वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५४ वेदान्तसार चित्र-२८ अज्ञान ┌────────────────────────┬─────────────────────────┬──────────────────────────┐ 1 2 3 सत् असत् सत्त्व रजस् तमस् सद्रूप असद्रूप सदसद्रूप (ब्रह्म) (वन्ध्यापुत्र) │ │ │ │ │ │ └───────┬────────┘ └────────┼────────┘ └──────────┼───────┘ से भिन्न अतः तीन गुणों से युक्त अतः से भिन्न अतः │ │ │ (अनिर्वचनीय) (त्रिगुणात्मक) (यत्किञ्चित्) ┌────────────────────────┬─────────────────────────┬──────────────────────────┘ 4 5 6 ┌──────────────────────┐ अहमज्ञोऽस्मि ┌──────────────────────┐ │ज्ञात होने पर समाप्ति अतः│ │ │देवात्मशक्ति इत्यादि │ └──────────┬───────────┘ │ │श्रुतिवचन से भी │ │ इत्यादि अनुभव से └──────────┬───────────┘ │ │ │ (ज्ञानविरोधी) (भावरूप) (पुष्टि) अवतरणिका- ज्ञान के स्वरूप का उल्लेख करके ग्रन्थकार उसके समष्टि-व्यष्टि दो भेदों का कथन करके, प्रथम 'समष्टि' भेद की व्याख्या करते हुए कहते हैं- इदमज्ञानं समष्टिव्यष्ट्यभिप्रायेणैकमनेकमिति च व्यवह्रियते। तथाहि। यथा वृक्षाणां समष्ट्यभिप्रायेण वनमित्येकत्वव्यपदेशो यथा वा जलानां समष्ट्यभिप्रायेण जलाशय इति तथा नानात्वेन प्रतिभासमानानां जीवगताज्ञानानां समष्ट्यभिप्रायेण तदेकत्वव्यपदेशो "ऽजामेकां" इत्यादिश्रुतेः। पदच्छेद-इदम् अज्ञानम् समष्टि-व्यष्टि-अभिप्रायेण एकम् अनेकम्, इति च व्यवह्रियते। तथाहि-यथा वृक्षाणाम् समष्टि-अभिप्रायेण वनम्, इति एकत्व व्यपदेशः। यथा वा-जलानाम् समष्टि-अभिप्रायेण जलाशयः, इति। तथा नानात्वेन प्रतिभासमानानाम् जीवगत-अज्ञानानाम् समष्टि-अभिप्रायेण तद् एकत्व व्यपदेशः "अजाम् एकाम्" इत्यादि श्रुतेः। अनुवाद-समष्टि, व्यष्टि अभिप्राय से यह अज्ञान (कहीं) एक तथा (कहीं) अनेक इसप्रकार (दो रूपों में) व्यवहृत होता है, क्योंकि-जिसप्रकार अनेक वृक्षों में समष्टि के अभिप्राय से 'वन' इसप्रकार एकत्वसूचक व्यवहार