक एवं सत्यलोक की प्राप्ति ही है। 'कर्म द्वारा पितृलोक एवं विद्या (उपासन) द्वारा सत्यलोक की प्राप्ति होती है" इत्यादि श्रुतिवचन भी हैं। 'चन्द्रिका'- (१) काम्यकर्म-फलविशेष की प्राप्ति की कामना से किया गया कर्म 'काम्य' कहलाता है। यह कामना अथवा इच्छा दो प्रकार की होती है। इस पृथ्वीलोक पर प्राप्त होने वाली उपभोगसामग्री को प्राप्त करने की इच्छा तथा स्वर्ग आदि परलोकविषयक सुखों को प्राप्त करने की इच्छा अथवा कामना, किन्तु यहाँ ग्रन्थकार ने लौकिकसुख-सामग्री की प्राप्ति की बात न करके स्वर्गादि कामनाओं के साधनरूप ज्योतिष्टोमयाग आदि को काम्यकर्म के रूप में प्रतिपादित करके वेदान्त के अधिकारी के लिए उन्हें भी न करने का निषेध किया है, क्योंकि जहाँ एक ओर लौकिक सुख साधनों को प्राप्त करने के लिए किए गए काम्यकर्म मोक्षप्राप्ति में बाधक होने से त्याज्य हैं। वहीं दूसरी ओर स्वर्गादि प्रदान करने वाले ज्योतिष्टोम- यागादि काम्यकर्म भी मोक्षप्राप्ति के मार्ग में बाधक होने से हेय हैं। अतः त्याग करने योग्य हैं, क्योंकि ज्योतिष्टोमयागादि के फलस्वरूप प्राप्त होने वाला पुण्य समाप्त होने पर व्यक्ति को पुनः इसी मृत्युलोक में आना पड़ता है। अतः निषिद्धकर्मों के समान ही वे भी बन्धन का कारण होने से वेदान्त-विद्या के अधिकारी होने में वर्ज्य हैं। (२) निषिद्ध-कर्म-अनेकबार मनुष्य अपने जीवन में स्वार्थवश अथवा अज्ञानवश ऐसे कर्म करता है, जो उसे नरक जैसी अनष्टि स्थितियों में

अनुबन्ध चतुष्टय १२९ डालने वाले होते है। इसप्रकार के कर्मों को शास्त्रों में निषिद्धकर्म कहा गया है। जैसे-गोहत्या, ब्राह्मणहत्या आदि। धर्मशास्त्रों में सुरापान को भी महापातक होने से निषिद्धकर्मों में परिगणित किया गया है। ग्रन्थकार के अनुसार वेदान्त के अधिकारी को निषिद्धकर्मों से सदैव दूर रहना चाहिए। इसप्रकार काम्य एवं निषिद्धकर्मों को परिभाषित करने के पश्चात् आचार्य सदानन्द वेदान्त के अधिकारी द्वारा करने योग्य नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित्त एवं उपासनकर्मों की क्रमशः सोदाहरण व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। (क) नित्य-कर्म-ऐसे कार्य जिनके करने से विशेषपुण्य भले ही प्राप्त न हो, किन्तु न करने पर हानि अवश्य हो, नित्यकर्म कहलाते हैं। जैसे-संध्यावन्दन, दन्तधावन, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, नृयज्ञ एवं पितृयज्ञ पञ्चमहायज्ञ आदि, प्रतिदिन स्नान, शौच, दन्तधावन, घर साफ करना आदि भी नित्यकर्म की श्रेणी में माने गए हैं। वेदान्त के अधिकारी के लिए इन्हें प्रतिदिन करने की अनिवार्यता प्रतिपादित की गई है। (ख) नैमित्तिक-कर्म- विद्वन्मनोरञ्जिनीकार के अनुसार-“निमित्तमात्र- मासाद्यावश्यकर्त्तव्यतया विहितानि