वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंअतिरिक्त अन्य सभी कुछ अनित्य है; इसप्रकार समझना ही नित्य-अनित्य वस्तुविवेक है। इस लोक की माला, चन्दन, सुन्दरी आदि (सम्पूर्ण) भोगविलास- विषयक सामग्री कर्म द्वारा उत्पन्न होने के कारण अनित्य के समान हैं। इसीप्रकार पारलौकिक स्वर्ग आदि विषयभोगों के कर्मजन्य होने से अनित्य होने के कारण उनके प्रति भी नितान्त वैराग्यभाव ही 'इहामुत्रार्थफलभोग विराग' है। 'चन्द्रिका'-काम्य और निषिद्धकर्मों का परित्याग करके नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित्त और उपासनकर्मों के अनुष्ठानपूर्वक बुद्धि की शुद्धि तथा चित्त की एकाग्रता का अभ्यास करते हुए साधक निर्मल अन्तःकरण द्वारा चार साधनों के माध्यम से वेदान्त के अध्ययन का पूर्ण अधिकारी बन जाता है। सर्वप्रथम ग्रन्थकार उन चार साधनों का उल्लेख करते हैं- (1) नित्य-अनित्य वस्तु का विवेक. (2) इस लोक एवं परलोकविषयक भोगों के फल को भोगने के प्रति वैराग्यभाव। (3) शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान और श्रद्धा इन छः प्रकार की सम्पत्ति से सम्पन्न होना। (4) मोक्ष की प्रबल इच्छा का होना। इन्हीं चारों को वेदान्तदर्शन में साधन-चतुष्टय के नाम से भी जाना जाता है। तत्पश्चात् ग्रन्थकार इनमें से प्रथम दो की व्याख्या करते हैं- (१) नित्य-अनित्यवस्तुविवेक- निर्मलबुद्धि साधक अपने विवेक द्वारा इस निश्चयात्मकज्ञान को प्राप्त करता है कि स्थान एवं समय आदि की सीमाओं में आबद्ध होने वाला, प्रलयकाल में भी सदैव विद्यमान रहने वाला 'ब्रह्म' ही एकमात्र नित्यतत्त्व है। इस बात की पुष्टि में उसे अनेक श्रुतिवाक्य देखने को मिलते हैं। जैसे- मुण्डकोपनिषद् का यह कथन-'नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मम्।'¹ कठोपनिषद् में उद्धृत यह उक्ति-'अजो नित्यः शाश्वतः।² इसीप्रकार तैत्तिरीयोपनिषद् का यह वाक्य-'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म'।³
- मुण्डकोपनिषद्-1.1.6
- कठोपनिषद्-2.18
- तैत्तिरीयोपनिषद्-2.1