भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 314 में से

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पृष्ठ 158

१४४ वेदान्तसार आंखों से देखते हैं। वेदान्त के अनुसार यह जीव वस्तुतः शुद्धचैतन्यरूप ब्रह्म का ही मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छादित रूप है। सम्पूर्ण वेदान्त-दर्शन में इन्हीं दोनों तत्त्वों जीव एवं ब्रह्म के ऐक्य को सिद्ध करने का ही प्रयास किया गया है। समर्थ गुरु, अधिकारी साधक को ‘अध्यारोप-अपवाद’ न्याय का सहारा लेकर अज्ञान/अविद्या अथवा माया एवं उस नित्यशुद्धचैतन्यस्वरूप ब्रह्म के अन्तर को समझाते हुए ज्ञान का विषय एकमात्र शुद्धचैतन्य को ही बताता है। जिसके परिणामस्वरूप साधक को मोक्ष-प्राप्ति होती है। वस्तुतः इस ग्रन्थ में भी सर्वत्र विभिन्नशैलियों से उसी शुद्धचैतन्य का ही प्रतिपादन किया गया है, क्योंकि वही शुद्धचैतन्य मुख्यरूप से ज्ञान का विषय है। अतः यही इसका मुख्य वर्ण्यविषय भी है। प्रत्यक्षतः दिखायी देने पर हमें जीव में अल्पज्ञता आदि गुण देखने को मिलते हैं, जबकि ब्रह्म सर्वज्ञत्व आदि गुणों से युक्त है। फिर भला ये दोनों एक कैसे हो सकते हैं? ऐसी शङ्का करना उचित नहीं है, क्योंकि अज्ञान से आच्छादित होना ही जीव के अल्पज्ञत्व का कारण है, किन्तु गुरुकृपा द्वारा अज्ञान के दूर होने से सर्वज्ञत्व आदि गुणों से युक्त शुद्धचैतन्य ही शेष रहता है। वस्तुतः जीव का अल्पज्ञत्व माया/अज्ञान द्वारा आरोपित है, वास्तविक नहीं है। इसीलिए ब्रह्म एवं जीव में अभेद प्रतिपादित किया गया है। (२) सम्बन्ध - तत्पश्चात् जीव और ब्रह्म का ऐक्य जो वस्तुतः इस दर्शन का मुख्य प्रतिपाद्य है, इस ग्रन्थ में भी प्रतिपादन किया गया है, क्योंकि वेदान्त के अनुबन्ध प्रस्तुत ग्रन्थ पर भी अक्षरशः लागू होते हैं। साथ ही जीव एवं ब्रह्म के एकतारूपी विषय ही वस्तुतः प्रमा अर्थात् ज्ञान के विषय हैं तथा इस ग्रन्थ में उद्धृत किए गए उपनिषद्वाक्यरूप प्रमाण इन दोनों का बोध्यबोधकभाव सम्बन्ध है, क्योंकि जीव एवं ब्रह्म का ऐक्य यह बोध्य अर्थात् जानने योग्य विषय है तथा ‘तत्त्वमसि’ इत्यादि श्रुतिवाक्य उसका बोध अर्थात् ज्ञान कराने से ‘बोधकवाक्य’ हैं। इस प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि शुद्धचैतन्य के अस्तित्व को प्रत्यक्षरूप से प्रमाणित न कर सकने से अनुमानप्रमाण एवं शब्दप्रमाण का सहारा लेकर उस शुद्धचैतन्य को प्रमाणित करके यहाँ उसकी व्याख्या की गयी है। इसलिए जीव-ब्रह्म की एकता नामक विषय एवं प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रतिपादक वाक्यों में परस्पर बोध्यबोधकभाव सम्बन्ध ही सिद्ध होता है।

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