वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
अनुबन्ध चतुष्टय १२९ डालने वाले होते है। इसप्रकार के कर्मों को शास्त्रों में निषिद्धकर्म कहा गया है। जैसे-गोहत्या, ब्राह्मणहत्या आदि। धर्मशास्त्रों में सुरापान को भी महापातक होने से निषिद्धकर्मों में परिगणित किया गया है। ग्रन्थकार के अनुसार वेदान्त के अधिकारी को निषिद्धकर्मों से सदैव दूर रहना चाहिए। इसप्रकार काम्य एवं निषिद्धकर्मों को परिभाषित करने के पश्चात् आचार्य सदानन्द वेदान्त के अधिकारी द्वारा करने योग्य नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित्त एवं उपासनकर्मों की क्रमशः सोदाहरण व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। (क) नित्य-कर्म-ऐसे कार्य जिनके करने से विशेषपुण्य भले ही प्राप्त न हो, किन्तु न करने पर हानि अवश्य हो, नित्यकर्म कहलाते हैं। जैसे-संध्यावन्दन, दन्तधावन, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, नृयज्ञ एवं पितृयज्ञ पञ्चमहायज्ञ आदि, प्रतिदिन स्नान, शौच, दन्तधावन, घर साफ करना आदि भी नित्यकर्म की श्रेणी में माने गए हैं। वेदान्त के अधिकारी के लिए इन्हें प्रतिदिन करने की अनिवार्यता प्रतिपादित की गई है। (ख) नैमित्तिक-कर्म- विद्वन्मनोरञ्जिनीकार के अनुसार-“निमित्तमात्र- मासाद्यावश्यकर्त्तव्यतया विहितानि नैमित्तिकानि।” अर्थात् किसी कारणविशेष को प्राप्त कर 'इसे तो अवश्य ही करना होगा' इस भावना से शास्त्रों द्वारा अनुमोदितकर्म ही नैमित्तिककर्म कहलाते हैं। जिसप्रकार पुत्रादि की उत्पत्ति के अवसर पर शास्त्रों द्वारा निर्दिष्ट जातेष्टियज्ञ आदि। वेदान्त के अधिकारी के लिए नैमित्तिककर्मों का करना भी आवश्यक बताया गया है। (ग) प्रायश्चित्त-कर्म-व्यक्ति अनेकशः स्वार्थवश जानबूझकर अथवा अज्ञानवश परिस्थितिविशेष में शास्त्रों द्वारा बताए गए कार्यों को नहीं कर पाता है या शास्त्रों द्वारा निषिद्धकार्यों को कर बैठता है, जिससे उसे पाप का भागी होना पड़ता है। उस पाप से छुटकारा प्राप्त करने के लिए शास्त्रों ने चान्द्रायणव्रत आदि प्रायश्चित्तकर्मों का विधान किया है। जिनका उल्लेख ग्रन्थकार ने 'पाप-क्षय साधनानि 'कहकर किया है। विद्वन्मनोरञ्जिनीकार ने इन्हें इसप्रकार परिभाषित किया है- “विहिताकरणप्रतिषिद्धसेवारूपनिमित्तविशेषानुबन्धीनि प्रायश्चित्तानि" (घ) उपासन-कर्म-बार-बार सांसारिकविषयों में भटकने वाले मन को अपने आराध्यदेव सगुणब्रह्म में चिन्तनपूर्वक स्थिर करना ही उपासनकर्म कहलाता है। आचार्य शाण्डिल्य ने इस विधा पर विस्तारपूर्वक छान्दोग्योपनिषद् में विवेचन किया है। अतः इसे उन्हीं के नाम से जाना
१३० वेदान्तसार जाता है। इसीकारण आचार्य सदानन्द ने उपासनकर्म के उदाहरणरूप में 'शाण्डिल्यविद्या' का विशेषरूप से उल्लेख किया है। यहाँ तक अकरणीय-करणीय कर्मों का उल्लेख करने के पश्चात् श्रुति स्मृतिवचनों को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हुए ग्रन्थकार नित्य आदि कर्मों के अनुष्ठान के मुख्यप्रयोजन का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि- उपर्युक्त नित्य, नैमित्तिक एवं प्रायश्चित्तकर्मों के अनुष्ठान का मुख्य प्रयोजन बुद्धि की शुद्धि है, अर्थात् करणीय इन तीन प्रकार के कर्मों के करने से साधक की बुद्धि निर्मल होती है। इससे उसके मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। जबकि उपासनकर्म का मुख्यप्रयोजन ब्रह्म का सायुज्य प्राप्त करने के लिए चित्त को एकाग्र करना है। अपनी बात की पुष्टि के लिए ग्रन्थकार ने बृहदारण्यकोपनिषद् एवं मनुस्मृति के वचनों को प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया है। उपनिषद्कार का कथन है कि इस आत्मतत्त्व को ब्रह्मवेत्ता एवं जिज्ञासु वेदों में प्रतिपादित सिद्धान्तों का अध्ययन, मनन एवं चिन्तन करके तथा यज्ञ विषयक क्रियाओं को विधिवत् निष्पादित करके, जानने की इच्छा करते रहते हैं। इसीप्रकार प्रसिद्ध स्मृतिकार आचार्य मनु ने कहा कि- "तप का आचरण करने से व्यक्ति के कल्मष अर्थात् पाप विनष्ट हो जाते हैं। पापों से सर्वथा मुक्त होकर साधक आत्म-सायुज्य को प्राप्त करने का अधिकारी होता है। जो उसकी उत्कृष्टस्थिति का परिचायक है।" प्रस्तुत अंश के अन्तिम चरण में ग्रन्थकार ने नित्य-नैमित्तिक-प्रायश्चित्त कर्मों का गौणप्रयोजन, उनके द्वारा पितृलोक की प्राप्ति तथा उपासनकर्मों के गौणप्रयोजन के रूप में सत्यलोकों की प्राप्ति का कथन करते हुए उपनिषद्कार के वचनों को प्रमाणरूप में उद्धृत किया है-"कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोक" अर्थात् व्यक्ति कर्म द्वारा पितृलोक तथा विद्या द्वारा देवलोकों को प्राप्त करता है। यहाँ विद्या का अभिप्राय उपासनकर्म से ही ग्रहण करना चाहिए। इन लोकों की प्राप्ति से तात्पर्य साधक की आत्मिक उन्नति से ही लेना चाहिए। विशेष-(१) ज्योतिष्टोमयाग-'ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार यह याग स्वर्ग प्रदान करने वाला माना गया है। ज्योतिस्+स्तोम शब्द का अभिप्राय है-अग्नि की स्तुति। (२) वेदान्त साधक के लिए स्वर्ग को भी हेय मानता है, क्योंकि स्वर्गप्राप्ति जीव का मोक्ष नहीं है। स्वर्ग में व्यक्ति पुण्यों के विद्यमान रहने
