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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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अनुबन्ध चतुष्टय १४५

(३) प्रयोजन-जैसा कि पूर्व में बताया गया कि जीव और ब्रह्म के ऐक्यविषयक ज्ञान के साथ अज्ञान की निवृत्ति होने से दिखायी देने वाला यह अज्ञानजन्य सकलप्रपञ्च भी ज्ञानी की दृष्टि में ठीक उसीप्रकार समाप्त हो जाता है। जैसे-सीपी में चाँदी देखने वाले अज्ञानी की ज्ञान होने पर चाँदीविषयक धारणा समाप्त हो जाती है। साथ ही अपने स्वरूप (आत्मस्वरूप) से परिचय हो जाने के कारण उसे अद्भुत आनन्द की ठीक उसीप्रकार अनुभूति होती है, जैसे-कोई व्यक्ति अपनी खोई हुई अमूल्य वस्तु के अकस्मात् मिलने से चरम आनन्द का अनुभव करता है। इसप्रकार आत्मस्वरूप का दर्शन अथवा परिचय होने से अखण्ड आनन्द की प्राप्ति ही वेदान्तशास्त्र का मुख्यप्रयोजन है। अपने इस कथ्य की पुष्टि में ग्रन्थकार दो श्रुतिवाक्यों को उद्धृत करते हैं- 'आत्मज्ञानी संसारबन्धनरूप शोक से तर जाता है' अर्थात् जीव-ब्रह्म के ऐक्य का ज्ञान होने से ज्ञानीव्यक्ति संसार के जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर ब्रह्मसायुज्य (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है। ऐसा श्रुतिवचन इस सम्बन्ध में प्रमाण है। ठीक इसीप्रकार अन्य श्रुतिवाक्य 'ब्रह्म को जानने वाला व्यक्ति वस्तुतः स्वयं ब्रह्मस्वरूप ही हो जाता है' क्योंकि तात्त्विकदृष्टि से ब्रह्म और ब्रह्मज्ञानी में कोई भेद नहीं रहता है। भेदकतत्त्व वस्तुतः पञ्चतत्त्वों से निर्मित यह शरीर होता है, जिसके 'पात' होने पर ब्रह्मज्ञानी का आत्मा 'ब्रह्म' नामक चैतन्यांश में मिलकर एकाकार हो जाता है। विशेष- (1) प्रस्तुत अंश के प्रारम्भ में प्रयुक्त 'जीवब्रह्मैक्यम्' के पश्चात् 'शुद्धचैतन्यम्' कहने का अभिप्राय है कि वेदान्त का प्रतिपाद्य विषय जीव और ब्रह्म की एकता है, किन्तु यह ऐक्य शुद्धचैतन्य का ही है। (2) क्योंकि जीव का अल्पज्ञत्व तथा ब्रह्म का सर्वज्ञत्व दोनों विरुद्ध धर्म हैं, किन्तु उन दोनों का परित्याग कर देने पर शुद्धचैतन्य दोनों में विद्यमान रहता है। जो सम्पूर्ण वेदान्तवाक्यों का प्रतिपाद्य है। (3) इस प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि जीव और ब्रह्म की एकता दूध एवं जल के समान अलग-अलग तथा एक-दूसरे से मिल जाने पर होने वाली तद्रूप एकता के समान न होकर भिन्न होती है। (4) प्रस्तुत अंश में ग्रन्थकार ने विषय, सम्बन्ध और प्रयोजन इन तीन अनुबन्धों को सूत्रात्मकशैली में स्पष्ट किया है।