वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२८ वेदान्तसार सन्ध्यावन्दन आदि नित्यकर्म हैं। पुत्रजन्म के अवसर पर किए जाने वाले जातेष्टियज्ञ आदि नैमित्तिककर्म हैं। पाप के प्रक्षालन हेतु किए जाने वाले चान्द्रायणव्रत आदि प्रायश्चित्तकर्म हैं। (इसीप्रकार) मन की वृत्ति को स्थिर करने के लिए सगुण ब्रह्मविषयक मानसिकव्यापाररूप शाण्डिल्यविद्या आदि उपासनकर्म हैं। इन कर्मों में नित्य आदि कर्मों के अनुष्ठान का मुख्यप्रयोजन बुद्धि की शुद्धि करना है, जबकि उपासनकर्मों का (परम प्रयोजन) चित्त को एकाग्र करना है। 'उस इस आत्मा को ब्राह्मण लोग वेदों में प्रतिपादित वचनों एवं यज्ञ द्वारा जानने की इच्छा करते हैं', इत्यादि श्रुतिवचन तथा "तप द्वारा पाप को विनष्ट करता है" इत्यादि स्मृतिवचन (इस सम्बन्ध में) प्रमाण हैं। नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित्त एवं उपासनकर्मों का गौणफल तो (उनके द्वारा) पितृलोक एवं सत्यलोक की प्राप्ति ही है। 'कर्म द्वारा पितृलोक एवं विद्या (उपासन) द्वारा सत्यलोक की प्राप्ति होती है" इत्यादि श्रुतिवचन भी हैं। 'चन्द्रिका'- (१) काम्यकर्म-फलविशेष की प्राप्ति की कामना से किया गया कर्म 'काम्य' कहलाता है। यह कामना अथवा इच्छा दो प्रकार की होती है। इस पृथ्वीलोक पर प्राप्त होने वाली उपभोगसामग्री को प्राप्त करने की इच्छा तथा स्वर्ग आदि परलोकविषयक सुखों को प्राप्त करने की इच्छा अथवा कामना, किन्तु यहाँ ग्रन्थकार ने लौकिकसुख-सामग्री की प्राप्ति की बात न करके स्वर्गादि कामनाओं के साधनरूप ज्योतिष्टोमयाग आदि को काम्यकर्म के रूप में प्रतिपादित करके वेदान्त के अधिकारी के लिए उन्हें भी न करने का निषेध किया है, क्योंकि जहाँ एक ओर लौकिक सुख साधनों को प्राप्त करने के लिए किए गए काम्यकर्म मोक्षप्राप्ति में बाधक होने से त्याज्य हैं। वहीं दूसरी ओर स्वर्गादि प्रदान करने वाले ज्योतिष्टोम- यागादि काम्यकर्म भी मोक्षप्राप्ति के मार्ग में बाधक होने से हेय हैं। अतः त्याग करने योग्य हैं, क्योंकि ज्योतिष्टोमयागादि के फलस्वरूप प्राप्त होने वाला पुण्य समाप्त होने पर व्यक्ति को पुनः इसी मृत्युलोक में आना पड़ता है। अतः निषिद्धकर्मों के समान ही वे भी बन्धन का कारण होने से वेदान्त-विद्या के अधिकारी होने में वर्ज्य हैं। (२) निषिद्ध-कर्म-अनेकबार मनुष्य अपने जीवन में स्वार्थवश अथवा अज्ञानवश ऐसे कर्म करता है, जो उसे नरक जैसी अनष्टि स्थितियों में