नैमित्तिकानि।” अर्थात् किसी कारणविशेष को प्राप्त कर 'इसे तो अवश्य ही करना होगा' इस भावना से शास्त्रों द्वारा अनुमोदितकर्म ही नैमित्तिककर्म कहलाते हैं। जिसप्रकार पुत्रादि की उत्पत्ति के अवसर पर शास्त्रों द्वारा निर्दिष्ट जातेष्टियज्ञ आदि। वेदान्त के अधिकारी के लिए नैमित्तिककर्मों का करना भी आवश्यक बताया गया है। (ग) प्रायश्चित्त-कर्म-व्यक्ति अनेकशः स्वार्थवश जानबूझकर अथवा अज्ञानवश परिस्थितिविशेष में शास्त्रों द्वारा बताए गए कार्यों को नहीं कर पाता है या शास्त्रों द्वारा निषिद्धकार्यों को कर बैठता है, जिससे उसे पाप का भागी होना पड़ता है। उस पाप से छुटकारा प्राप्त करने के लिए शास्त्रों ने चान्द्रायणव्रत आदि प्रायश्चित्तकर्मों का विधान किया है। जिनका उल्लेख ग्रन्थकार ने 'पाप-क्षय साधनानि 'कहकर किया है। विद्वन्मनोरञ्जिनीकार ने इन्हें इसप्रकार परिभाषित किया है- “विहिताकरणप्रतिषिद्धसेवारूपनिमित्तविशेषानुबन्धीनि प्रायश्चित्तानि" (घ) उपासन-कर्म-बार-बार सांसारिकविषयों में भटकने वाले मन को अपने आराध्यदेव सगुणब्रह्म में चिन्तनपूर्वक स्थिर करना ही उपासनकर्म कहलाता है। आचार्य शाण्डिल्य ने इस विधा पर विस्तारपूर्वक छान्दोग्योपनिषद् में विवेचन किया है। अतः इसे उन्हीं के नाम से जाना

१३० वेदान्तसार जाता है। इसीकारण आचार्य सदानन्द ने उपासनकर्म के उदाहरणरूप में 'शाण्डिल्यविद्या' का विशेषरूप से उल्लेख किया है। यहाँ तक अकरणीय-करणीय कर्मों का उल्लेख करने के पश्चात् श्रुति स्मृतिवचनों को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हुए ग्रन्थकार नित्य आदि कर्मों के अनुष्ठान के मुख्यप्रयोजन का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि- उपर्युक्त नित्य, नैमित्तिक एवं प्रायश्चित्तकर्मों के अनुष्ठान का मुख्य प्रयोजन बुद्धि की शुद्धि है, अर्थात् करणीय इन तीन प्रकार के कर्मों के करने से साधक की बुद्धि निर्मल होती है। इससे उसके मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। जबकि उपासनकर्म का मुख्यप्रयोजन ब्रह्म का सायुज्य प्राप्त करने के लिए चित्त को एकाग्र करना है। अपनी बात की पुष्टि के लिए ग्रन्थकार ने बृहदारण्यकोपनिषद् एवं मनुस्मृति के वचनों को प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया है। उपनिषद्कार का कथन है कि इस आत्मतत्त्व को ब्रह्मवेत्ता एवं जिज्ञासु वेदों में प्रतिपादित सिद्धान्तों का अध्ययन, मनन एवं चिन्तन करके तथा यज्ञ विषयक क्रियाओं को विधिवत् निष्पादित करके, जानने की इच्छा करते रहते हैं। इसीप्रकार प्रसिद्ध स्मृतिकार आचार्य मनु ने कहा कि- "तप का आचरण करने से व्यक्ति के कल्मष अर्थात् पाप विनष्ट हो जाते हैं। पापों से सर्वथा मुक्त होकर साधक आत्म-सायुज्य को प्राप्त करने का अधिकारी