वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३८ वेदान्तसार अतः इन दोनों भिन्न-भिन्न द्रव्य पदार्थों का गुण-गुणी के समान विशेषण-विशेष्यभावरूपसम्बन्ध अथवा पूर्व में प्रतिपादित विशिष्ट वाक्यार्थ ये दोनों ही सम्भव नहीं हैं, क्योंकि उस स्थिति में विशिष्ट वाक्यार्थ की प्राणिति इसप्रकार करनी होगी-‘जो परोक्षत्वादि विशिष्ट चैतन्य है वही अपरोक्षत्वादि विशिष्टचैतन्य भी है। इस रूप में यहाँ संगति का औचित्य संदिग्ध रहेगा, क्योंकि यहाँ ‘तत्’ पद से अभिप्रेत ‘परोक्षत्वादि गुणविशिष्ट सर्वज्ञचैतन्यरूप अर्थ से है तथा ‘त्वम्’ पद से अभिप्राय ‘अपरोक्षत्वादिगुणविशिष्ट अल्पज्ञजीवरूपचैतन्य से है। अतः जो सर्वज्ञ है वह अल्पज्ञ नहीं हो सकता। साथ ही इन दोनों के परस्पर आश्रय भेद से पार्थक्य होने के कारण भी गुण-गुणी के समान विशेषणविशेष्यभावसम्भव नहीं है। इसके अतिरिक्त यदि हम इसप्रकार का वाक्यार्थ स्वीकार कर भी लें कि-‘जो परोक्षत्वादि विशिष्टचैतन्य है, वही अपरोक्षत्वादि विशिष्टचैतन्य भी है। ऐसी स्थिति में प्रत्यक्षादि प्रमाणों के साथ उसका विरोध होने से वाक्यार्थ संगत नहीं होगा। इसलिए निष्कर्षरूप में यही मानना उचित होगा कि ‘तत्त्वमसि’ इत्यादि वाक्य में ‘नीलमुत्पलम्’ के समान विशेषणविशेष्यभाव को मानना उचित नहीं है, अपितु इसका विशेषणविशेष्यभाव भिन्न है, जिसका पूर्व में प्रतिपादन किया जा चुका है। अपनी बात की पुष्टि में ग्रन्थकार पञ्चदशी की कारिका को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं। जिसमें ‘तत्त्वमसि’ वाक्य में भेदरूप सम्बन्ध अथवा विशिष्ट अभेदरूप सम्बन्धों का निषेध करके, अभिधा शब्दशक्ति द्वारा प्रतीत होने वाले वाच्यार्थ के प्रति असहमति व्यक्त करते हुए, लक्षणा शब्दशक्ति के सहयोग से प्रतीत होने वाले सर्वज्ञत्व एवं अल्पज्ञत्व का परित्याग करके भेदरहित वाक्यार्थ को ही अभिप्रेत माना गया है। जिसे वेदान्त के विशेषज्ञ विद्वानों द्वारा ‘अखण्ड एवं एकरस’ के रूप में मान्यता प्रदान की है। विशेष-(1) प्रस्तुत अंश में ‘नीलमुत्पलम्’ के समान गुण-गुणी के विशेषणविशेष्यभाव का ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य में निषेध किया गया है। (2) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है-