अनुबन्ध चतुष्टय १३१ तक ही रह सकता है, उनके क्षीण होने पर उसे पुनः पृथ्वी पर ही जन्म लेना पड़ता है। (3) उत्तरवेदान्ती नित्यकर्मों द्वारा व्यक्ति के पूर्व पापों का क्षय स्वीकार करते हैं। (4) जातेष्टियज्ञ से अभिप्राय पुत्र जन्म के अवसर पर पिता द्वारा किए गए जातकर्म संस्कार से हैं। (5) चान्द्रायण-एक उपवास को कहा गया है, जिसमें चन्द्रमा की वृद्धि एवं क्षय के अनुसार भोजन की मात्रा (ग्रास) को बढ़ाया घटाया जाता है। (6) परमं प्रयोजनम् में 'परम' विशेषण का प्रयोग अन्य प्रयोजन की अपेक्षा इसकी महत्ता प्रदर्शित करने के लिए इसकी मुख्यता प्रतिपादित करने के लिए किया गया है। (7) विविदिषन्ति-वेत्तुं इच्छन्ति इति। √विद्+सन्+लट्, प्रथम पुरुष, बहुवचन। (8) सत्यलोक- भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः एवं सत्यम्। इन सात उर्ध्वलोकों में सर्वोपरि स्थित लोक, किन्तु इससे मोक्ष अभिप्राय ग्रहण नहीं करना चाहिए। (9) साधक नित्य, नैमित्तिक एवं प्रायश्चित्तकर्मों द्वारा पितृलोक तथा उपासनकर्म द्वारा सत्यलोक को प्राप्त करता है। (10) उपासनकर्म में साधक सगुणब्रह्म का चिन्तन करते हुए अपने चित्त को एकाग्र करता है। (11) शाण्डिल्यविद्या-छान्दोग्योपनिषद् 3.14 में आया हुआ प्रकरण विशेष, जिसमें सगुणोपासना का विस्तृत वर्णन हुआ है। (12) अपनी सम्पूर्ण कामनाओं को दबाकर परमब्रह्म परमात्मा की आकृति, विशेष की परिकल्पना करते हुए, उसका ध्यान करना ही उपासना है। (13) प्रधान और गौणभाव को उदाहरण द्वारा इसप्रकार समझ सकते हैं। एक वृक्ष को लगाने का प्रधान प्रयोजन फलप्राप्ति, किन्तु गौणप्रयोजन छाया एवं काष्ठ आदि भी प्राप्त करना होता है। (14) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है-
१३२ वेदान्तसार चित्र-२२ कार्य करणीय अकरणीय नित्य नैमित्तिक प्रायश्चित्त उपासन ← काम्य निषिद्ध (सन्ध्यावन्दनादि) (जातेष्टि आदि) (चान्द्रायण व्रतादि) (सगुणोपासना) ↓ ↓ (ज्योतिष्टोमादि) (गोहत्यादि) बुद्धि की निर्मलता मुख्य प्रयोजन → चित्त की एकाग्रता त्याज्य पितृलोक प्राप्ति गौण प्रयोजन → सत्यलोक प्राप्ति अवतरणिका- अधिकारी प्रमाता के लिए करणीय अकरणीय कार्यों का उल्लेख करने के बाद आचार्य सदानन्द उसके लिए साधन-चतुष्टय का नाम संकीर्तन करके प्रथम दो साधन-नित्य-अनित्यवस्तुविवेक' तथा इह 'अमुत्रार्थफलभोगविराग' की व्याख्या करते हुए कहते हैं- साधनानि नित्यानित्यवस्तुविवेकेहामुत्रार्थफलभोगविरागशमादिषट्क- सम्पत्तिमुमुक्षुत्वानि। नित्यानित्यवस्तुविवेकस्तावद्ब्रह्मैव नित्यं वस्तु ततोऽन्यद्- खिलमनित्यमिति विवेचनम्। ऐहिकानां स्रक्चन्दन- वनिातादिविषयभोगानां कर्मजन्यतयाऽनित्यत्ववदामुष्मिकाणामप्यमृतादि- विषयभोगानामनित्यतया तेभ्यो नितरां विरतिरिहामुत्रार्थफलभोगविरागः। पदच्छेद- साधनानि नित्य-अनित्यवस्तुविवेक-इह-अमुत्रार्थ-फलभोग- विराग-शमादि-षट्क-सम्पत्ति-मुमुक्षुत्वानि। नित्य-अनित्य-वस्तुविवेकः तावत्-ब्रह्म-एव नित्यम् वस्तु, ततः अन्यत् अखिलम् अनित्यम्, इति विवेचनम्। ऐहिकानाम् स्रक्-चन्दन-वनिाता-आदि-विषयभोगानाम् कर्मजन्यतया अनित्यवत्, आमुष्मिकाणाम् अपि अमृतादि विषय-भोगानाम् अनित्यतया, तेभ्यः नितराम् विरतिः, इह-अमुत्रार्थ-फलभोगविरागः। अनुवाद-नित्य एवं अनित्यवस्तु का विवेक, इहलौकिक एवं पारलौकिक फल को भोगने के प्रति वैराग्य, शम (दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान और श्रद्धा) आदि छः प्रकार की सम्पत्ति तथा मोक्षप्राप्ति के प्रति इच्छा ये (चार) साधन हैं। (इनमें एकमात्र)-'ब्रह्म ही नित्य वस्तु है, उसके
अतिरिक्त अन्य सभी कुछ अनित्य है; इसप्रकार समझना ही नित्य-अनित्य वस्तुविवेक है। इस लोक की माला, चन्दन, सुन्दरी आदि (सम्पूर्ण) भोगविलास- विषयक सामग्री कर्म द्वारा उत्पन्न होने के कारण अनित्य के समान हैं। इसीप्रकार पारलौकिक स्वर्ग आदि विषयभोगों के कर्मजन्य होने से अनित्य होने के कारण उनके प्रति भी नितान्त वैराग्यभाव ही 'इहामुत्रार्थफलभोग विराग' है। 'चन्द्रिका'-काम्य और निषिद्धकर्मों का परित्याग करके नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित्त और उपासनकर्मों के अनुष्ठानपूर्वक बुद्धि की शुद्धि तथा चित्त की एकाग्रता का अभ्यास करते हुए साधक निर्मल अन्तःकरण द्वारा चार साधनों के माध्यम से वेदान्त के अध्ययन का पूर्ण अधिकारी बन जाता है। सर्वप्रथम ग्रन्थकार उन चार साधनों का उल्लेख करते हैं- (1) नित्य-अनित्य वस्तु का विवेक. (2) इस लोक एवं परलोकविषयक भोगों के फल को भोगने के प्रति वैराग्यभाव। (3) शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान और श्रद्धा इन छः प्रकार की सम्पत्ति से सम्पन्न होना। (4) मोक्ष की प्रबल इच्छा का होना। इन्हीं चारों को वेदान्तदर्शन में साधन-चतुष्टय के नाम से भी जाना जाता है। तत्पश्चात् ग्रन्थकार इनमें से प्रथम दो की व्याख्या करते हैं- (१) नित्य-अनित्यवस्तुविवेक- निर्मलबुद्धि साधक अपने विवेक द्वारा इस निश्चयात्मकज्ञान को प्राप्त करता है कि स्थान एवं समय आदि की सीमाओं में आबद्ध होने वाला, प्रलयकाल में भी सदैव विद्यमान रहने वाला 'ब्रह्म' ही एकमात्र नित्यतत्त्व है। इस बात की पुष्टि में उसे अनेक श्रुतिवाक्य देखने को मिलते हैं। जैसे- मुण्डकोपनिषद् का यह कथन-'नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मम्।'¹ कठोपनिषद् में उद्धृत यह उक्ति-'अजो नित्यः शाश्वतः।² इसीप्रकार तैत्तिरीयोपनिषद् का यह वाक्य-'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म'।³
- मुण्डकोपनिषद्-1.1.6
- कठोपनिषद्-2.18
- तैत्तिरीयोपनिषद्-2.1