होता है। जो उसकी उत्कृष्टस्थिति का परिचायक है।" प्रस्तुत अंश के अन्तिम चरण में ग्रन्थकार ने नित्य-नैमित्तिक-प्रायश्चित्त कर्मों का गौणप्रयोजन, उनके द्वारा पितृलोक की प्राप्ति तथा उपासनकर्मों के गौणप्रयोजन के रूप में सत्यलोकों की प्राप्ति का कथन करते हुए उपनिषद्कार के वचनों को प्रमाणरूप में उद्धृत किया है-"कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोक" अर्थात् व्यक्ति कर्म द्वारा पितृलोक तथा विद्या द्वारा देवलोकों को प्राप्त करता है। यहाँ विद्या का अभिप्राय उपासनकर्म से ही ग्रहण करना चाहिए। इन लोकों की प्राप्ति से तात्पर्य साधक की आत्मिक उन्नति से ही लेना चाहिए। विशेष-(१) ज्योतिष्टोमयाग-'ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार यह याग स्वर्ग प्रदान करने वाला माना गया है। ज्योतिस्+स्तोम शब्द का अभिप्राय है-अग्नि की स्तुति। (२) वेदान्त साधक के लिए स्वर्ग को भी हेय मानता है, क्योंकि स्वर्गप्राप्ति जीव का मोक्ष नहीं है। स्वर्ग में व्यक्ति पुण्यों के विद्यमान रहने

अनुबन्ध चतुष्टय १३१ तक ही रह सकता है, उनके क्षीण होने पर उसे पुनः पृथ्वी पर ही जन्म लेना पड़ता है। (3) उत्तरवेदान्ती नित्यकर्मों द्वारा व्यक्ति के पूर्व पापों का क्षय स्वीकार करते हैं। (4) जातेष्टियज्ञ से अभिप्राय पुत्र जन्म के अवसर पर पिता द्वारा किए गए जातकर्म संस्कार से हैं। (5) चान्द्रायण-एक उपवास को कहा गया है, जिसमें चन्द्रमा की वृद्धि एवं क्षय के अनुसार भोजन की मात्रा (ग्रास) को बढ़ाया घटाया जाता है। (6) परमं प्रयोजनम् में 'परम' विशेषण का प्रयोग अन्य प्रयोजन की अपेक्षा इसकी महत्ता प्रदर्शित करने के लिए इसकी मुख्यता प्रतिपादित करने के लिए किया गया है। (7) विविदिषन्ति-वेत्तुं इच्छन्ति इति। √विद्+सन्+लट्, प्रथम पुरुष, बहुवचन। (8) सत्यलोक- भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः एवं सत्यम्। इन सात उर्ध्वलोकों में सर्वोपरि स्थित लोक, किन्तु इससे मोक्ष अभिप्राय ग्रहण नहीं करना चाहिए। (9) साधक नित्य, नैमित्तिक एवं प्रायश्चित्तकर्मों द्वारा पितृलोक तथा उपासनकर्म द्वारा सत्यलोक को प्राप्त करता है। (10) उपासनकर्म में साधक सगुणब्रह्म का चिन्तन करते हुए अपने चित्त को एकाग्र करता है। (11) शाण्डिल्यविद्या-छान्दोग्योपनिषद् 3.14 में आया हुआ प्रकरण विशेष, जिसमें सगुणोपासना का विस्तृत वर्णन हुआ है। (12) अपनी सम्पूर्ण कामनाओं को दबाकर परमब्रह्म परमात्मा की आकृति, विशेष की परिकल्पना करते हुए, उसका ध्यान करना ही उपासना है। (13) प्रधान और गौणभाव को उदाहरण द्वारा इसप्रकार समझ सकते हैं। एक वृक्ष को लगाने का प्रधान प्रयोजन फलप्राप्ति, किन्तु गौणप्रयोजन छाया एवं काष्ठ आदि भी प्राप्त करना होता है। (14) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है-

