वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 148, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ें१३४ वेदान्तसार अतः इन सभी प्रमाणों के आधार पर प्रमाता यह निश्चय कर लेता है कि एकमात्र परमब्रह्म ही नित्य है। उस एकमात्र नित्यवस्तु के अतिरिक्त जो भी दिखायी देने वाले अथवा न दिखायी देने वाले जगत् के पदार्थ हैं, वे सभी काल एवं स्थान की सीमाओं में आबद्ध होने के कारण अर्थात् जन्म लेने एवं विनष्ट होने के कारण अनित्य हैं। अपने इस चिन्तन की पुष्टि में भी उसे अनेक श्रुतिप्रमाण उपलब्ध होते हैं। जैसे- ऐतरेयोपनिषद् का यह कथन- 'आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् नान्यत् किञ्चनमिषत्'¹ इसीप्रकार छान्दोग्योपनिषद् में यह उक्ति- 'यो वै भूमा तदमृतम्, यदल्पं तन्मर्त्यम्।² इसप्रकार नित्य-अनित्यवस्तुविषयक दृढ़निश्चयात्मक यह ज्ञान होना उस प्रमाता के लिए प्रथम साधन है, क्योंकि इस निश्चय के पश्चात् ही वह अग्रिम सीढ़ी, इसलोक एवं परलोकविषयक फल के भोगने के प्रति वैराग्य की भावना धारण करने में समर्थ हो पाता है। (२) इहामुत्रार्थफलभोग विराग- यहाँ प्रयुक्त 'इह' से अभिप्राय इस समस्त दृश्यमानजगत् अर्थात् पृथ्वीलोक से है। इस पृथ्वीलोक में कर्म करने के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले माला, चन्दन, स्त्री आदि सुन्दर एवं सुगन्धितपदार्थ, जिनमें सामान्यरूप से सांसारिकव्यक्ति आनन्द एवं गर्व का अनुभव करता है। सुन्दरभवन, मोटर-गाड़ी, नौकर-चाकर आदि में सुख की अनुभूति करता है। उन सब इहलौकिक पदार्थों के प्रति अनित्यता की भावना को धारण करके, प्रमाता द्वारा वैराग्य ग्रहण करना ही 'इहफलभोगविराग' कहलाता है। ठीक इसीप्रकार यहाँ प्रयुक्त 'अमुत्र' से अभिप्राय 'स्वर्गादि परलोक' से ग्रहण करना चाहिए। व्यक्ति सोमयाग आदि उत्कृष्टकर्मों को करके, स्वर्गादि श्रेष्ठलोकों को प्राप्त कर लेता है। पौराणिकमान्यता के अनुसार स्वर्ग में दुःख का पूर्णतया अभाव है तथा वहाँ जाकर व्यक्ति अप्सराओं के नृत्य, गीत, संगीत में ही चरम आनन्द का अनुभव करता है, किन्तु इस सुख की प्राप्ति उसे पुण्य रहने तक ही होती है। पुण्य के क्षीण होने पर उसे पुनः पृथ्वीलोक पर जन्म ग्रहण करना पड़ता है। वेदान्त के अधिकारी के लिए जहाँ इस लोक में उपलब्ध अनित्य भोगसामग्री के प्रति वैराग्यभावना
- तैत्तिरीयोपनिषद्-1/1/11
- वही, 7.24.1