भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 314 में से

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अज्ञान निरूपण १४९ (5) ब्रह्मनिष्ठं—'ब्रह्मणि निष्ठा यस्य तम्'। आचार्य शङ्कर ने इसको जपनिष्ठ एवं तपोनिष्ठ अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त माना है। (6) 'अनुसरण' का अभिप्राय केवल पीछे-पीछे चलने से नहीं लेना चाहिए, अपितु इसका 'मनसा, वाचा और कर्मणा श्रद्धापूर्वक गुरु की सेवा' अर्थ करना उचित है। (7) आचार्य की कृपा प्राप्त करके ही अधिकारी ब्रह्मज्ञान को गुरु से प्राप्त करने में सक्षम है। इसी भाव की अभिव्यक्ति 'परमकृपया' द्वारा हो रही है। (8) प्रथम गद्यखण्ड में अधिकारी की तुलना गर्मी से संतप्त व्यक्ति से करने के कारण उपमालंकार का प्रयोग द्रष्टव्य है—'प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते'। (9) प्रस्तुत खण्ड के अर्थ को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है— चित्र-२६ ┌────────────────────┐ │जन्ममरणादि संसारानल│ ── आदि ──┬─ वृद्धावस्था ──┬─> शारीरिक धर्म │प्रदीप्त शिर: │ └─ रोगादि ┘ └─────────┬──────────┘ ↓ (अधिकारी) ──────> जलराशिमिव ──┬─ श्रोत्रियम् ─┬─> ┌───────┐ │ └─ ब्रह्मनिष्ठम्┘ │ गुरुम्│ ┌─────┴────────┐ └─┬─────┘ │समित्पाणि भूत्वा│ ↓ └──────────────┘ ┌───────┐ │उपसृत्य │ (सगुरु:) └─┬─────┘ │ ↓ ┌────────────────┼────────────────┐ अनुसरति ┌───┴───┐ ┌───┴───┐ │अध्यारोप│ │ अपवाद │ └───┬───┘ └───┬───┘ └──────────┐ ┌──────────┘ ↓ ↓ ┌─────┐ │न्यायेन│ ───────> (परमकृपया उपदिशति) └─────┘ अवतरणिका—अधिकारी एवं आचार्य के आचरण, व्यवहार का कथन करने के पश्चात् अध्यारोप एवं अज्ञान के स्वरूप का कथन करते हैं- असर्पभूतायां रज्जौ सर्पारोपवद्वस्तुन्यवस्त्वारोपोऽध्यारोपः। वस्तु सच्चिदानन्दानन्ताद्वयं ब्रह्म। अज्ञानादिसकलजडसमूहोऽवस्तु। अज्ञानं तु सदसद्भ्यामनिर्वचनीयं त्रिगुणात्मकं ज्ञानविरोधि भावरूपं यत्किञ्चिदिति वदन्त्यहमज्ञ इत्याद्यनुभवात् "देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्" इत्यादिश्रुतेश्च॥६॥ पदच्छेद— असर्पभूतायाम् रज्जौ सर्प-आरोपवद् वस्तुनि अवस्तु-आरोपः अध्यारोपः। वस्तु-सत्-चित्-आनन्द-अनन्त-अद्वयम् ब्रह्म। अज्ञान-आदि सकल जड़समूहः अवस्तु।

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