वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०२ वेदान्तसार वाय्वादि भागांश्चत्वारो वाय्वादिष्वेवमादिशेत्। पञ्चीकरणमेतत्सstructure/word: पञ्चीकरणमेतत्स्यादित्याहुस्तत्त्ववेदिनः॥ अवतरणिका-पञ्चीकरणप्रक्रिया का निरूपण करने के प्रसङ्ग में ही उपनिषद् प्रतिपादित त्रिवृत्करण की प्रक्रिया को पञ्चीकरणप्रक्रिया का ही उपलक्षण बताते हुए ग्रन्थकार कहते हैं- अस्याप्रामाण्यं नाशङ्कनीयं त्रिवृत्करणश्रुतेः पञ्चीकरणस्याप्युप- लक्षणत्वात्। पञ्चानां पञ्चात्मकत्वे समानेऽपि तेषु च “वैशेष्यात्तद्वादस्तद्वाद” इतिन्यायेनाकाशादिव्यपदेशः सम्भवति। तदानीमाकाशे शब्दोऽभिव्यज्यते वायौ शब्दस्पर्शावग्नौ शब्दस्पर्शरूपाण्यप्सु शब्दस्पर्शरूपरसाः पृथिव्यां शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाश्च॥१५॥ पदच्छेद-अस्य अप्रामाण्यम् न आशङ्कनीयम् त्रिवत्करणश्रुतेः पञ्चीकरणस्य अपि उपलक्षणत्वात्। पञ्चानाम् पञ्चात्मकत्वे समाने अपि तेषु च “वैशेष्यात् तद्वादः तद्वादः” इति न्यायेन आकाशादि व्यपदेशः सम्भवति। तदानीम् आकाशे-शब्दः अभिव्यज्यते, वायौ-शब्दस्पर्शौ अग्नौ-शब्द-स्पर्श- रूपाणि, अप्सु-शब्द-स्पर्श-रूप-रसाः, पृथिव्याम्-शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धाः च॥।15॥ अनुवाद- श्रुति का त्रिवृत्करण (यहाँ बताए गए) पञ्चीकरण का भी उपलक्षण होने के कारण, इसके अप्रामाण्य की आशङ्का नहीं करनी चाहिए। पाँचों (महाभूतों) में पाँचों के समानभाग मिले हुए होने पर भी उन सबमें प्रधान अंश के आधार पर उस-उसको कहे जाने रूप न्याय से ही (उनमें) आकाश आदि का व्यवहार सम्भव होता है। उस समय ही आकाश में शब्द, वायु में शब्द एवं स्पर्श, अग्नि में शब्द, स्पर्श एवं रूप, जलों में शब्द, स्पर्श, रूप एवं रस तथा पृथिवी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध की अभिव्यक्ति होती है। ‘चन्द्रिका'-छान्दोग्योपनिषद् (6.3.3) में सर्वप्रथम अग्नि की उत्पत्ति कही गई है तथा उसके बाद अग्नि से जल एवं जल से पृथिवी की उत्पत्ति का कथन करके, उनके त्रिवृत्करण द्वारा स्थूलसृष्टि की उत्पत्ति बतायी गयी है- “सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवताः, अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि। तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणि, इति सेयं देवते- मास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् (6.3.2-3)