भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 314 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 108

९४ वेदान्तसार सकती है। जहाँ उसे रज्जु, रज्जुरूप में ही प्रतीत होती है। इसीप्रकार विवेक द्वारा ब्रह्म में मिथ्याप्रपञ्च सम्बन्धी अध्यारोप की निवृत्ति होने पर एकमात्र ब्रह्म की सत्ता ही रह जाती है। इसी प्रक्रिया को वेदान्त 'अपवाद' कहता है। आचार्य सदानन्द वेदान्तसार में इसका इसप्रकार उल्लेख करते हैं- “अपवादो नाम रज्जुविवर्तस्य सर्पस्य रज्जुमात्रत्वाद् वस्तुविवर्तस्या- वस्तुनोऽज्ञानादेः प्रपञ्चस्य वस्तुमात्रत्वम्।” (२१) सविकल्पक एवं निर्विकल्पक समाधि- मुक्ति की दिशा में जीव के लिए समाधि की उपयोगिता एवं महत्त्व को प्रायः सभी दर्शनों ने स्वीकार किया है। वेदान्तदर्शन ने भी इसका उल्लेख किया है। तदनुसार-ध्यान की उत्कृष्ट अवस्था को समाधि कहते हैं। इसके आठ अङ्ग होते हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इनमें से समाधि साधक की उत्कृष्ट अवस्था भी मानी गई है। इसे (क) सविकल्पक (ख) निर्विकल्पक मुख्यरूप से दो भागों में विभाजित किया गया है। सविकल्पकसमाधि में ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय इन तीनों की स्वतन्त्र स्थिति का ज्ञान बना रहता है। इस अवस्था में साधक को अपने अस्तित्व का भान रहता है। साथ ही उसे अद्वैतवस्तु ब्रह्म की भी प्रतीति होती रहती है तथा उस ज्ञान का भी वह दर्शन अथवा अनुभूति करता है, जिसके कारण उसे ब्रह्मतत्त्व की प्रतीति हुई है। उसकी इस स्थिति को एक उदाहरण द्वारा भलीप्रकार समझा जा सकता है- जिसप्रकार मिट्टी का हाथी देखने वाले को हाथी की प्रतीति होने पर भी उसके मिथ्या होने का बोध बना रहता है, सत्यता वहाँ मिट्टी की ही होती है। ठीक उसीप्रकार सर्वव्यापक, अक्षर, मायातीत परब्रह्मरूप चित्तवृत्ति से आकारित ज्ञाता, ज्ञान एवं ज्ञेय की प्रतीति होने पर भी वह उसे असत्य मानता है, सत्यता केवल परब्रह्म की स्वीकार करता है। इसी मनःस्थिति किंवा अनुभूति को दर्शन की भाषा में 'सविकल्पक समाधि' कहा गया है। आचार्य सदानन्द का इस विषय में कथन है- सविकल्पको नाम ज्ञातृज्ञानादिविकल्पलयनपेक्षयाऽद्वितीयवस्तुनि तदाकाराकारितायाश्चित्तवृत्तेरव- स्थानम् मृण्मयमजादिभानेऽपि मृद्भावन्वद् द्वैतभानेऽप्यद्वैतवस्तुभासदेः