१३४ वेदान्तसार अतः इन सभी प्रमाणों के आधार पर प्रमाता यह निश्चय कर लेता है कि एकमात्र परमब्रह्म ही नित्य है। उस एकमात्र नित्यवस्तु के अतिरिक्त जो भी दिखायी देने वाले अथवा न दिखायी देने वाले जगत् के पदार्थ हैं, वे सभी काल एवं स्थान की सीमाओं में आबद्ध होने के कारण अर्थात् जन्म लेने एवं विनष्ट होने के कारण अनित्य हैं। अपने इस चिन्तन की पुष्टि में भी उसे अनेक श्रुतिप्रमाण उपलब्ध होते हैं। जैसे- ऐतरेयोपनिषद् का यह कथन- 'आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् नान्यत् किञ्चनमिषत्'¹ इसीप्रकार छान्दोग्योपनिषद् में यह उक्ति- 'यो वै भूमा तदमृतम्, यदल्पं तन्मर्त्यम्।² इसप्रकार नित्य-अनित्यवस्तुविषयक दृढ़निश्चयात्मक यह ज्ञान होना उस प्रमाता के लिए प्रथम साधन है, क्योंकि इस निश्चय के पश्चात् ही वह अग्रिम सीढ़ी, इसलोक एवं परलोकविषयक फल के भोगने के प्रति वैराग्य की भावना धारण करने में समर्थ हो पाता है। (२) इहामुत्रार्थफलभोग विराग- यहाँ प्रयुक्त 'इह' से अभिप्राय इस समस्त दृश्यमानजगत् अर्थात् पृथ्वीलोक से है। इस पृथ्वीलोक में कर्म करने के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले माला, चन्दन, स्त्री आदि सुन्दर एवं सुगन्धितपदार्थ, जिनमें सामान्यरूप से सांसारिकव्यक्ति आनन्द एवं गर्व का अनुभव करता है। सुन्दरभवन, मोटर-गाड़ी, नौकर-चाकर आदि में सुख की अनुभूति करता है। उन सब इहलौकिक पदार्थों के प्रति अनित्यता की भावना को धारण करके, प्रमाता द्वारा वैराग्य ग्रहण करना ही 'इहफलभोगविराग' कहलाता है। ठीक इसीप्रकार यहाँ प्रयुक्त 'अमुत्र' से अभिप्राय 'स्वर्गादि परलोक' से ग्रहण करना चाहिए। व्यक्ति सोमयाग आदि उत्कृष्टकर्मों को करके, स्वर्गादि श्रेष्ठलोकों को प्राप्त कर लेता है। पौराणिकमान्यता के अनुसार स्वर्ग में दुःख का पूर्णतया अभाव है तथा वहाँ जाकर व्यक्ति अप्सराओं के नृत्य, गीत, संगीत में ही चरम आनन्द का अनुभव करता है, किन्तु इस सुख की प्राप्ति उसे पुण्य रहने तक ही होती है। पुण्य के क्षीण होने पर उसे पुनः पृथ्वीलोक पर जन्म ग्रहण करना पड़ता है। वेदान्त के अधिकारी के लिए जहाँ इस लोक में उपलब्ध अनित्य भोगसामग्री के प्रति वैराग्यभावना
- तैत्तिरीयोपनिषद्-1/1/11
- वही, 7.24.1
अनुबन्ध चतुष्टय १३५ आवश्यक है, वहीं उसके लिए परलोक स्वर्गादि में विद्यमान सामग्री के प्रति भी अनित्यता की भावना धारण करते हुए वैराग्य अनिवार्य है। इसलोक एवं परलोकविषयक भोगसामग्री के प्रति वैराग्य, साधक को केवल उसी स्थिति में सम्भव है, जब वह यह विचार करता है कि इस दृश्यमानजगत् की समस्त भोगविलासविषयक सामग्री, क्योंकि कर्म द्वारा प्राप्त होती है, अतः अनित्य है, क्योंकि 'यत् यत् कर्मजन्यं तत्तत् अनित्यं' यह सिद्धान्त सर्वमान्य है। इसी सिद्धान्त के कारण कर्मजन्ययज्ञ आदि से प्राप्त होने वाले स्वर्ग आदि भी अनित्य हैं। यह निश्चय करके उस समस्त भोग- सामग्री के प्रति घृणा का भाव रखना, उनमें लेशमात्र भी रुचि न लेना ही विराग अर्थात् वैराग्य है। यही वेदान्तदर्शन में अधिकारी के लिए द्वितीय साधन 'इहामुत्रार्थफलभोग विराग' है। विशेष-(१) साधनानि-यहाँ बताए गए साधनों में पूर्व-पूर्व साधन को क्रमशः उत्तरोत्तरसाधन की प्राप्ति का हेतु मानना चाहिए, क्योंकि अनित्य नित्यवस्तु के विवेक के उपरान्त ही उसे इसलोक एवं परलोकविषयक भोगसामग्री के प्रति वैराग्यभाव उत्पन्न हो सकेगा। इसीप्रकार आगे भी समझना चाहिए। (२) 'विराग' से अभिप्राय अरुचि, उदासीनता, घृणा, उपेक्षा आदि वैराग्यभाव से ग्रहण करना चाहिए। (३) छान्दोग्योपनिषद् (8.1.6) में कर्मजन्य होने के कारण इसलोक एवं परलोक की समस्त भोगसामग्री को स्पष्टरूप से अनित्य प्रतिपादित किया गया है-'तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयत"। (४) प्रस्तुत गद्यखण्ड में प्रयुक्त 'अमृतादि' से अभिप्राय स्वर्ग में विद्यमान सुख प्रदान करने वाले अप्सराओं के नृत्य, गीत, संगीत एवं अन्य भोगपदार्थों से ग्रहण करना चाहिए। (५) इहलोक एवं परलोकविषयक भोगसामग्री की अनित्यता में उनका 'कर्मजन्य' होना मुख्यहेतु बताया गया है। जिसे इसप्रकार भी समझा जा सकता है- 'यत्-यत् कर्मजन्यं तत् तत् कार्यम्। यत्यत् कार्यं तत्तत् अनित्यम्'। अर्थात् जो-जो कर्म से उत्पन्न होता है, वह-वह कार्य है तथा जो- जो कार्य है वह सब अनित्य है। (६) प्रस्तुत खण्ड के अभिप्राय को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-
१३६ वेदान्तसार चित्र-२३ साधनानि नित्य-अनित्य वस्तुविवेकः इहामुत्रार्थफलभोगविरागः शमादिषट्क मुमुक्षुत्व सम्पत्तिः नित्य अनित्य (ब्रह्म) (दृश्यमान जगतादि) (काल एवं स्थान की (कालस्थान की सीमाओं में अनाबद्ध) सीमाओं में आबद्ध) इह अमुत्र (दृश्यमान जगत् पृथ्वीलोकादि) (स्वर्गादि परलोकादि) विषयक फलभोगों के प्रति वैराग्य अवतरणिका-पूर्वोक्त साधनचतुष्टय में से शेष दो साधन शमादि षट्क सम्पत्ति एवं मुमुक्षुत्व की व्याख्या करते हुए आचार्य सदानन्द कहते हैं कि- शमादयस्तु शमदमोपरतितितिक्षासमाधानश्रद्धाख्याः। शमस्तावच्छ्रवणादिव्यतिरिक्तविषयेभ्यो मनसो निग्रहः। दमो बाह्येन्द्रियाणां तद्व्यतिरिक्तविषयेभ्यो निवर्तनम्। निवर्तितानामेतेषां तद्व्यतिरिक्तविषयेभ्य उपरमणमुपरतिरथवा विहितानां कर्मणां विधिना परित्यागः। तितिक्षा शीतोष्णादिद्वन्द्वसहिष्णुता। निगृहीतस्य मनसः श्रवणादौ तदनुगुणविषये च समाधिः समाधानम्गुरूपदिष्टवेदान्तवाक्येषु विश्वासः श्रद्धा। मुमुक्षुत्वं मोक्षेच्छा। एवम्भूतः प्रमाताधिकारी “शान्तो दान्त” इत्यादिश्रुतेः। पदच्छेद-शम-आदयः तु, शम-दम-उपरति-तितिक्षा-समाधान- श्रद्धा-आख्याः। शमः-तावत् श्रवण-आदिव्यतिरिक्तविषयेभ्यः मनसः निग्रहः। दमः-बाह्य-इन्द्रियाणाम् तद् व्यतिरिक्तविषयेभ्यः निवर्तनम्। निवर्तितानाम् एतेषाम् तद् व्यतिरिक्तविषयेभ्यः उपरमणम्-उपरतिः, अथवा विहितानाम् कर्मणाम् विधिना परित्यागः। तितिक्षा-शीतोष्ण-आदि द्वन्द्व-सहिष्णुता। निगृहीतस्य मनसः श्रवणादौ तद् अनुगुणविषये च-समाधि-समाधानम्। गुरु-उपदिष्ट-वेदान्तवाक्येषु विश्वासः श्रद्धा। मुमुक्षुत्वम्-मोक्षेच्छा। एवंभूतः प्रमाता-अधिकारी “शान्तो दान्तः” इत्यादि श्रुतेः॥