१३२ वेदान्तसार चित्र-२२ कार्य करणीय अकरणीय नित्य नैमित्तिक प्रायश्चित्त उपासन ← काम्य निषिद्ध (सन्ध्यावन्दनादि) (जातेष्टि आदि) (चान्द्रायण व्रतादि) (सगुणोपासना) ↓ ↓ (ज्योतिष्टोमादि) (गोहत्यादि) बुद्धि की निर्मलता मुख्य प्रयोजन → चित्त की एकाग्रता त्याज्य पितृलोक प्राप्ति गौण प्रयोजन → सत्यलोक प्राप्ति अवतरणिका- अधिकारी प्रमाता के लिए करणीय अकरणीय कार्यों का उल्लेख करने के बाद आचार्य सदानन्द उसके लिए साधन-चतुष्टय का नाम संकीर्तन करके प्रथम दो साधन-नित्य-अनित्यवस्तुविवेक' तथा इह 'अमुत्रार्थफलभोगविराग' की व्याख्या करते हुए कहते हैं- साधनानि नित्यानित्यवस्तुविवेकेहामुत्रार्थफलभोगविरागशमादिषट्क- सम्पत्तिमुमुक्षुत्वानि। नित्यानित्यवस्तुविवेकस्तावद्ब्रह्मैव नित्यं वस्तु ततोऽन्यद्- खिलमनित्यमिति विवेचनम्। ऐहिकानां स्रक्चन्दन- वनिातादिविषयभोगानां कर्मजन्यतयाऽनित्यत्ववदामुष्मिकाणामप्यमृतादि- विषयभोगानामनित्यतया तेभ्यो नितरां विरतिरिहामुत्रार्थफलभोगविरागः। पदच्छेद- साधनानि नित्य-अनित्यवस्तुविवेक-इह-अमुत्रार्थ-फलभोग- विराग-शमादि-षट्क-सम्पत्ति-मुमुक्षुत्वानि। नित्य-अनित्य-वस्तुविवेकः तावत्-ब्रह्म-एव नित्यम् वस्तु, ततः अन्यत् अखिलम् अनित्यम्, इति विवेचनम्। ऐहिकानाम् स्रक्-चन्दन-वनिाता-आदि-विषयभोगानाम् कर्मजन्यतया अनित्यवत्, आमुष्मिकाणाम् अपि अमृतादि विषय-भोगानाम् अनित्यतया, तेभ्यः नितराम् विरतिः, इह-अमुत्रार्थ-फलभोगविरागः। अनुवाद-नित्य एवं अनित्यवस्तु का विवेक, इहलौकिक एवं पारलौकिक फल को भोगने के प्रति वैराग्य, शम (दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान और श्रद्धा) आदि छः प्रकार की सम्पत्ति तथा मोक्षप्राप्ति के प्रति इच्छा ये (चार) साधन हैं। (इनमें एकमात्र)-'ब्रह्म ही नित्य वस्तु है, उसके

अतिरिक्त अन्य सभी कुछ अनित्य है; इसप्रकार समझना ही नित्य-अनित्य वस्तुविवेक है। इस लोक की माला, चन्दन, सुन्दरी आदि (सम्पूर्ण) भोगविलास- विषयक सामग्री कर्म द्वारा उत्पन्न होने के कारण अनित्य के समान हैं। इसीप्रकार पारलौकिक स्वर्ग आदि विषयभोगों के कर्मजन्य होने से अनित्य होने के कारण उनके प्रति भी नितान्त वैराग्यभाव ही 'इहामुत्रार्थफलभोग विराग' है। 'चन्द्रिका'-काम्य और निषिद्धकर्मों का परित्याग करके नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित्त और उपासनकर्मों के अनुष्ठानपूर्वक बुद्धि की शुद्धि तथा चित्त की एकाग्रता का अभ्यास करते हुए साधक निर्मल अन्तःकरण द्वारा चार साधनों के माध्यम से वेदान्त के अध्ययन का पूर्ण अधिकारी बन जाता है। सर्वप्रथम ग्रन्थकार उन चार साधनों का उल्लेख करते हैं- (1) नित्य-अनित्य वस्तु का विवेक. (2) इस लोक एवं परलोकविषयक