वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्राज्ञ-ईश्वर निरूपण १६७ उपर्युक्त दोनों प्रकार के अज्ञान वस्तुतः उसीप्रकार एक हैं, जिसप्रकार वनगत आकाश एवं वृक्षगत आकाश में भिन्नता प्रतीत होते हुए भी दोनों एक हैं। इन दोनों के ऐक्य को समझाने के लिए ग्रन्थकार अन्य उदाहरण देते हुए कहते हैं कि-जलाशय में प्रतिबिम्बित होने वाले आकाश एवं जल की एक बूँद में प्रतिबिम्बित होने वाले आकाश में तात्त्विकदृष्टि से कोई भेद नहीं है। ठीक उसीप्रकार ईश्वर स्थित समष्टिगत अज्ञान एवं जीवस्थित व्यष्टिगत अज्ञान में भी कोई वास्तविकभेद नहीं है। अतः इस दृष्टि से ईश्वर और प्राज्ञ में भी कोई भेद नहीं है। प्रतीत होने वाला भेद वस्तुतः वैसा ही है, जैसाकि स्वर्णपिण्ड एवं उससे बने कटक-कुण्डल आदि में होता है। जिसप्रकार स्वर्णरूप कारण तथा उससे बनाए गए कटककुण्डल आदि कार्य, दोनों में यद्यपि भिन्नता दिखायी देती है, किन्तु कार्यकारणरूप भेद को दूर करने पर यह भिन्नता समाप्त हो जाती है तथा दोनों स्थलों पर स्वर्णरूप ऐक्यभाव की प्रतीति होती है। ठीक उसीप्रकार समष्टिरूप ईश्वर में स्थित शुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान तथा व्यष्टिरूप जीव अथवा प्राज्ञ के मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान में से विशेषणरूप शुद्धसत्त्वप्रधान एवं मलिनसत्त्वप्रधान को हटा देने पर दोनों में शुद्धचैतन्यरूप परमब्रह्म ही विद्यमान रहता है। यही इन दोनों अर्थात् ईश्वर एवं जीव का ऐक्य है। जिसे ग्रन्थकार ने वनगत आकाश, वृक्षगत-आकाश तथा जलाशय में प्रतिबिम्ब आकाश तथा जल में प्रतिबिम्बित आकाश के ऐक्य द्वारा समझाने का प्रयास किया है। अपने इस कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार माण्डूक्योपनिषद् के ‘एष सर्वेश्वर' इति वचन को प्रमाणरूप में उद्धृत करते हैं। जहाँ प्राज्ञ को ही सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, अन्तर्यामी, सभी जीवों की उत्पत्ति एवं प्रलय का स्थान सभी का कारण बताया गया है- “एष सर्वेश्वरः एषः सर्वज्ञः एषः अन्तर्यामि, एष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्।” विशेष – (1) यहाँ प्रयुक्त ‘प्राज्ञ' शब्द चैतन्य की प्रधानता से ईश्वर एवं जीव दोनों अर्थों का वाचक है। शङ्कराचार्य ने ‘चेतोमुख' का ‘स्वप्न आदि अवस्था में अज्ञानरूप चेतना के प्रति द्वाररूप' अर्थ किया है। (2) वेदान्त ज्ञान को अन्तःकरण की स्थितिविशेष के रूप में मानता है। इनके अनुसार सांसारिक सुख एवं दुःख की अनुभूति भी एक मानसिक दशा ही है तथा अन्तःकरण की इस वृत्ति का उद्भव अज्ञान से होता है। सुषुप्ति की अवस्था में इन वृत्तियों का अज्ञान में विलय हो जाता है।