भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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अनुबन्ध चतुष्टय १३१ कर्मों का यह परित्याग वह आलस्य, अविश्वास अथवा प्रमाद के कारण नहीं करता, अपितु इसके परित्याग में शास्त्रोक्तर्रीति का अनुकरण करता है। आचार्य मनु का भी इस विषय में कथन है- प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदस दक्षिणाम्। आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात्।। (मनु. 6.38) (४) तितिक्षा-सर्दी-गर्मी, मान-अपमान तथा इनसे अनुभव किए जाने वाले सुख-दुःख आदि को प्रायः सभी प्राणी अनुभव करते हैं, किन्तु जो व्यक्ति यह मानते हुए कि सर्दी-गर्मी, सुखःदुःख आदि तो केवल शरीर के धर्म हैं। आत्मा के ऊपर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसप्रकार से विवेकपूर्वक इन्हें सहन करना ही 'तितिक्षा' माना गया है। महाभारत में गीताकार ने भी इसी अभिप्राय को व्यक्त किया है- “मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदा। आगमापायिनोऽनित्यास्तान् तितिक्षस्व भारत।। (गीता 2/14) (५) समाधान-वश में किए हुए मन को श्रवण-मनन-निदिध्यासन आदि द्वारा एकाग्र करना, निरन्तर इन्हीं का चिन्तन करना ही समाधि है तथा इसीको 'समाधान' भी कहा गया है। इसी प्रसङ्ग में ग्रन्थकार ने 'तदनुगुणविषय' शब्द का प्रयोग किया है, जिसका अभिप्राय है, मन को बाह्यविषयों से रोककर गुरु के प्रति भक्ति, सेवा-शुश्रूषा तथा उसके प्रति विनयपूर्वक आचरण करते हुए वेदान्तग्रन्थों का अध्ययन एवं चिन्तन करे। ऐसी स्थिति में जहाँ एक ओर साधक का मन इधर-उधर भटकना बन्द कर देता है, वहीं दूसरी ओर वह विनम्रता की मानो साक्षात्‌मूर्ति ही बन जाता है। अभिमान उसको स्पर्श तक नहीं कर पाता है। कुछ विद्वानों ने समाधान का अभिप्राय अपरिग्रह किया है-'दण्डं आच्छादनं कौपीनं परिगृहेत् शेषं विसृजेत्।" (६) श्रद्धा-गुरु को न केवल भारतीयसंस्कृति अपितु सम्पूर्णदर्शन साहित्य में अत्युच्च स्थान प्राप्त हुआ है। इसीकारण 'गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुःदेवो महेश्वरः गुरुः साक्षात्, परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः' कहकर उसे परमब्रह्म की कोटि में रखा गया है। इसी गुरु द्वारा कहे गए वेदान्त-वचनों 'तत्त्वमसि', 'ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या' 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि के प्रति आस्था, अगाधविश्वास धारण करना ही 'श्रद्धा' कहा गया है। गीताकार ने भी तत्त्वज्ञान के लिए श्रद्धा की अनिवार्यता प्रतिपादित की है-