भोगों के फल को भोगने के प्रति वैराग्यभाव। (3) शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान और श्रद्धा इन छः प्रकार की सम्पत्ति से सम्पन्न होना। (4) मोक्ष की प्रबल इच्छा का होना। इन्हीं चारों को वेदान्तदर्शन में साधन-चतुष्टय के नाम से भी जाना जाता है। तत्पश्चात् ग्रन्थकार इनमें से प्रथम दो की व्याख्या करते हैं- (१) नित्य-अनित्यवस्तुविवेक- निर्मलबुद्धि साधक अपने विवेक द्वारा इस निश्चयात्मकज्ञान को प्राप्त करता है कि स्थान एवं समय आदि की सीमाओं में आबद्ध होने वाला, प्रलयकाल में भी सदैव विद्यमान रहने वाला 'ब्रह्म' ही एकमात्र नित्यतत्त्व है। इस बात की पुष्टि में उसे अनेक श्रुतिवाक्य देखने को मिलते हैं। जैसे- मुण्डकोपनिषद् का यह कथन-'नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मम्।'¹ कठोपनिषद् में उद्धृत यह उक्ति-'अजो नित्यः शाश्वतः।² इसीप्रकार तैत्तिरीयोपनिषद् का यह वाक्य-'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म'।³


  1. मुण्डकोपनिषद्-1.1.6
  2. कठोपनिषद्-2.18
  3. तैत्तिरीयोपनिषद्-2.1

१३४ वेदान्तसार अतः इन सभी प्रमाणों के आधार पर प्रमाता यह निश्चय कर लेता है कि एकमात्र परमब्रह्म ही नित्य है। उस एकमात्र नित्यवस्तु के अतिरिक्त जो भी दिखायी देने वाले अथवा न दिखायी देने वाले जगत् के पदार्थ हैं, वे सभी काल एवं स्थान की सीमाओं में आबद्ध होने के कारण अर्थात् जन्म लेने एवं विनष्ट होने के कारण अनित्य हैं। अपने इस चिन्तन की पुष्टि में भी उसे अनेक श्रुतिप्रमाण उपलब्ध होते हैं। जैसे- ऐतरेयोपनिषद् का यह कथन- 'आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् नान्यत् किञ्चनमिषत्'¹ इसीप्रकार छान्दोग्योपनिषद् में यह उक्ति- 'यो वै भूमा तदमृतम्, यदल्पं तन्मर्त्यम्।² इसप्रकार नित्य-अनित्यवस्तुविषयक दृढ़निश्चयात्मक यह ज्ञान होना उस प्रमाता के लिए प्रथम साधन है, क्योंकि इस निश्चय के पश्चात् ही वह अग्रिम सीढ़ी, इसलोक एवं परलोकविषयक फल के भोगने के प्रति वैराग्य की भावना धारण करने में समर्थ हो पाता है। (२) इहामुत्रार्थफलभोग विराग- यहाँ प्रयुक्त 'इह' से अभिप्राय इस समस्त दृश्यमानजगत् अर्थात् पृथ्वीलोक से है। इस पृथ्वीलोक में कर्म करने के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले माला, चन्दन, स्त्री आदि सुन्दर एवं सुगन्धितपदार्थ, जिनमें सामान्यरूप से सांसारिकव्यक्ति आनन्द एवं गर्व का अनुभव करता है। सुन्दरभवन, मोटर-गाड़ी, नौकर-चाकर आदि में सुख की अनुभूति करता है। उन सब इहलौकिक पदार्थों के प्रति अनित्यता की भावना को धारण करके, प्रमाता द्वारा वैराग्य ग्रहण करना ही 'इहफलभोगविराग' कहलाता है। ठीक इसीप्रकार यहाँ प्रयुक्त 'अमुत्र' से अभिप्राय 'स्वर्गादि परलोक' से ग्रहण करना