अनुबन्ध चतुष्टय १३७ अनुवाद-शम आदि तो (वस्तुतः) शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान, श्रद्धा नाम वाले हैं। शम-श्रवण आदि से अतिरिक्त (सांसारिक) विषयों से मन को रोकना ही शम है। बाह्य इन्द्रियों का उन (श्रवणादि) से अतिरिक्त विषयों से रोकना दम है। (बाह्यविषयों से) रोकी गयी इन (इन्द्रियों) को उस (ब्रह्मादि) से अतिरिक्त विषयों से पूर्णतया अवरुद्ध करना ही उपरति है अथवा शास्त्रोक्त (नित्यादि) कर्मों का (सन्यासाश्रम में) विधिपूर्वक परित्याग (ही उपरति है)। सर्दी-गर्मी (सुख-दुःख) आदि द्वन्द्वों को सहन करना ही तितिक्षा है। पूर्णतया नियन्त्रितमन को श्रवण आदि तथा उनके अनुकूल विषयों में भलीप्रकार लगाना ही समाधि है। गुरु द्वारा उपदिष्ट वेदान्त के वाक्यों में विश्वास श्रद्धा है। मोक्ष की इच्छा ही मुमुक्षुत्व है। इसप्रकार की विशेषताओं से युक्त हुआ प्रमाता अधिकारी है। 'जितेन्द्रिय ही शान्तचित्त रहता है' इत्यादि श्रुतिवचन भी है। 'चन्द्रिका' - ग्रन्थकार ने साधनचतुष्टय का उल्लेख करते समय शमादि षट्सम्पत्ति कहकर तृतीय साधन का संकेतमात्र किया था। प्रस्तुत अंश में उन सभी का नामोल्लेख करते हुए उन्हें परिभाषित करते हैं। शमादि से यहाँ क्रमशः शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान, श्रद्धा इन छः से अभिप्राय ग्रहण करना चाहिए। इन छः को ग्रन्थकार ने सम्पत्ति इसलिए कहा क्योंकि ये ब्रह्मज्ञान के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। अतः तत्त्वज्ञान अथवा मोक्षप्राप्तिरूप कार्य में ये छहों सम्पत्तिस्वरूप हैं। तत्पश्चात् क्रमशः इनकी व्याख्या करते हैं- (१) शम-जिसप्रकार भूखा व्यक्ति अपनी भूख शान्त करने हेतु उसके साधनस्वरूप अन्न को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहता है। उसीप्रकार तत्त्वज्ञान के साधन जो श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि हैं, उन्हें छोड़कर दूसरे सांसारिकविषयों में बार-बार दौड़कर जाते हुए मन को एक विशेष प्रकार की अन्तःकरण की वृत्ति नियन्त्रित करती है। इसी रोकने वाली वृत्ति को दर्शन की भाषा में शम कहते हैं। संक्षेप में-अन्तरिन्द्रिय मन को बाह्य सांसारिकविषयों से हटाकर तत्त्वज्ञान के साधनस्वरूप वेदों के श्रवण, मनन आदि में लगाना ही शम है। इसप्रकार शम हमारे अन्दर स्थित मन नामक इन्द्रिय का वह व्यापार है जो उसे सांसारिक भौतिकसुखों की ओर जाने से रोकता है।
१३८ वेदान्तसार (२) दम-चक्षुः, श्रोत्र, रसना, घ्राण एवं त्वक् नामक पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण करने के लिए लालायित रहती हैं। जैसे-नेत्रेन्द्रिय सुन्दरवस्तु को देखने के लिए व्याकुल रहती है तो श्रोत्रेन्द्रिय मधुरध्वनि सुनने के लिए; इसीप्रकार रसनेन्द्रिय स्वादिष्ट व्यञ्जन खाने के लिए बेचैन रहती है। इन सभी को इन सांसारिक भोगसामग्रियों से बलपूर्वक रोककर ब्रह्मसाक्षात्कार के साधनभूत 'श्रवण-मनन' आदि में लगाना 'दम' कहलाता है। इसप्रकार 'शम' और 'दम' में केवल इतना ही अन्तर है कि वहाँ अन्तरिन्द्रिय मन को बाह्य सांसारिकविषयों से हटाकर श्रवण, मनन आदि ब्रह्मज्ञान के साधन में लगाया जाता है, जबकि 'दम' में पञ्चज्ञानेन्द्रियों को उन-उनके विषयों से रोकते हुए ब्रह्मसाक्षात्कार के साधन श्रवण-मननादि में लगाया जाता है। यद्यपि ज्ञानेन्द्रियों पर भी 'मन' का नियन्त्रण होने के कारण प्रबलता 'शम' की ही माननी होगी। (३) उपरति-ब्रह्मसाक्षात्कार के साधनस्वरूप श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि के अतिरिक्त सांसारिकविषयों से हटायी हुई इन्द्रियाँ पुनः उन विषयों में न जा सकें, यह जिस वृत्ति द्वारा किया जाता है, उसे 'उपरति' कहते हैं। इसप्रकार 'उपरति' मन का वह कार्यव्यापार है, जो नियन्त्रित की गयी इन्द्रियों को उनके विषयों की ओर पुनः जाने से रोकता है। इसप्रकार उपरति, शम एवं दम में अत्यन्तसूक्ष्म अन्तर रहता है। इसी प्रसङ्ग में ग्रन्थकार 'उपरति' की दूसरी परिभाषा भी प्रस्तुत करते हैं-संध्यावन्दन, अग्निहोत्र आदि जो नित्यनैमित्तिककार्य शास्त्रों में गृहस्थादिकों के करने के लिए बताए गए हैं, संन्यास आश्रम को स्वीकार करके शास्त्रोक्तरीति से उनका परित्याग करना भी 'उपरति' कहलाता है। दर्शनशास्त्र, शमादि के समान ही संन्यास को भी आत्मज्ञान का महत्त्वपूर्ण साधन स्वीकार करता है, क्योंकि यज्ञादिकार्यों में लगे रहने के कारण तथा ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्व विषयक विरोधी भावनाओं के बने रहने से साधक वेदान्त के तत्त्वों पर भलीभाँति विचार करने में समर्थ ही नहीं हो पाता है। इसलिए मुमुक्षु के लिए 'संन्यास' की अनिवार्यता प्रतिपादित की गयी है तथा विधिपूर्वक त्याग से अभिप्राय है-सर्ववेदस् यज्ञादि करने के बाद साधक संन्यास की दीक्षा ग्रहण करता है तथा इसीसमय शास्त्रोक्त रीति से वह नित्यनैमित्तिककर्मों के परित्याग का भी संकल्प लेता है, नित्यादि
