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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 314 में से

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अनुबन्ध चतुष्टय १२५ को सहन कर लेना तितिक्षा कहलाता है। वश में किए हुए मन को ब्रह्म साक्षात्कार के साधनस्वरूप श्रवण, मनन आदि को उसके अनुरूप विषयों में लगाना ही समाधि है। साथ ही गुरु द्वारा उपदिष्टवाक्यों में अगाध विश्वास रखना ही श्रद्धा माना गया है। इसके बिना ब्रह्मप्राप्ति लगभग असम्भव ही है। इस छः प्रकार की सम्पत्ति से सम्पन्न प्रमाता ही इस शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी हो सकता है। उपर्युक्त साधनत्रय के अतिरिक्त एक अन्य साधन मोक्ष की प्राप्ति के प्रति प्रबल इच्छा होना, भी ग्रन्थकार ने अधिकारी के लिए आवश्यक माना है, क्योंकि मोक्षेच्छा के अभाव में व्यक्ति की इस शास्त्र में प्रवृत्ति ही नहीं होगी। ब्रह्मज्ञान उसके लिए व्यर्थ होगा। इसप्रकार वेदवेदाङ्गों का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने वाला प्रमाता, काम्य एवं निषिद्धकर्मों का परित्याग करके नित्य, नैमित्तिक आदि कर्मों के अनुष्ठान द्वारा, पूर्णतया पवित्र, निर्मलचित्त सम्पन्न होकर नित्य-अनित्य वस्तुविवेक आदि साधन-चतुष्टय से समृद्ध होकर ही इस शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी हो सकता है। विशेष-(1) प्रस्तुत खण्ड में ग्रन्थकार ने अनुबन्धचतुष्टय के प्रथम अनुबन्ध 'अधिकारी' होने के लिए अनिवार्य योग्यताओं का उल्लेख अत्यन्त संक्षेप में किया है। (2) ग्रन्थकार ने यहाँ वेदवेदाङ्गों के 'विधिवत्' गुरुमुख से अध्ययन करने पर विशेषबल दिया है। उसके अभाव में वेदों के ज्ञान को प्राप्त करना असम्भव है, ऐसी व्यञ्जना से प्रतीति हो रही है। (3) प्रस्तुत अंश में ग्रन्थकार ने 'अस्मिन् जन्मनि जन्मान्तरे वा' कहकर पुनर्जन्म के सिद्धान्त को मान्यता प्रदान की है। इस सम्बन्ध में शूद्रादासी के गर्भ से उत्पन्न महात्मा विदुर को उदाहरणरूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, जिन्होंने पूर्वजन्म के सञ्चितकर्मों के फलस्वरूप तत्त्वदर्शी ज्ञानी के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त की। (4) निर्गतानि निखिलानि कल्मषाणि यस्य सः, निर्गतनिखिल कल्मषः तस्य भावः (भावे तल्) निर्गत निखिल कल्मषता तया। तृतीया विभक्ति, एकवचन, (5) तत्त्वज्ञान के लिए चित्त की निर्मलता की अनिवार्य आवश्यकता प्रतिपादित की गई है। रागद्वेष आदि वासनारूपी कल्मष के निकलने पर ही व्यक्ति का चित्त शुद्ध होता है।