वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअज्ञान निरूपण १५९ विशेष-(1) वेदान्त के सृष्टिक्रम में ब्रह्म के पश्चात् ईश्वर का ही स्थान है। (2) ईश्वर की अनेक विशेषताओं का प्रस्तुत गद्यखण्ड में उल्लेख किया गया है। (3) प्रस्तुत गद्यखण्ड में ईश्वर को जगत् का कारण होने से कारणशरीर, आनन्द की प्रचुरता के कारण आनन्दमयकोष, सभी कुछ विलीन होने के कारण सुषुप्ति एवं लयस्थान कहा गया है। (4) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी समझा जा सकता है- चित्र-३० अज्ञान की समष्टि सर्वज्ञ $\leftarrow$ ईश्वर $\leftarrow$ शुद्ध चैतन्य $\rightarrow$ ईश्वर सर्वेश्वर $\leftarrow$ विशुद्ध सत्त्व प्रधान अज्ञान की उत्कृष्ट उपाधि सर्वनियन्ता $\leftarrow$ अन्तर्यामी $\leftarrow$ अखिल कारणत्वात् अव्यक्त $\leftarrow$ आनन्द प्रचुरत्वात् कारण शरीरम् $\leftarrow$ स्थूल सूक्ष्मप्रपञ्च का लयस्थान जगत् का $\leftarrow$ कोशवद् आच्छादकत्वात् सर्वोपरमत्वात् कारण आनन्दमय कोश सुषुप्ति लयस्थानम् अवतरणिका-अज्ञान के समष्टिस्वरूप की व्याख्या एवं सृष्टिक्रम में इसकी भूमिका का कथन करने के उपरान्त इसके व्यष्टिस्वरूप को स्पष्ट करते हुए सृष्टिक्रम में इसके सहयोग का उल्लेख करते हैं- यथा वनस्य व्यष्ट्यभिप्रायेण वृक्षा इत्यनेकत्वव्यपदेशो यथा वा जलाशयस्य व्यष्ट्यभिप्रायेण जलानीति तथाज्ञानस्य व्यष्ट्यभिप्रायेण तदनेकत्वव्यपदेश “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयत” इत्यादिश्रुतेः। अत्र व्यस्तसमस्तव्यापित्वेन व्यष्टिसमष्टिताव्यपदेशः। इयं व्यष्टिर्निकृष्टोपाधितया मलिनसत्त्वप्रधाना। एतदुपहितं चैतन्य- मल्पज्ञत्वानीश्वरत्वादिगुणकं प्राज्ञ इत्युच्यत एकाज्ञानावभासकत्वात्। अस्य प्राज्ञत्वमस्पष्टोपाधितयानतिप्रकाशकत्वात् अस्यापीयमहङ्कारादिकारणत्वात्