वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ९३ सिद्धान्तों पर टिका हुआ है। आचार्य सदानन्द ने वेदान्तसार में अध्यारोप की इसप्रकार व्याख्या की है- “असर्पभूतायां रज्जौ सर्पारोपवद् वस्तुन्यवस्त्वारोपोऽध्यारोपः। वस्तु सच्चिदानन्दानन्ताद्वयं ब्रह्म। अज्ञानादिसकलजडसमूहोऽवस्तु।” अर्थात् वस्तु में अवस्तु का आरोप ही अध्यारोप है तथा एकमात्र सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म ही वस्तुतः वस्तु है। इसके अतिरिक्त अज्ञानादि सम्पूर्ण जड़समूह जिसके कारण इस मिथ्याजगत् की प्रतीति होती है; वह अवस्तु है। कुछ आचार्यों ने इसीको 'अध्यास' की संज्ञा भी प्रदान की है। वेदान्त अध्यारोप (अध्यास) का मूलकारण अज्ञान को मानता है। इसके प्रभाव से देखने वाला व्यक्ति वस्तु के वास्तविकस्वरूप को जानने में असमर्थ रहता है तथा वस्तु में अवस्तु की परिकल्पना करके भ्रमित रहता है इस विषय में आचार्य शङ्कर का मत है- अतस्मिंस्तद्बुद्धिः प्रभवति विमूढस्य तमसा। विवेकाभावाद्वै स्फुरति भुजगे रज्जुधिषणा॥ (विवेकचूड़ामणि-140) संक्षेप में अज्ञान के कारण मूढ़पुरुष किसी वस्तु में किसी अन्य वस्तु की परिकल्पना कर लेता है। जैसे, विवेक के अभाव से रज्जु को सर्प समझ लेना। इसीको यहाँ अध्यारोप या अध्यास कहा गया है। जिसप्रकार अनेकबार बादलों में सूर्य घिरा होने पर हमें वह दिखायी नहीं पड़ता है, ठीक वैसे ही मोया (अज्ञान) से आवृत्त हुए ब्रह्म का हमें प्रत्यक्ष नहीं होता है, अपितु उसके स्थान पर हमें माया की विक्षेप नामक शक्ति से दृश्यमान मिथ्या जगत् की प्रतीति होती है। इसप्रकार अध्यारोप के कारण जीव वस्तु के वास्तविकरूप को जानने में असमर्थ रहता है और वह सत् को असत् मान बैठता है, यही मिथ्याज्ञान उसके सांसारिकबन्धन का कारण बनता है। बन्धन के कारण इस मिथ्याज्ञान को विनष्ट करने के लिए वेदान्तदर्शन में सद् गुरु की आवश्यकता प्रतिपादित की गई है, जो अधिकारी शिष्य को 'अपवाद' पद्धति से उपदेश प्रदान करता है। जिससे शिष्य को वास्तविकता का ज्ञान हो जाता है और वह ब्रह्म को ही एकमात्र वास्तविकसत्ता मान लेता है तथा सम्पूर्णजगत् का मिथ्यात्व भी उसे हस्तामलकवत् प्रतीत होने लगता है। उसकी यह कल्पना रज्जु में की गई सर्प की भ्रान्ति के पश्चात् प्रकाश से होने वाली सर्पत्व की प्रतीति की समाप्ति के समान कही जा