वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६६ वेदान्तसार वेदान्त के अनुसार- अज्ञान से उत्पन्न अन्तःकरण की वृत्तियों द्वारा ही जीव स्वप्न एवं जाग्रत अवस्था में अनुभूति एवं भोग आदि क्रियाओं को सम्पादित करता है। यद्यपि सुषुप्ति अवस्था में यह अन्तःकरण विपरीत क्रम में अपने कारणरूप अज्ञान में ही विलीन हो जाता है तथापि इस अवस्था में भी चैतन्य द्वारा प्रकाशित अज्ञान की सूक्ष्मातिसूक्ष्म वृत्तियाँ विद्यमान रहती हैं, जिनके द्वारा ईश्वर एवं प्राज्ञ अर्थात् जीव स्वरूपानन्द का अनुभव करते हैं। अतः यहाँ किसीप्रकार की विसंगति की परिकल्पना नहीं करनी चाहिए। तत्पश्चात् श्रुतिवचन एवं अनुभववाक्य को स्पष्ट करते हैं। 'चेतोमुखप्राज्ञ आनन्द का भोग करता है' यह श्रुतिवचन माण्डूक्योपनिषद् में आया है। यहाँ प्रयुक्त 'चेतोमुख' का विद्वन्मनोरञ्जनीकार ने-'चैतन्य प्रदीप्त अज्ञान वृत्तियों को ही मुख्यरूप से अपनाने वाला' अर्थ किया है। अर्थात् शुद्धचैतन्यब्रह्म के प्रकाश से प्रकाशित अज्ञानवृत्तिप्रधान समष्टि एवं व्यष्टिरूप ईश्वर एवं जीव सुषुप्ति-अवस्था एवं प्रलयकाल में भी आनन्द का अनुभव करते हैं। यहाँ प्रयुक्त आनन्दभुक् से अभिप्राय है-आनन्द का अनुभव करने वाला। 'प्राज्ञ' शब्द यहाँ ईश्वर एवं जीव दोनों अर्थों में प्रयुक्त माना जा सकता है। 'प्रकृष्टेन जानाति इति प्राज्ञः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इसका सर्वज्ञरूप ईश्वर अर्थ कर सकते हैं तथा 'प्रकर्षेण अज्ञः' इति प्राज्ञः इत्यादि व्युत्पत्ति के अनुसार प्रकृष्ट अज्ञानी अर्थात् जीव अर्थ भी ग्रहण किया जा सकता है। अतः दोनों अर्थों की संगति उचित है। यों भी ईश्वर और जीव दोनों ही सुषुप्ति अवस्था में आनन्द का अनुभव करते ही हैं। 'मैं सुखपूर्वक सोया, इस बीच मैं कुछ भी नहीं जान सका' इत्यादि अनुभववाक्य सर्वसाधारण द्वारा प्रतिदिन अनुभव में आता ही है। उस गहन निद्रा में जीव को यद्यपि अन्य बातों का ज्ञान नहीं था, किन्तु उस स्थिति में भी उसे इस बात का भान अवश्य था कि मैं आनन्द में हूँ, जिसे उसने सोकर उठने के बाद अभिव्यक्त किया। इससे सिद्ध होता है कि आत्मा अन्तःकरण के अभाव में भी आनन्द का अनुभव कर सकता है। प्रस्तुत खण्ड के द्वितीय अंश में ग्रन्थकार ने समष्टिव्यष्टिरूप अज्ञान एवं ईश्वर तथा प्राज्ञ की एकता का सोदाहरण प्रतिपादन किया है। तदनुसार समष्टिरूप अज्ञान से उपहित चैतन्य की 'ईश्वर' तथा व्यष्टिरूप अज्ञानों से उपहित चैतन्य की जीव अथवा 'प्राज्ञ' संज्ञा है। यद्यपि स्थूलदृष्टि से देखने पर ईश्वरगत समष्टिरूप अज्ञान तथा जीवगत व्यष्टिमूलक अज्ञान में भेद प्रतीत होता है, किन्तु यह वास्तविकभेद नहीं है, क्योंकि समष्टि-व्यष्टिरूप