वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 154, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ें१४० वेदान्तसार “श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः” यहाँ तक षट्सम्पत्तिरूप तृतीय साधन की व्याख्या करने के बाद ग्रन्थकार ने मुमुक्षुत्व नाम चतुर्थ एवं अन्तिम साधन का उल्लेख किया है। ‘मुमुक्षु’ का अभिप्राय है-‘मोक्ष की इच्छा वाला’। इसलिए मुमुक्षुत्व का अर्थ होगा ‘मोक्ष की इच्छा का भाव’। पूर्व में बताए गए तीन साधनों से सम्पन्न साधक जब मोक्ष की प्रबल इच्छा वाला होता है, तभी वह अपने गुरु से आध्यात्मिकज्ञान को प्राप्त करने का अधिकारी बन पाता है। इस प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि दर्शनशास्त्र इच्छा अथवा कामना को बन्धन का कारण मानते आये हैं, फिर यह मोक्षेच्छा प्रशस्य क्यों? वस्तुतः यह प्रशंसनीय इसलिए है, क्योंकि आत्मा से भिन्न वस्तु की कामना करना ही ‘काम’ है। आत्मा के सम्बन्ध में होने के कारण मोक्ष के प्रति इच्छा तो ‘अकाम’ ही माना जाएगा, अर्थात् उसकी गणना काम की श्रेणी में नहीं होगी। वस्तुतः आत्मा की कामना करने वाले को पूर्णकाम होने पर भी सभीप्रकार की कामनाओं से मुक्त ही मानना होगा। ऊपर बताए गए शमदमादि गुणों से सम्पन्न, नित्यानित्यवस्तुविवेक आदि साधनचतुष्टय से समृद्ध व्यक्ति ही वस्तुतः प्रस्तुत प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार के अध्ययन करने का अधिकारी है। अपनी बात की पुष्टि के लिए ग्रन्थकार ‘शान्तो दान्तः’ इत्यादि श्रुति को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं। यह श्रुतिवचन काण्वशाखा की बृहदारण्यकोपनिषद् में इसप्रकार उद्धृत किया गया है। यहाँ भी प्रायः उपर्युक्त षट्सम्पत्ति की ओर ही संकेत किया गया है— “शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति” विशेष— (1) प्रस्तुत श्रुति ग्रन्थकार द्वारा पूर्व प्रतिपादित षट्सम्पत्ति को शास्त्रसम्मत प्रतिपादित करने के लिए ही उद्धृत की गयी है। (2) उपर्युक्त अंश में ग्रन्थकार ने उपरति को दो प्रकार से परिभाषित किया है। द्वितीय परिभाषा संन्यास अथवा कर्मसंन्यास को प्रमुखता प्रदान करने के लिए की गयी है। (3) इस दृष्टि से संन्यासी ही मोक्ष का, वेदान्त का अधिकारी हो सकता है, यह अभिप्राय भी ग्रहण किया जा सकता है। (4) आत्मा को देखने की इच्छा अथवा आत्मज्ञान को वेदान्ती ‘काम’ की श्रेणी में नहीं मानते हैं।