अनुबन्ध चतुष्टय १३१ कर्मों का यह परित्याग वह आलस्य, अविश्वास अथवा प्रमाद के कारण नहीं करता, अपितु इसके परित्याग में शास्त्रोक्तर्रीति का अनुकरण करता है। आचार्य मनु का भी इस विषय में कथन है- प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदस दक्षिणाम्। आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात्।। (मनु. 6.38) (४) तितिक्षा-सर्दी-गर्मी, मान-अपमान तथा इनसे अनुभव किए जाने वाले सुख-दुःख आदि को प्रायः सभी प्राणी अनुभव करते हैं, किन्तु जो व्यक्ति यह मानते हुए कि सर्दी-गर्मी, सुखःदुःख आदि तो केवल शरीर के धर्म हैं। आत्मा के ऊपर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसप्रकार से विवेकपूर्वक इन्हें सहन करना ही 'तितिक्षा' माना गया है। महाभारत में गीताकार ने भी इसी अभिप्राय को व्यक्त किया है- “मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदा। आगमापायिनोऽनित्यास्तान् तितिक्षस्व भारत।। (गीता 2/14) (५) समाधान-वश में किए हुए मन को श्रवण-मनन-निदिध्यासन आदि द्वारा एकाग्र करना, निरन्तर इन्हीं का चिन्तन करना ही समाधि है तथा इसीको 'समाधान' भी कहा गया है। इसी प्रसङ्ग में ग्रन्थकार ने 'तदनुगुणविषय' शब्द का प्रयोग किया है, जिसका अभिप्राय है, मन को बाह्यविषयों से रोककर गुरु के प्रति भक्ति, सेवा-शुश्रूषा तथा उसके प्रति विनयपूर्वक आचरण करते हुए वेदान्तग्रन्थों का अध्ययन एवं चिन्तन करे। ऐसी स्थिति में जहाँ एक ओर साधक का मन इधर-उधर भटकना बन्द कर देता है, वहीं दूसरी ओर वह विनम्रता की मानो साक्षात्मूर्ति ही बन जाता है। अभिमान उसको स्पर्श तक नहीं कर पाता है। कुछ विद्वानों ने समाधान का अभिप्राय अपरिग्रह किया है-'दण्डं आच्छादनं कौपीनं परिगृहेत् शेषं विसृजेत्।" (६) श्रद्धा-गुरु को न केवल भारतीयसंस्कृति अपितु सम्पूर्णदर्शन साहित्य में अत्युच्च स्थान प्राप्त हुआ है। इसीकारण 'गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुःदेवो महेश्वरः गुरुः साक्षात्, परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः' कहकर उसे परमब्रह्म की कोटि में रखा गया है। इसी गुरु द्वारा कहे गए वेदान्त-वचनों 'तत्त्वमसि', 'ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या' 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि के प्रति आस्था, अगाधविश्वास धारण करना ही 'श्रद्धा' कहा गया है। गीताकार ने भी तत्त्वज्ञान के लिए श्रद्धा की अनिवार्यता प्रतिपादित की है-
१४० वेदान्तसार “श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः” यहाँ तक षट्सम्पत्तिरूप तृतीय साधन की व्याख्या करने के बाद ग्रन्थकार ने मुमुक्षुत्व नाम चतुर्थ एवं अन्तिम साधन का उल्लेख किया है। ‘मुमुक्षु’ का अभिप्राय है-‘मोक्ष की इच्छा वाला’। इसलिए मुमुक्षुत्व का अर्थ होगा ‘मोक्ष की इच्छा का भाव’। पूर्व में बताए गए तीन साधनों से सम्पन्न साधक जब मोक्ष की प्रबल इच्छा वाला होता है, तभी वह अपने गुरु से आध्यात्मिकज्ञान को प्राप्त करने का अधिकारी बन पाता है। इस प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि दर्शनशास्त्र इच्छा अथवा कामना को बन्धन का कारण मानते आये हैं, फिर यह मोक्षेच्छा प्रशस्य क्यों? वस्तुतः यह प्रशंसनीय इसलिए है, क्योंकि आत्मा से भिन्न वस्तु की कामना करना ही ‘काम’ है। आत्मा के सम्बन्ध में होने के कारण मोक्ष के प्रति इच्छा तो ‘अकाम’ ही माना जाएगा, अर्थात् उसकी गणना काम की श्रेणी में नहीं होगी। वस्तुतः आत्मा की कामना करने वाले को पूर्णकाम होने पर भी सभीप्रकार की कामनाओं से मुक्त ही मानना होगा। ऊपर बताए गए शमदमादि गुणों से सम्पन्न, नित्यानित्यवस्तुविवेक आदि साधनचतुष्टय से समृद्ध व्यक्ति ही वस्तुतः प्रस्तुत प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार के अध्ययन करने का अधिकारी है। अपनी बात की पुष्टि के लिए ग्रन्थकार ‘शान्तो दान्तः’ इत्यादि श्रुति को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं। यह श्रुतिवचन काण्वशाखा की बृहदारण्यकोपनिषद् में इसप्रकार उद्धृत किया गया है। यहाँ भी प्रायः उपर्युक्त षट्सम्पत्ति की ओर ही संकेत किया गया है— “शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति” विशेष— (1) प्रस्तुत श्रुति ग्रन्थकार द्वारा पूर्व प्रतिपादित षट्सम्पत्ति को शास्त्रसम्मत प्रतिपादित करने के लिए ही उद्धृत की गयी है। (2) उपर्युक्त अंश में ग्रन्थकार ने उपरति को दो प्रकार से परिभाषित किया है। द्वितीय परिभाषा संन्यास अथवा कर्मसंन्यास को प्रमुखता प्रदान करने के लिए की गयी है। (3) इस दृष्टि से संन्यासी ही मोक्ष का, वेदान्त का अधिकारी हो सकता है, यह अभिप्राय भी ग्रहण किया जा सकता है। (4) आत्मा को देखने की इच्छा अथवा आत्मज्ञान को वेदान्ती ‘काम’ की श्रेणी में नहीं मानते हैं।
अनुबंध चतुष्टय १४१ (5) गीताकार ने भी ब्रह्मज्ञान के लिए ‘शम’ की आवश्यकता प्रतिपादित की है– ‘योगारूढस्य शमः कारणमुच्यते’ (6/3) (6) यहाँ प्रयुक्त श्रवणादि से अभिप्राय वेदशास्त्रों के अध्ययन, मनन, चिन्तन, श्रवण तथा आचरण से ग्रहण करना चाहिए। (7) ‘दम’ को भगवान् श्रीकृष्ण ने कछुए के उदाहरण द्वारा अत्यन्त सुन्दर ढंग से इसप्रकार समझाया है– यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।। (गीता-2/58) (8) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है–
चित्र-२४ 3 साधन 4 ┌──────────────────────────┴──────────────────────────┐ शमादि षट्क सम्पत्ति मोक्षेच्छा ┌──────┬───────┬───────┬───────┬───────┐ │ शम दम उपरति तितिक्षा समाधान श्रद्धा मोक्ष प्राप्ति │ │ │ │ │ │ के प्रति अन्तरिन्द्रिय श्रोत्रत्वगादि नित्य नैमित्तिक │ सर्वथा नियन्त्रित │ │ मन बाह्येन्द्रिय को कर्मों का │ मन को श्रवणादि │ प्रबल इच्छा │ शास्त्रोक्त रीति │ विषयों में लगाना │ │ से परित्याग │ │ ┌──────────┴──────────┐ │ ┌──────────┴──────────┐ बाह्य विषयों से निरोध │ │ गुरुवचनों पर आस्था │ │ │ │ एवं दृढ़ विश्वास │ श्रवणादि में नियोजन ┌──────────┴──────────┐ └──────────────────────┘ │ सुखदुःखादि द्वन्द्व को शरीर │ │ धर्म मानकर सहन करना │ └──────────────────────┘
अवतरणिका–‘अनुबन्धचतुष्टय’ में से इसप्रकार प्रथम अनुबन्ध ‘अधिकारी’ की व्याख्या करने के पश्चात् ग्रन्थकार अपनी बात की पुष्टि में आचार्य शङ्कर द्वारा विरचित ‘उपदेशसाहस्री’ में प्रयुक्त कारिका को उद्धृत करते हैं– उक्तं च– “प्रशान्तचित्ताय जितेन्द्रियाय च प्रहीणदोषाय यथोक्तकारिणे। गुणान्वितायानुगताय सर्वदा प्रदेयमेतत्सततं मुमुक्षवे” इति॥
