वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३२ वेदान्तसार चित्र-२२ कार्य करणीय अकरणीय नित्य नैमित्तिक प्रायश्चित्त उपासन ← काम्य निषिद्ध (सन्ध्यावन्दनादि) (जातेष्टि आदि) (चान्द्रायण व्रतादि) (सगुणोपासना) ↓ ↓ (ज्योतिष्टोमादि) (गोहत्यादि) बुद्धि की निर्मलता मुख्य प्रयोजन → चित्त की एकाग्रता त्याज्य पितृलोक प्राप्ति गौण प्रयोजन → सत्यलोक प्राप्ति अवतरणिका- अधिकारी प्रमाता के लिए करणीय अकरणीय कार्यों का उल्लेख करने के बाद आचार्य सदानन्द उसके लिए साधन-चतुष्टय का नाम संकीर्तन करके प्रथम दो साधन-नित्य-अनित्यवस्तुविवेक' तथा इह 'अमुत्रार्थफलभोगविराग' की व्याख्या करते हुए कहते हैं- साधनानि नित्यानित्यवस्तुविवेकेहामुत्रार्थफलभोगविरागशमादिषट्क- सम्पत्तिमुमुक्षुत्वानि। नित्यानित्यवस्तुविवेकस्तावद्ब्रह्मैव नित्यं वस्तु ततोऽन्यद्- खिलमनित्यमिति विवेचनम्। ऐहिकानां स्रक्चन्दन- वनिातादिविषयभोगानां कर्मजन्यतयाऽनित्यत्ववदामुष्मिकाणामप्यमृतादि- विषयभोगानामनित्यतया तेभ्यो नितरां विरतिरिहामुत्रार्थफलभोगविरागः। पदच्छेद- साधनानि नित्य-अनित्यवस्तुविवेक-इह-अमुत्रार्थ-फलभोग- विराग-शमादि-षट्क-सम्पत्ति-मुमुक्षुत्वानि। नित्य-अनित्य-वस्तुविवेकः तावत्-ब्रह्म-एव नित्यम् वस्तु, ततः अन्यत् अखिलम् अनित्यम्, इति विवेचनम्। ऐहिकानाम् स्रक्-चन्दन-वनिाता-आदि-विषयभोगानाम् कर्मजन्यतया अनित्यवत्, आमुष्मिकाणाम् अपि अमृतादि विषय-भोगानाम् अनित्यतया, तेभ्यः नितराम् विरतिः, इह-अमुत्रार्थ-फलभोगविरागः। अनुवाद-नित्य एवं अनित्यवस्तु का विवेक, इहलौकिक एवं पारलौकिक फल को भोगने के प्रति वैराग्य, शम (दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान और श्रद्धा) आदि छः प्रकार की सम्पत्ति तथा मोक्षप्राप्ति के प्रति इच्छा ये (चार) साधन हैं। (इनमें एकमात्र)-'ब्रह्म ही नित्य वस्तु है, उसके