भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 314 में से

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१५८ वेदान्तसार तथा सभी पर नियन्त्रण करने वाला होने के कारण सर्वनियन्ता आदि गुणों से युक्त होता है। उपर्युक्त गुणों के अतिरिक्त इसमें अव्यक्त, अन्तर्यामी एवं सम्पूर्ण सृष्टि का एकमात्र कारण होना आदि विशेषताएँ भी विद्यमान रहती हैं। वेदान्तदर्शन विशुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान की इस उत्कृष्ट उपाधियुक्त चैतन्य को 'ईश्वर' इस नाम से सम्बोधित करता है। अतः स्पष्ट ही यहाँ शुद्धचैतन्य एवं ईश्वर में भिन्नता विद्यमान है, क्योंकि यही ईश्वर सम्पूर्ण अज्ञान का प्रकाशक है। इसी प्रसङ्ग में ग्रन्थकार 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' इत्यादि श्रुतिवचन को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं। तत्पश्चात् वेदान्त की दृष्टि से उत्कृष्ट उपाधियुक्त अज्ञान की सृष्टि का कथन करते हैं। जैसाकि पूर्व में बताया गया कि विशुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान की उत्कृष्ट उपाधि से आवृत्त शुद्धचैतन्य ही 'ईश्वर' संज्ञा प्राप्त करता है। इसी क्रम में सत्त्व की विशुद्धता के कारण तथा उपाधि की उत्कृष्टता से इसमें अनेक उत्कृष्टगुणों का आधान रहता है। ईश्वर की यही समष्टि वेदान्त के अनुसार सम्पूर्णप्रपञ्च का मुख्यकारण है, क्योंकि सम्पूर्णसृष्टि का क्रम इससे प्रारम्भ होता है। इसीलिए इसी ईश्वर को कारणशरीर भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त विशुद्धसत्त्वगुण की प्रधानता होने से इस कारणशरीर अथवा ईश्वर में आनन्द का प्राचुर्य विद्यमान रहता है तथा उत्कृष्ट उपाधि सम्पन्न यह अज्ञान, क्योंकि शुद्धचैतन्यरूप परमब्रह्म को कोश के समान ढके रखता है। अतः इन दोनों विशेषताओं के कारण इसी ईश्वर अथवा कारणशरीर को ही आनन्दमयकोश भी कहते हैं। साथ ही ज्ञान होने की स्थिति में इसी कारणशरीर में ही विपरीत क्रम में सूक्ष्मशरीर आदि विलीन हो जाते हैं। अतः इसी अवस्था को 'सुषुप्ति' भी कहा गया है। इसके अलावा जितनी भी दृश्यमान स्थूल एवं सूक्ष्मसृष्टि है। जिसका विस्तृतवर्णन हम भूमिका में कर चुके हैं। प्रलयकालीन अवस्था में इसी ईश्वर में उसका भी लय हो जाता है। इसलिए वेदान्त इसे 'लयस्थान' भी कहता है। इस दृष्टि से उत्कृष्ट उपाधियुक्त अज्ञान की यह समष्टि विभिन्न- कार्यों एवं अवस्थाओं अथवा विशेषताओं के कारण एक होते हुए भी अनेक नामों से जानी जाती है।