१४२ वेदान्तसार अन्वय-प्रशान्तचित्ताय, जितेन्द्रियाय, प्रहीणदोषाय, यथोक्त-कारिणे, गुणान्विताय, च अनुगताय मुमुक्षवे सर्वदा एतत् सकलम् (ज्ञानम्) प्रदेयम्।। इति।। अनुवाद- अत्यन्त शान्तचित्त, इन्द्रियों को वश में करने वाले, निर्मल अन्तःकरण वाले, पूर्वोक्त बातों का पालन करने वाले, (विवेकादि) गुणों से सम्पन्न, गुरु की आज्ञा का पालन करने वाले (उसके वाक्यों में श्रद्धा रखने वाले) मोक्ष के इच्छुक व्यक्ति को ही हमेशा यह सम्पूर्ण वेदान्त का ज्ञान प्रदान करना चाहिए। 'चन्द्रिका'- जिस व्यक्ति का मन सांसारिक भोगविलासविषयक सामग्री की ओर से विरक्त होकर एकमात्र आत्मतत्त्व के चिन्तन अथवा ब्रह्मज्ञान के साधनभूतश्रवण मननादि में स्थिर होकर शान्तभाव को प्राप्त हो गया हो। जिसने अपनी बाह्य इन्द्रियों श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण आदि को पूर्णतया अपने वश में कर लिया हो तथा जिसकी ये सभी इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों की ओर न जाकर श्रवणमननादि ब्रह्मसाक्षात्कार के साधनों के प्रति ही आकृष्ट होती हों। जिसने काम्य एवं निषिद्धकर्मों का पूर्णतया परित्याग करके नित्य-नैमित्तिक-प्रायश्चित्त एवं उपासन आदि कर्मों द्वारा अपने अन्तःकरण को पूर्णतया निर्मल बना लिया हो। साथ ही जिसमें नित्य-अनित्यवस्तुओं के सम्बन्ध में विवेक ने स्थान बना लिया हो तथा जिसे इस लोक एवं परलोकविषयक फलभोगसामग्री के प्रति वैराग्य हो गया हो। इसके अतिरिक्त जो अभिमानरहित अत्यन्त विनम्र- भाव से गुरु की सेवा एवं उनकी आज्ञापालन में आनन्द का अनुभव करता हो। जो गुरु की प्रत्येक आज्ञा को माला के समान अपने मस्तक पर धारण करते हुए, उनके प्रत्येक वचन के प्रति अगाधश्रद्धा एवं आस्था धारण करे। मोक्ष के प्रति प्रबल इच्छा रखने वाले इसप्रकार के अधिकारी व्यक्ति को ही आत्मविषयक ज्ञान प्रदान करना चाहिए। विशेष-(1) प्रस्तुत कारिका वस्तुतः यहाँ तक विवेचन किए गए अधिकारी के गुणों का अत्यन्त संक्षिप्तरूप कहा जा सकता है। (2) ग्रन्थकार ने इसे अपनी बात की पुष्टि में प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया है। (3) कारिका में प्रयुक्त 'गुणान्विताय' को विद्वानों ने सद्-असद् विवेक, त्याग तथा क्षमारूप गुणों से युक्त अर्थ में भी प्रयुक्त माना है।
अनुबन्ध चतुष्टय १४३ अवतरणिका-अनुबन्धचतुष्टय के प्रथम अनुबन्ध अधिकारी की विस्तृत व्याख्या करने के बाद ग्रन्थकार उसके शेष तीन अनुबन्धों-विषय, सम्बन्ध एवं प्रयोजन का उल्लेख करते हुए कहते हैं- विषयो जीवब्रह्मैक्यं शुद्धचैतन्यं प्रमेयं तत्रैव वेदान्तानां तात्पर्यात्। सम्बन्धस्तु तदैक्यप्रमेयस्य तत्प्रतिपादकोपनिषत्प्रमाणस्य च बोध्यबोधकभावः। प्रयोजनं तु तदैक्यप्रमेयगताज्ञाननिवृत्तिः स्वस्वरूपानन्दावाप्तिश्च "तरति शोकमात्मवित्" इत्यादिश्रुतेः "ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति" इत्यादि श्रुतेश्च॥४॥ पदच्छेद- विषयः-जीव-ब्रह्म-ऐक्यम् शुद्धचैतन्यम् प्रमेयम् तत्रैव वेदान्तानाम् तात्पर्यात्। सम्बन्धः-तु तद् ऐक्य प्रमेयस्य तत् प्रतिपादक-उपनिषत् प्रमाणस्य च बोध्यबोधकभावः। प्रयोजनम्-तु तद् ऐक्य प्रमेयगत-अज्ञाननिवृत्तिः स्व-स्वरूप-आनन्द-अवाप्तिः च। "तरति शोकम् आत्मवित्" इत्यादि श्रुतेः। "ब्रह्मवित् ब्रह्म एव भवति" इत्यादि श्रुतेः च॥4।। अनुवाद- (वेदान्त का प्रतिपाद्य) विषय-जीव और ब्रह्म की एकता है। शुद्धचैतन्य (ही यहाँ) प्रमा (ज्ञान) का विषय है, क्योंकि समस्त वेदान्त वाक्यों का अभिप्राय उसी (शुद्धचैतन्य) के प्रतिपादन में निहित है। ज्ञान के विषय उन जीव और ब्रह्म का ऐक्य एवं उनका प्रतिपादन करने वाले उपनिषद्रूप प्रमाणवाक्यों का (परस्पर) बोध्यबोधकभाव सम्बन्ध है। जबकि उस जीव एवं ब्रह्म के ऐक्यविषयक ज्ञान के साथ अज्ञान की निवृत्तिपूर्वक अपने स्वरूप का परिचय होने से चरम आनन्द की प्राप्ति ही (इस शास्त्र का) मुख्य प्रयोजन है। "आत्मज्ञानी शोक से तर जाता है" इत्यादि तथा "ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म ही हो जाता है" इत्यादि श्रुति का (कथन यहाँ प्रमाण है)। 'चन्द्रिका'-ग्रन्थ के आरम्भ में ग्रन्थकार ने प्रस्तुत प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार के अधिकारी, विषय, सम्बन्ध एवं प्रयोजन इस 'अनुबन्धचतुष्टय' का उल्लेख करने के पश्चात् अधिकारी पद की विस्तृत व्याख्या की। पुनः प्रस्तुत गद्यखण्ड में शेष तीन अनुबन्धों-'विषय, सम्बन्ध एवं प्रयोजन' की व्याख्या प्रस्तुत करते हैं- (१) विषय-प्रस्तुत वेदान्तसार में जीव और ब्रह्म दोनों की एकता प्रतिपादित की गयी है और यही इस ग्रन्थ का मुख्य प्रतिपाद्यविषय भी है। यहाँ जीव से अभिप्राय सामान्यप्राणी से है, जिसको हम प्रतिदिन अपनी
