वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 155, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनुबंध चतुष्टय १४१ (5) गीताकार ने भी ब्रह्मज्ञान के लिए ‘शम’ की आवश्यकता प्रतिपादित की है– ‘योगारूढस्य शमः कारणमुच्यते’ (6/3) (6) यहाँ प्रयुक्त श्रवणादि से अभिप्राय वेदशास्त्रों के अध्ययन, मनन, चिन्तन, श्रवण तथा आचरण से ग्रहण करना चाहिए। (7) ‘दम’ को भगवान् श्रीकृष्ण ने कछुए के उदाहरण द्वारा अत्यन्त सुन्दर ढंग से इसप्रकार समझाया है– यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।। (गीता-2/58) (8) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है–
चित्र-२४ 3 साधन 4 ┌──────────────────────────┴──────────────────────────┐ शमादि षट्क सम्पत्ति मोक्षेच्छा ┌──────┬───────┬───────┬───────┬───────┐ │ शम दम उपरति तितिक्षा समाधान श्रद्धा मोक्ष प्राप्ति │ │ │ │ │ │ के प्रति अन्तरिन्द्रिय श्रोत्रत्वगादि नित्य नैमित्तिक │ सर्वथा नियन्त्रित │ │ मन बाह्येन्द्रिय को कर्मों का │ मन को श्रवणादि │ प्रबल इच्छा │ शास्त्रोक्त रीति │ विषयों में लगाना │ │ से परित्याग │ │ ┌──────────┴──────────┐ │ ┌──────────┴──────────┐ बाह्य विषयों से निरोध │ │ गुरुवचनों पर आस्था │ │ │ │ एवं दृढ़ विश्वास │ श्रवणादि में नियोजन ┌──────────┴──────────┐ └──────────────────────┘ │ सुखदुःखादि द्वन्द्व को शरीर │ │ धर्म मानकर सहन करना │ └──────────────────────┘
अवतरणिका–‘अनुबन्धचतुष्टय’ में से इसप्रकार प्रथम अनुबन्ध ‘अधिकारी’ की व्याख्या करने के पश्चात् ग्रन्थकार अपनी बात की पुष्टि में आचार्य शङ्कर द्वारा विरचित ‘उपदेशसाहस्री’ में प्रयुक्त कारिका को उद्धृत करते हैं– उक्तं च– “प्रशान्तचित्ताय जितेन्द्रियाय च प्रहीणदोषाय यथोक्तकारिणे। गुणान्वितायानुगताय सर्वदा प्रदेयमेतत्सततं मुमुक्षवे” इति॥