वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चीकरण प्रक्रिया २०३ त्रिवृत्करण के अनुसार अग्नि, जल और पृथिवी इन तीनों को सर्वप्रथम दो बराबर भागों में विभाजित किया जाता है। पुनः प्रथम तीन अर्धांशों को फिर से दो भागों में विभाजित करके, उनका एक-एक भाग पूर्व के अर्धांश में जोड़ दिया जाता है। जिससे त्रिवृत्भूत का निर्माण होता है। ठीक इस प्रकार- चित्र-४२ 1/4 जल 1/4 पृथिवी 1/4 अग्नि 1/4 अग्नि 1/2 जल 1/2 पृथिवी 1/2 पृथिवी 1/4 अग्नि 1/4 जल 1/4 अग्नि जल पृथिवी किन्तु आचार्य सदानन्द ने यहाँ पञ्चीकरणप्रक्रिया द्वारा सृष्टि की उत्पत्ति का कथन किया है। अतः इस विषय में शङ्का होना स्वाभाविक है कि त्रिवृत्करण को स्थूलसृष्टि का कारण माना जाए अथवा पञ्चीकरण की प्रक्रिया को? इसी शङ्का के समाधान में ग्रन्थकार कहते हैं कि उपनिषद् में प्रतिपादित त्रिवृत्करण प्रस्तुत पञ्चीकरण का उपलक्षण है अर्थात् वह अपना भी बोध कराता है तथा प्रस्तुत पञ्चीकरण का भी द्योतक है। वस्तुतः स्थूलसृष्टि का निर्माण पञ्चसूक्ष्मभूतों की पञ्चीकरणप्रक्रिया द्वारा ही होता है। अतः छान्दोग्योपनिषद् में प्रतिपादित त्रिवृत्करण को पञ्चमहाभूतों की सृष्टि में प्रयुक्त पञ्चीकरण का उपलक्षण मानना चाहिए। इस प्रसङ्ग में पुनः एक शङ्का की जा सकती है कि यदि पञ्चीकरण प्रक्रिया के परिणामस्वरूप स्थूलमहाभूतों की सृष्टि के सिद्धान्त को मान भी लिया जाए तो, वायु में पृथिवी का अंश होने के कारण हमें उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष होना चाहिए। इसीप्रकार आकाश में जल एवं पृथिवी का अंश होने के कारण उसका स्पर्श द्वारा प्रत्यक्ष होने के साथ-साथ चाक्षुषप्रत्यक्ष एवं गन्ध की उपलब्धि भी होनी चाहिए, किन्तु ऐसा नहीं होता है। अतः पञ्चीकरण की प्रामाणिकता पर संदेह किया जा सकता है। इस शङ्का के समाधान के लिए ग्रन्थकार कहते हैं कि पञ्चीकरण प्रक्रिया द्वारा यद्यपि पाँचों महाभूतों में पाँचों सूक्ष्मभूतों के अंश विद्यमान रहते