१४४ वेदान्तसार आंखों से देखते हैं। वेदान्त के अनुसार यह जीव वस्तुतः शुद्धचैतन्यरूप ब्रह्म का ही मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छादित रूप है। सम्पूर्ण वेदान्त-दर्शन में इन्हीं दोनों तत्त्वों जीव एवं ब्रह्म के ऐक्य को सिद्ध करने का ही प्रयास किया गया है। समर्थ गुरु, अधिकारी साधक को ‘अध्यारोप-अपवाद’ न्याय का सहारा लेकर अज्ञान/अविद्या अथवा माया एवं उस नित्यशुद्धचैतन्यस्वरूप ब्रह्म के अन्तर को समझाते हुए ज्ञान का विषय एकमात्र शुद्धचैतन्य को ही बताता है। जिसके परिणामस्वरूप साधक को मोक्ष-प्राप्ति होती है। वस्तुतः इस ग्रन्थ में भी सर्वत्र विभिन्नशैलियों से उसी शुद्धचैतन्य का ही प्रतिपादन किया गया है, क्योंकि वही शुद्धचैतन्य मुख्यरूप से ज्ञान का विषय है। अतः यही इसका मुख्य वर्ण्यविषय भी है। प्रत्यक्षतः दिखायी देने पर हमें जीव में अल्पज्ञता आदि गुण देखने को मिलते हैं, जबकि ब्रह्म सर्वज्ञत्व आदि गुणों से युक्त है। फिर भला ये दोनों एक कैसे हो सकते हैं? ऐसी शङ्का करना उचित नहीं है, क्योंकि अज्ञान से आच्छादित होना ही जीव के अल्पज्ञत्व का कारण है, किन्तु गुरुकृपा द्वारा अज्ञान के दूर होने से सर्वज्ञत्व आदि गुणों से युक्त शुद्धचैतन्य ही शेष रहता है। वस्तुतः जीव का अल्पज्ञत्व माया/अज्ञान द्वारा आरोपित है, वास्तविक नहीं है। इसीलिए ब्रह्म एवं जीव में अभेद प्रतिपादित किया गया है। (२) सम्बन्ध - तत्पश्चात् जीव और ब्रह्म का ऐक्य जो वस्तुतः इस दर्शन का मुख्य प्रतिपाद्य है, इस ग्रन्थ में भी प्रतिपादन किया गया है, क्योंकि वेदान्त के अनुबन्ध प्रस्तुत ग्रन्थ पर भी अक्षरशः लागू होते हैं। साथ ही जीव एवं ब्रह्म के एकतारूपी विषय ही वस्तुतः प्रमा अर्थात् ज्ञान के विषय हैं तथा इस ग्रन्थ में उद्धृत किए गए उपनिषद्वाक्यरूप प्रमाण इन दोनों का बोध्यबोधकभाव सम्बन्ध है, क्योंकि जीव एवं ब्रह्म का ऐक्य यह बोध्य अर्थात् जानने योग्य विषय है तथा ‘तत्त्वमसि’ इत्यादि श्रुतिवाक्य उसका बोध अर्थात् ज्ञान कराने से ‘बोधकवाक्य’ हैं। इस प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि शुद्धचैतन्य के अस्तित्व को प्रत्यक्षरूप से प्रमाणित न कर सकने से अनुमानप्रमाण एवं शब्दप्रमाण का सहारा लेकर उस शुद्धचैतन्य को प्रमाणित करके यहाँ उसकी व्याख्या की गयी है। इसलिए जीव-ब्रह्म की एकता नामक विषय एवं प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रतिपादक वाक्यों में परस्पर बोध्यबोधकभाव सम्बन्ध ही सिद्ध होता है।
अनुबन्ध चतुष्टय १४५
(३) प्रयोजन-जैसा कि पूर्व में बताया गया कि जीव और ब्रह्म के ऐक्यविषयक ज्ञान के साथ अज्ञान की निवृत्ति होने से दिखायी देने वाला यह अज्ञानजन्य सकलप्रपञ्च भी ज्ञानी की दृष्टि में ठीक उसीप्रकार समाप्त हो जाता है। जैसे-सीपी में चाँदी देखने वाले अज्ञानी की ज्ञान होने पर चाँदीविषयक धारणा समाप्त हो जाती है। साथ ही अपने स्वरूप (आत्मस्वरूप) से परिचय हो जाने के कारण उसे अद्भुत आनन्द की ठीक उसीप्रकार अनुभूति होती है, जैसे-कोई व्यक्ति अपनी खोई हुई अमूल्य वस्तु के अकस्मात् मिलने से चरम आनन्द का अनुभव करता है। इसप्रकार आत्मस्वरूप का दर्शन अथवा परिचय होने से अखण्ड आनन्द की प्राप्ति ही वेदान्तशास्त्र का मुख्यप्रयोजन है। अपने इस कथ्य की पुष्टि में ग्रन्थकार दो श्रुतिवाक्यों को उद्धृत करते हैं- 'आत्मज्ञानी संसारबन्धनरूप शोक से तर जाता है' अर्थात् जीव-ब्रह्म के ऐक्य का ज्ञान होने से ज्ञानीव्यक्ति संसार के जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर ब्रह्मसायुज्य (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है। ऐसा श्रुतिवचन इस सम्बन्ध में प्रमाण है। ठीक इसीप्रकार अन्य श्रुतिवाक्य 'ब्रह्म को जानने वाला व्यक्ति वस्तुतः स्वयं ब्रह्मस्वरूप ही हो जाता है' क्योंकि तात्त्विकदृष्टि से ब्रह्म और ब्रह्मज्ञानी में कोई भेद नहीं रहता है। भेदकतत्त्व वस्तुतः पञ्चतत्त्वों से निर्मित यह शरीर होता है, जिसके 'पात' होने पर ब्रह्मज्ञानी का आत्मा 'ब्रह्म' नामक चैतन्यांश में मिलकर एकाकार हो जाता है। विशेष- (1) प्रस्तुत अंश के प्रारम्भ में प्रयुक्त 'जीवब्रह्मैक्यम्' के पश्चात् 'शुद्धचैतन्यम्' कहने का अभिप्राय है कि वेदान्त का प्रतिपाद्य विषय जीव और ब्रह्म की एकता है, किन्तु यह ऐक्य शुद्धचैतन्य का ही है। (2) क्योंकि जीव का अल्पज्ञत्व तथा ब्रह्म का सर्वज्ञत्व दोनों विरुद्ध धर्म हैं, किन्तु उन दोनों का परित्याग कर देने पर शुद्धचैतन्य दोनों में विद्यमान रहता है। जो सम्पूर्ण वेदान्तवाक्यों का प्रतिपाद्य है। (3) इस प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि जीव और ब्रह्म की एकता दूध एवं जल के समान अलग-अलग तथा एक-दूसरे से मिल जाने पर होने वाली तद्रूप एकता के समान न होकर भिन्न होती है। (4) प्रस्तुत अंश में ग्रन्थकार ने विषय, सम्बन्ध और प्रयोजन इन तीन अनुबन्धों को सूत्रात्मकशैली में स्पष्ट किया है।
१४६ वेदान्तसार (५) उक्त गद्यखण्ड के अभिप्राय को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-२५ अनुबन्ध-चतुष्टय ┌───────┬────────────────┬───────────────────────────┬───────────────────┐ │ 1 │ 2 │ 3 │ 4 │ │अधिकारी│ विषय │ सम्बन्ध │ प्रयोजन │ │ │ │ ┌────────────┐ │ ┌────────────┬──────────┐ │ ┌───────────────┐ │ │(पूर्व │ │जीव और ब्रह्म │ │ │जीव और ब्रह्म│ उपनिषद् │ │ │अज्ञान की │ │ │में │ │का ऐक्य │ │ │का ऐक्य │ वाक्य │ │ │निवृत्ति होने से│ │ │व्याख्या│ │प्रतिपादन │ │ └──────┬─────┴─────┬────┘ │ │आत्मदर्शन द्वारा│ │ │किया जा│ └────────────┘ │ │ │ │ │चरम आनन्द │ │ │चुका है)│ │ ▼ ▼ │ │की प्राप्ति │ │ │ │ │ ┌─────────────────────┐ │ └───────────────┘ │ │ │ │ │ बोध्य ───> बोधकभाव │ │ │ │ │ │ └─────────────────────┘ │ │ └───────┴────────────────┴───────────────────────────┴───────────────────┘ अवतरणिका-अनुबन्धचतुष्टय का उल्लेख करने के बाद ग्रन्थकार 'अधिकारी' के आचरण एवं तत्पश्चात् गुरु के व्यवहार का कथन करते हुए कहते हैं- अयमधिकारी जननमरणादिसंसारानलसन्तप्तो प्रदीप्तशिरोजलराशि- मिवोपहारपाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं गुरुमुपसृत्य तमनुसरति "समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं" इत्यादिश्रुतेः। स परमकृपयाध्यारोपापवाद- न्यायेनैनमुपदिशति "तस्मै स विद्वानुपसन्नाय प्राह" इत्यादिश्रुतेः॥५॥ पदच्छेद-अयम् अधिकारी जनन-मरण-आदि संसार-अनल-संतप्तः दीप्तशिरः जलराशिम् इव उपहारपाणिः श्रोत्रियम् ब्रह्मनिष्ठम् गुरुम् उपसृत्य तम् अनुसरति। 'समित् पाणिः श्रोत्रियम् ब्रह्मनिष्ठम्' इत्यादि श्रुते। सः (गुरुः) परमकृपया 'अध्यारोप-अपवाद, न्यायेन एनम् उपदिशति। 'तस्मै सः विद्वान् उपसन्नाय प्राह' इत्यादि श्रुतेः॥5॥ अनुवाद-जिसप्रकार भयानकगर्मी से अत्यधिक तप्त हुआ व्यक्ति अपनी तपनरूपी व्याकुलता को दूर करने के लिए जलराशि के पास जाता है। उसीप्रकार यह (वेदान्त का) अधिकारी जन्म, मरण आदि संसाररूप कष्टाग्नि से संतप्त होकर हाथ में उपहार ग्रहण करके, वेदों का अध्ययन करने वाले, ब्रह्म में अगाधनिष्ठा रखने वाले आचार्य के पास जाकर उसका अनुसरण करता है। 'समिधा हाथ में लिए हुए (शिष्य) वेदों का अध्ययन
