वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 143, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनुबन्ध चतुष्टय १२९ डालने वाले होते है। इसप्रकार के कर्मों को शास्त्रों में निषिद्धकर्म कहा गया है। जैसे-गोहत्या, ब्राह्मणहत्या आदि। धर्मशास्त्रों में सुरापान को भी महापातक होने से निषिद्धकर्मों में परिगणित किया गया है। ग्रन्थकार के अनुसार वेदान्त के अधिकारी को निषिद्धकर्मों से सदैव दूर रहना चाहिए। इसप्रकार काम्य एवं निषिद्धकर्मों को परिभाषित करने के पश्चात् आचार्य सदानन्द वेदान्त के अधिकारी द्वारा करने योग्य नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित्त एवं उपासनकर्मों की क्रमशः सोदाहरण व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। (क) नित्य-कर्म-ऐसे कार्य जिनके करने से विशेषपुण्य भले ही प्राप्त न हो, किन्तु न करने पर हानि अवश्य हो, नित्यकर्म कहलाते हैं। जैसे-संध्यावन्दन, दन्तधावन, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, नृयज्ञ एवं पितृयज्ञ पञ्चमहायज्ञ आदि, प्रतिदिन स्नान, शौच, दन्तधावन, घर साफ करना आदि भी नित्यकर्म की श्रेणी में माने गए हैं। वेदान्त के अधिकारी के लिए इन्हें प्रतिदिन करने की अनिवार्यता प्रतिपादित की गई है। (ख) नैमित्तिक-कर्म- विद्वन्मनोरञ्जिनीकार के अनुसार-“निमित्तमात्र- मासाद्यावश्यकर्त्तव्यतया विहितानि नैमित्तिकानि।” अर्थात् किसी कारणविशेष को प्राप्त कर 'इसे तो अवश्य ही करना होगा' इस भावना से शास्त्रों द्वारा अनुमोदितकर्म ही नैमित्तिककर्म कहलाते हैं। जिसप्रकार पुत्रादि की उत्पत्ति के अवसर पर शास्त्रों द्वारा निर्दिष्ट जातेष्टियज्ञ आदि। वेदान्त के अधिकारी के लिए नैमित्तिककर्मों का करना भी आवश्यक बताया गया है। (ग) प्रायश्चित्त-कर्म-व्यक्ति अनेकशः स्वार्थवश जानबूझकर अथवा अज्ञानवश परिस्थितिविशेष में शास्त्रों द्वारा बताए गए कार्यों को नहीं कर पाता है या शास्त्रों द्वारा निषिद्धकार्यों को कर बैठता है, जिससे उसे पाप का भागी होना पड़ता है। उस पाप से छुटकारा प्राप्त करने के लिए शास्त्रों ने चान्द्रायणव्रत आदि प्रायश्चित्तकर्मों का विधान किया है। जिनका उल्लेख ग्रन्थकार ने 'पाप-क्षय साधनानि 'कहकर किया है। विद्वन्मनोरञ्जिनीकार ने इन्हें इसप्रकार परिभाषित किया है- “विहिताकरणप्रतिषिद्धसेवारूपनिमित्तविशेषानुबन्धीनि प्रायश्चित्तानि" (घ) उपासन-कर्म-बार-बार सांसारिकविषयों में भटकने वाले मन को अपने आराध्यदेव सगुणब्रह्म में चिन्तनपूर्वक स्थिर करना ही उपासनकर्म कहलाता है। आचार्य शाण्डिल्य ने इस विधा पर विस्तारपूर्वक छान्दोग्योपनिषद् में विवेचन किया है। अतः इसे उन्हीं के नाम से जाना