वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 171, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंअज्ञान निरूपण १५७ इयं समष्टिरुत्कृष्टोपाधितया विशुद्धसत्त्वप्रधाना। एतदुपहितं चैतन्यं सर्वज्ञत्वसर्वेश्वरत्वसर्वनियन्तृत्वादिगुणकमव्यक्तमन्तर्यामी जगत्कारण- मीश्वर इति च व्यपदिश्यते सकलाज्ञानावभासकत्वात्। “यः सर्वज्ञः सर्ववित्” इति श्रुतेः ईश्वरस्येयं समष्टिरखिलकारणत्वात्कारणशरीर- मानन्दप्रचुरत्वात्कोशवदाच्छादकत्वाच्चानन्दमयकोशः, सर्वोपरमत्वात्सु- षुप्तिरत एव स्थूलसूक्ष्मप्रपञ्चलयस्थानमिति चोच्यते। पदच्छेद-इयम् समष्टिः उत्कृष्ट-उपाधितया विशुद्धसत्त्वप्रधाना। एतत् उपहितम् चैतन्यम् सर्वज्ञत्व-सर्वेश्वरत्व-सर्वनियन्तृत्व-आदि गुणकम् अव्यक्तम् अन्तर्यामी जगत्कारणम् ईश्वरः इति च व्यपदिश्यते, सकल-अज्ञान- अवभासकत्वात्। यः सर्वज्ञः सर्ववित् इति श्रुतेः। ईश्वरस्य , इयम् समष्टिः अखिलकारणत्वात्-कारणशरीरम्। आनन्दप्रचुरत्वात्-कोशवत् आच्छादकत्वात् च-आनन्दमयकोशः। सर्वोपरमत्वात् सुषुप्तिः। अतः एव स्थूलसूक्ष्मप्रपञ्च-लयस्थानम्, इति च उच्यते। अनुवाद-उत्कृष्ट उपाधियुक्त होने से यह समष्टि विशुद्धसत्त्वप्रधान गुणयुक्त है। इस उपाधि से युक्त चैतन्य सम्पूर्ण अज्ञान का प्रकाशक होने से सब कुछ जानने वाला, सबका ईश्वर, सबको नियन्त्रित करने वाला आदि गुणों से युक्त अव्यक्त, अन्तर्यामी, संसार का कारणरूप ईश्वर इत्यादि (नामों से कहा जाता है। 'जो सर्वज्ञाता सर्ववित् है' इत्यादि श्रुति (इसमें प्रमाण है)। ईश्वर की यह समष्टि सम्पूर्ण (विश्वप्रपञ्च) का कारण होने से 'कारण शरीर।' आनन्द की प्रचुरता एवं कोश के समान आच्छादक होने से-'आनन्दमय कोश' तथा सभी कुछ विलीन होने से 'सुषुप्ति'। इसीकारण स्थूल एवं सूक्ष्मशरीरप्रपञ्च का 'लयस्थान' भी कहा जाता है। ‘चन्द्रिका’-सामान्यतः अज्ञान त्रिगुणात्मक है। अर्थात् इसमें सत्त्व, रजस् और तमोगुण विद्यमान हैं, किन्तु अज्ञान की यह समष्टि उत्कृष्ट उपाधि युक्त होने के कारण विशुद्धसत्त्वगुण की प्रधानता वाली है, अर्थात् रजोगुण एवं तमोगुण विद्यमान होते हुए भी यहाँ सत्त्वगुण अपने विशुद्धरूप में प्रधानता लिये रहता है। इसी विशुद्धसत्त्वगुण की प्रधानता से उसमें उत्कृष्टता का आधान होता है और इससे आवृत्त हुआ परमब्रह्मरूप चैतन्य सभी कुछ जानने वाला होने से सर्वज्ञ, चराचर सम्पूर्णसृष्टि का स्वामी होने से सर्वेश्वर