अनुबन्ध चतुष्टय १४७ करने वाले ब्रह्मनिष्ठ (गुरु के पास जाता है) इत्यादि श्रुतिवाक्य (इसमें प्रमाण हैं) वह (गुरु) अत्यन्त कृपापूर्वक 'अध्यारोप-अपवाद-न्याय द्वारा इसे (परम रहस्य) का उपदेश प्रदान करता है। 'समीप आए हुए उस जिज्ञासु के लिए वह (ब्रह्मनिष्ठ) विद्वान् उपदेश देता है' इत्यादि श्रुतिवचन भी हैं। 'चन्द्रिका' - सूर्य की प्रचण्ड गर्मीरूपी अग्नि में जिसका अंग-अंग जला जा रहा है, ऐसा व्यक्ति जिसप्रकार अपनी तपनरूप व्याकुलता को, बैचेनी को दूर करने के लिए अपने आसपास स्थित तालाब, सरोवर आदि जलराशि को देखकर जिस तड़पन के साथ उसकी ओर दौड़ता है तथा उसमें स्नान कर अथवा आकण्ठ डूबकर जिस शान्ति एवं सुख को प्राप्त करता है। सभी वेद-वेदाङ्गों का अध्ययन करने वाला काम्य एवं निषिद्धकर्मों का परित्याग करने वाला, नित्यनैमित्तिक, प्रायश्चित्त, उपासनकर्मों का अनुष्ठान करके निर्मलबुद्धि, नित्य-अनित्यवस्तु-विवेकादि साधन-चतुष्टय- सम्पन्न प्रमाता अर्थात् अधिकारी जन्म, मरण, वृद्धावस्था एवं रोगादि संसार के विभिन्न संतापों से ठीक वैसी ही अत्यधिक व्याकुलता का अनुभव करता है। जिसे दूर करने के लिए वह अपनी सामर्थ्य के अनुसार पत्रपुष्पादि उपहार अपने हाथों में लेकर वेदों का गहन अध्ययन, चिन्तन और मननकर उनके अगाधज्ञान को हृदयंगम करने वाले, एकमात्र ब्रह्मतत्त्व में श्रद्धा रखने वाले, ब्रह्मज्ञानी गुरु के समीप जाता है तथा विनम्रभाव से उपहारस्वरूप भेंट, उनके चरणों में रखकर उनसे ब्रह्मज्ञान के उपदेश का निवेदन करता है। उसकी विनम्रता आदि के कारण आचार्य द्वारा उसे स्वीकार करने पर, वह उनके उपदेशों को श्रद्धापूर्वक सुनता है एवं पूर्णतया विनम्रभाव से उपदेश के अनुसार आचरण करता हुआ मन-वचन और कर्म से गुरु की सेवा करता है। यहाँ आकर उसे ठीक उसीप्रकार असीमशान्ति का अनुभव होता है, जैसे-गर्मी से संतप्त व्यक्ति जल के निकट आकर शान्ति का अनुभव करता है। 'समित्पाणि' इत्यादि श्रुति उक्त कथन में प्रमाण है। सांसारिकदुःखों से छुटकारा पाने तथा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को वेदों के ज्ञान से सम्पन्न, ब्रह्मज्ञानी गुरु की शरण में अपनी सामर्थ्य के अनुसार समिधादि लेकर ही जाना चाहिए। यहाँ प्रयुक्त 'समित्' शब्द को उपलक्षण मानना चाहिए। इसका अभिप्राय है कि यदि व्यक्ति इतना निर्धन हो कि वह गुरु को देने के लिए कोई वस्तु ले जाने में सक्षम न हो तो वह पत्र-पुष्प अथवा यज्ञहेतु समिधाएँ ही अपने हाथों में लेकर
१४८ वेदान्तसार गुरु के पास जाए, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि देवता, गुरु और राजा इनके पास कभी भी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए- “रिक्तपाणिर्न सेवेत राजानं देवतां गुरुम्” इसप्रकार श्रुतिसम्मत अधिकारी शिष्य के आचरण का उल्लेख करने के पश्चात् ग्रन्थकार करुणहृदय गुरु के व्यवहार के विषय में प्रमाणस्वरूप श्रुतिवाक्य प्रस्तुत करते हुए कहते हैं- उसकी दयनीयस्थिति एवं ब्रह्मज्ञान के लिए विकलता को देखकर श्रोत्रिय एवं ब्रह्मनिष्ठ वह आचार्य अत्यन्त कृपापूर्वक ‘अध्यारोप’ ‘अपवाद’ न्याय से उसे ब्रह्मरूप रहस्य का उपदेश प्रदान करता है। इस क्रम में भी ग्रन्थकार ने ‘तस्मै स’ इत्यादि श्रुतिवाक्य को प्रमाणरूप में उद्धृत करते हुए अपने कथन की पुष्टि की है। यहाँ प्रयुक्त ‘अध्यारोप-अपवादन्याय’ विशेष व्याख्या की अपेक्षा रखता है। अध्यारोप-अपवादन्याय-अज्ञानवश वस्तु में अवस्तु का भ्रम होना ही अध्यारोप है। जैसे-सीप में चाँदी तथा रस्सी में सर्प की प्रतीति। इसीप्रकार अज्ञान के कारण भ्रमवश परब्रह्म में संसार की प्रतीति होना ही अध्यारोप कहलाता है। इसीप्रकार प्रकाश आदि के कारण भ्रम के दूर होने पर वस्तु के वास्तविकस्वरूप का ज्ञान होना ही अपवाद है। जैसे-वहीं सीपी में प्रतीत होने वाली चांदी के स्थान पर उसके सीपीस्वरूप का वास्तविकज्ञान होना तथा रस्सी में प्रतीत होने वाले सर्प के स्थान पर रस्सी का स्वरूप भासित होना ही अपवाद है। विद्वान् आचार्य भी अधिकारी शिष्य को ‘ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या’ इत्यादि वाक्यों द्वारा ब्रह्म के वास्तविकस्वरूप का ज्ञान कराता है। इसी सम्पूर्णप्रक्रिया को यहाँ ग्रन्थकार ने ‘अध्यारोप-अपवाद-न्याय’ कहा है। विशेष-(1) प्रस्तुत खण्ड के आरम्भ में प्रयुक्त ‘जनन-मरणादि’ के ‘आदि’ शब्द से अभिप्राय वृद्धावस्था एवं रोगादि शारीरिकदुःखों से ग्रहण करना चाहिए। (2) ‘संसारानल’-संसाररूपी अग्नि अर्थ करने पर रूपक अलंकार। यहाँ संसार को अग्नि बताकर उनमें अभेद का आरोप किया गया है- “तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः” (3) श्रोत्रिय से अभिप्राय वेद-वेदाङ्ग में पूर्णतया निष्णात व्यक्ति से लेना चाहिए। (4) बृहदारण्यकोपनिषद् में श्रोत्रिय को निष्काम एवं पापरहित अर्थ में प्रयुक्त माना है- ‘यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतः”