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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 314 में से

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१३० वेदान्तसार जाता है। इसीकारण आचार्य सदानन्द ने उपासनकर्म के उदाहरणरूप में 'शाण्डिल्यविद्या' का विशेषरूप से उल्लेख किया है। यहाँ तक अकरणीय-करणीय कर्मों का उल्लेख करने के पश्चात् श्रुति स्मृतिवचनों को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हुए ग्रन्थकार नित्य आदि कर्मों के अनुष्ठान के मुख्यप्रयोजन का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि- उपर्युक्त नित्य, नैमित्तिक एवं प्रायश्चित्तकर्मों के अनुष्ठान का मुख्य प्रयोजन बुद्धि की शुद्धि है, अर्थात् करणीय इन तीन प्रकार के कर्मों के करने से साधक की बुद्धि निर्मल होती है। इससे उसके मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। जबकि उपासनकर्म का मुख्यप्रयोजन ब्रह्म का सायुज्य प्राप्त करने के लिए चित्त को एकाग्र करना है। अपनी बात की पुष्टि के लिए ग्रन्थकार ने बृहदारण्यकोपनिषद् एवं मनुस्मृति के वचनों को प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया है। उपनिषद्कार का कथन है कि इस आत्मतत्त्व को ब्रह्मवेत्ता एवं जिज्ञासु वेदों में प्रतिपादित सिद्धान्तों का अध्ययन, मनन एवं चिन्तन करके तथा यज्ञ विषयक क्रियाओं को विधिवत् निष्पादित करके, जानने की इच्छा करते रहते हैं। इसीप्रकार प्रसिद्ध स्मृतिकार आचार्य मनु ने कहा कि- "तप का आचरण करने से व्यक्ति के कल्मष अर्थात् पाप विनष्ट हो जाते हैं। पापों से सर्वथा मुक्त होकर साधक आत्म-सायुज्य को प्राप्त करने का अधिकारी होता है। जो उसकी उत्कृष्टस्थिति का परिचायक है।" प्रस्तुत अंश के अन्तिम चरण में ग्रन्थकार ने नित्य-नैमित्तिक-प्रायश्चित्त कर्मों का गौणप्रयोजन, उनके द्वारा पितृलोक की प्राप्ति तथा उपासनकर्मों के गौणप्रयोजन के रूप में सत्यलोकों की प्राप्ति का कथन करते हुए उपनिषद्कार के वचनों को प्रमाणरूप में उद्धृत किया है-"कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोक" अर्थात् व्यक्ति कर्म द्वारा पितृलोक तथा विद्या द्वारा देवलोकों को प्राप्त करता है। यहाँ विद्या का अभिप्राय उपासनकर्म से ही ग्रहण करना चाहिए। इन लोकों की प्राप्ति से तात्पर्य साधक की आत्मिक उन्नति से ही लेना चाहिए। विशेष-(१) ज्योतिष्टोमयाग-'ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार यह याग स्वर्ग प्रदान करने वाला माना गया है। ज्योतिस्+स्तोम शब्द का अभिप्राय है-अग्नि की स्तुति। (२) वेदान्त साधक के लिए स्वर्ग को भी हेय मानता है, क्योंकि स्वर्गप्राप्ति जीव का मोक्ष नहीं है। स्वर्ग में व्यक्ति पुण्यों के विद्यमान रहने