चाहिए। व्यक्ति सोमयाग आदि उत्कृष्टकर्मों को करके, स्वर्गादि श्रेष्ठलोकों को प्राप्त कर लेता है। पौराणिकमान्यता के अनुसार स्वर्ग में दुःख का पूर्णतया अभाव है तथा वहाँ जाकर व्यक्ति अप्सराओं के नृत्य, गीत, संगीत में ही चरम आनन्द का अनुभव करता है, किन्तु इस सुख की प्राप्ति उसे पुण्य रहने तक ही होती है। पुण्य के क्षीण होने पर उसे पुनः पृथ्वीलोक पर जन्म ग्रहण करना पड़ता है। वेदान्त के अधिकारी के लिए जहाँ इस लोक में उपलब्ध अनित्य भोगसामग्री के प्रति वैराग्यभावना

  1. तैत्तिरीयोपनिषद्-1/1/11
  2. वही, 7.24.1

अनुबन्ध चतुष्टय १३५ आवश्यक है, वहीं उसके लिए परलोक स्वर्गादि में विद्यमान सामग्री के प्रति भी अनित्यता की भावना धारण करते हुए वैराग्य अनिवार्य है। इसलोक एवं परलोकविषयक भोगसामग्री के प्रति वैराग्य, साधक को केवल उसी स्थिति में सम्भव है, जब वह यह विचार करता है कि इस दृश्यमानजगत् की समस्त भोगविलासविषयक सामग्री, क्योंकि कर्म द्वारा प्राप्त होती है, अतः अनित्य है, क्योंकि 'यत् यत् कर्मजन्यं तत्तत् अनित्यं' यह सिद्धान्त सर्वमान्य है। इसी सिद्धान्त के कारण कर्मजन्ययज्ञ आदि से प्राप्त होने वाले स्वर्ग आदि भी अनित्य हैं। यह निश्चय करके उस समस्त भोग- सामग्री के प्रति घृणा का भाव रखना, उनमें लेशमात्र भी रुचि न लेना ही विराग अर्थात् वैराग्य है। यही वेदान्तदर्शन में अधिकारी के लिए द्वितीय साधन 'इहामुत्रार्थफलभोग विराग' है। विशेष-(१) साधनानि-यहाँ बताए गए साधनों में पूर्व-पूर्व साधन को क्रमशः उत्तरोत्तरसाधन की प्राप्ति का हेतु मानना चाहिए, क्योंकि अनित्य नित्यवस्तु के विवेक के उपरान्त ही उसे इसलोक एवं परलोकविषयक भोगसामग्री के प्रति वैराग्यभाव उत्पन्न हो सकेगा। इसीप्रकार आगे भी समझना चाहिए। (२) 'विराग' से अभिप्राय अरुचि, उदासीनता, घृणा, उपेक्षा आदि वैराग्यभाव से ग्रहण करना चाहिए। (३) छान्दोग्योपनिषद् (8.1.6) में कर्मजन्य होने के कारण इसलोक एवं परलोक की समस्त भोगसामग्री को स्पष्टरूप से अनित्य प्रतिपादित किया गया है-'तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयत"। (४) प्रस्तुत गद्यखण्ड में प्रयुक्त 'अमृतादि' से अभिप्राय स्वर्ग में विद्यमान सुख प्रदान करने वाले अप्सराओं के नृत्य, गीत, संगीत एवं अन्य भोगपदार्थों से ग्रहण करना चाहिए। (५) इहलोक एवं परलोकविषयक भोगसामग्री की अनित्यता में उनका 'कर्मजन्य' होना मुख्यहेतु बताया गया है। जिसे इसप्रकार भी समझा जा सकता है- 'यत्-यत् कर्मजन्यं तत् तत् कार्यम्। यत्यत् कार्यं तत्तत् अनित्यम्'। अर्थात् जो-जो कर्म से उत्पन्न होता है, वह-वह कार्य है तथा जो- जो कार्य है वह सब अनित्य है। (६) प्रस्तुत खण्ड के अभिप्राय को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-