वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 162, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ें१४८ वेदान्तसार गुरु के पास जाए, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि देवता, गुरु और राजा इनके पास कभी भी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए- “रिक्तपाणिर्न सेवेत राजानं देवतां गुरुम्” इसप्रकार श्रुतिसम्मत अधिकारी शिष्य के आचरण का उल्लेख करने के पश्चात् ग्रन्थकार करुणहृदय गुरु के व्यवहार के विषय में प्रमाणस्वरूप श्रुतिवाक्य प्रस्तुत करते हुए कहते हैं- उसकी दयनीयस्थिति एवं ब्रह्मज्ञान के लिए विकलता को देखकर श्रोत्रिय एवं ब्रह्मनिष्ठ वह आचार्य अत्यन्त कृपापूर्वक ‘अध्यारोप’ ‘अपवाद’ न्याय से उसे ब्रह्मरूप रहस्य का उपदेश प्रदान करता है। इस क्रम में भी ग्रन्थकार ने ‘तस्मै स’ इत्यादि श्रुतिवाक्य को प्रमाणरूप में उद्धृत करते हुए अपने कथन की पुष्टि की है। यहाँ प्रयुक्त ‘अध्यारोप-अपवादन्याय’ विशेष व्याख्या की अपेक्षा रखता है। अध्यारोप-अपवादन्याय-अज्ञानवश वस्तु में अवस्तु का भ्रम होना ही अध्यारोप है। जैसे-सीप में चाँदी तथा रस्सी में सर्प की प्रतीति। इसीप्रकार अज्ञान के कारण भ्रमवश परब्रह्म में संसार की प्रतीति होना ही अध्यारोप कहलाता है। इसीप्रकार प्रकाश आदि के कारण भ्रम के दूर होने पर वस्तु के वास्तविकस्वरूप का ज्ञान होना ही अपवाद है। जैसे-वहीं सीपी में प्रतीत होने वाली चांदी के स्थान पर उसके सीपीस्वरूप का वास्तविकज्ञान होना तथा रस्सी में प्रतीत होने वाले सर्प के स्थान पर रस्सी का स्वरूप भासित होना ही अपवाद है। विद्वान् आचार्य भी अधिकारी शिष्य को ‘ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या’ इत्यादि वाक्यों द्वारा ब्रह्म के वास्तविकस्वरूप का ज्ञान कराता है। इसी सम्पूर्णप्रक्रिया को यहाँ ग्रन्थकार ने ‘अध्यारोप-अपवाद-न्याय’ कहा है। विशेष-(1) प्रस्तुत खण्ड के आरम्भ में प्रयुक्त ‘जनन-मरणादि’ के ‘आदि’ शब्द से अभिप्राय वृद्धावस्था एवं रोगादि शारीरिकदुःखों से ग्रहण करना चाहिए। (2) ‘संसारानल’-संसाररूपी अग्नि अर्थ करने पर रूपक अलंकार। यहाँ संसार को अग्नि बताकर उनमें अभेद का आरोप किया गया है- “तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः” (3) श्रोत्रिय से अभिप्राय वेद-वेदाङ्ग में पूर्णतया निष्णात व्यक्ति से लेना चाहिए। (4) बृहदारण्यकोपनिषद् में श्रोत्रिय को निष्काम एवं पापरहित अर्थ में प्रयुक्त माना है- ‘यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतः”