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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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१२६ वेदान्तसार (6) प्रस्तुत गद्यांश में ग्रन्थकार ने उनके समय में विद्यमान कर्मकाण्ड एवं भक्तिकाण्ड के अनुयायियों में समन्वय करने का श्लाघनीय प्रयास किया है। (7) साधनचतुष्टयसम्पन्नः- साधनानां चतुष्टयं इति साधनचतुष्टयं तेन सम्पन्नः। (8) साधन चतुष्टय से अभिप्राय- नित्यानित्यवस्तुविवेक, इहामुत्रार्थ- फलभोगविराग, शमादिषट्कसम्पत्ति तथा मुमुक्षुत्व इत्यादि चार साधनों से है, जिनकी ग्रन्थकार ने आगे विस्तृत व्याख्या की है। (9) वेदान्त के अधिकारी के लिए साधनचतुष्टयसम्पन्न होने की अनिवायर्ता प्रतिपादित की गई है। (10) यहाँ प्रयुक्त 'जन्मान्तरे' से पूर्वजन्म और आगे आने वाला जन्म दोनों अर्थों का ग्रहण किया जा सकता है। (11) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है- चित्र-२१ वेदान्त शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी अस्मिन् जन्मनि जन्मान्तरे वा निर्मल अन्तःकरण वाला साधन-चतुष्टय सम्पन्न विधिपूर्वक काम्य निषिद्ध वेदोक्त कर्मों नित्यानित्य मोक्षेच्छा वेद-वेदांगों का सम्पादन वस्तु विवेक का अध्ययन कर्मों का परित्याग नित्य अनित्य (ब्रह्म) (दृश्यमान जगत्) नित्य प्रायश्चित्त उपासना (सन्ध्या वन्दनादि) (चान्द्रायणादि) (सगुण ब्रह्म चिन्तन) इहलौकिक पारलौकिक नैमित्तिक फलों के प्रति (जातकर्मादि) विरक्ति (संहिता ग्रन्थ, वेद) (शिक्षा, कल्पादि शम दम उपरति तितिक्षा समाधि श्रद्धा छः वेदाङ्ग) षट्क सम्पत्ति