वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्राज्ञ-ईश्वर निरूपण १६५ अनुवाद-उससमय ईश्वर और जीव ये दोनों चैतन्य से प्रदीप्त अत्यन्त सूक्ष्म अज्ञानरूप वृत्तियों द्वारा आनन्द का अनुभव करते हैं। “चेतोमुखी प्राज्ञ आनन्द को भोगता है।” इत्यादि श्रुति का (वचन यहाँ प्रमाण है)। मैं सुखपूर्वक सोया, मुझे (इस बीच) कुछ भी पता नहीं लगा' इत्यादि वाक्यों से सोकर उठने के बाद अपने पूर्वानुभूत सुख को अभिव्यक्त करता है। वन एवं वृक्ष अथवा जलाशय और जल इन दोनों समष्टिव्यष्टि के समान इन दोनों (समष्टिव्यष्टिरूप अज्ञानोपाधियों) में भी अभेद विद्यमान है। वन एवं वृक्ष से अवच्छिन्न (ढका हुआ) आकाश के समान अथवा जलाशय एवं जल में प्रतिबिम्बित आकाश के समान ही इन (समष्टि व्यष्टिगत अज्ञान की उपाधियों से) उपहित ईश्वर एवं प्राज्ञ में भी अभेद विद्यमान है। “यह (आत्मा) सबका स्वामी है” इत्यादि श्रुति का (कथन भी यहाँ प्रमाण है)। ‘चन्द्रिका'–इससे पूर्व के खण्ड में ग्रन्थकार ने कहा कि प्रलयकाल एवं सुषुप्ति अवस्था में ईश्वर एवं प्राज्ञ दोनों ही आत्मानन्द का अनुभव करते हैं तथा आनन्द का प्राचुर्य होने के कारण इसे 'आनन्दमयकोश' भी कहा जाता है, किन्तु इस प्रसङ्ग में एक शङ्का होती है कि जब प्रलय एवं सुषुप्ति अवस्था में न तो अन्तःकरण का अस्तित्व रहता है और न ही उसकी कोई वृत्ति विद्यमान रहती है, जिसके द्वारा ईश्वर अथवा प्राज्ञ आत्मानन्द का अनुभव कर सकें तो फिर भला ये दोनों इस अवस्था में आनन्द का अनुभव किसप्रकार करते हैं? इसी शङ्का के समाधान के लिए ग्रन्थकार ने प्रस्तुत खण्ड के प्रारम्भ में कहा कि ये दोनों शुद्धचैतन्य द्वारा प्रकाशित अज्ञान की अत्यधिक सूक्ष्म वृत्तियों द्वारा, प्रलयकाल एवं सुषुप्ति अवस्था में भी स्वरूपानन्द का अनुभव करते हैं। अतः इस विषय में शङ्का किया जाना उचित नहीं है। अपने कथ्य की पुष्टि में ग्रन्थकार ने माण्डूक्योपनिषद् के आनन्दभुक् इत्यादि श्रुतिवचन एवं 'सुखमहम स्वाप्सं' इत्यादि अनुभववाक्य उद्धृत किए हैं। वस्तुतः सुषुप्तिदशा में अथवा प्रलयकाल में बाह्यसाधनों अन्तःकरण आदि का अभाव होने के कारण, यद्यपि आत्मा को बाह्यविषयों का ज्ञान नहीं होता है, किन्तु ज्ञान, जीवात्मा का स्वाभाविकगुण होने के कारण उसे आनन्द का अनुभवरूप आन्तरिकज्ञान इस अवस्था में भी रहता है, क्योंकि आत्मा से ज्ञान को कभी भी, किसी भी अवस्था में उसीप्रकार अलग नहीं किया जा सकता है, जिसप्रकार अग्नि से उसकी उष्णता को किसी भी प्रकार पृथक् नहीं किया जा सकता है, आत्मा तो वस्तुतः चित्स्वरूप है।